Sign up for our weekly newsletter

पहला पेशा, अंतिम मौका

करीब 120 वर्षों से कृषि शिक्षा के जरिए भारत की खेती-किसानी को समृद्ध और किसानों को खुशहाल बनाने का दावा किया जा रहा है। इसके उलट हकीकत यह है कि हमारी कृषि शिक्षा दरिद्रता की चादर ओढ़े हुए है। कृषि शिक्षा से न तो छात्रों का भला हो रहा है और न ही किसानों का

By Richard Mahapatra

On: Wednesday 04 September 2019
 
पहला पेशा अंतिम मौका

देश की धरोहर माने जाने वाले राधाकृष्णन ने जब विद्यार्थियों को संबोधित किया, तब देश की कृषि शिक्षा नवजात बच्चे की तरह थी। देश में अनाज उत्पादन इतना नहीं था कि सभी का पेट भर सके। रिकॉर्ड बताते हैं कि उस वक्त देश के चार विश्वविद्यालयों में महज 1,500 छात्र कृषि की पढ़ाई के लिए पंजीकृत हुए थे, जिन्होंने किसानों को खुशहाल और देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया था। एक किसान यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उस वक्त कृषि छात्रों का क्या अनुपात रहा होगा।

अब वापस 2019 में आते हैं। 56 साल गुजरने के बाद हमारे देश में दुनिया का सबसे बड़ा कृषि शिक्षा नेटवर्क है। करीब 25 हजार छात्र हर साल कृषि और संबद्ध विषयों में पढ़ाई के लिए दाखिला लेते हैं। फिर कृषि संकट और शिक्षा व्यवस्था में गिरावट क्यों है?

यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि देश में हर वर्ष विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला लेने वाले कुल छात्रों में महज 0.03 फीसदी छात्र ही कृषि संस्थानों में दाखिला लेते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि कृषि और उससे जुड़े अन्य पेशेवर शिक्षा में देश के युवाओं की दिलचस्पी कम होती जा रही है। युवाओं के लिए पेशे के तौर पर कृषि सबसे निचली प्राथमिकताओं में है। ठीक इसी समय कृषि संस्थानों से निकलने वाले स्नातकों को रोजगार भी नहीं मिल रहा है। हमारे सामने एक ऐसी स्थिति है जहां किसान और युवा दोनों खेती-किसानी से दूरी बना रहे हैं। हो सकता है कि अगली पीढ़ी में कोई किसान ही न बने।

2011 में 70 फीसदी भारतीय युवा ग्रामीण क्षेत्रों में थे, जहां कृषि रोजगार का मुख्य जरिया थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रत्येक दिन 2,000 किसान खेती छोड़ रहे हैं। किसानों की आय का पांचवा हिस्सा गैर कृषि का है। किसान परिवारों के बच्चों में बेहद मुश्किल से कुछ युवाओं में खेती-किसानी को लेकर रुचि है। इतना ही नहीं, बड़ी संख्या में कृषि विश्वविद्यालयों से निकलने वाले स्नातक किसी दूसरे पेशे को अपना विकल्प बना रहे हैं। यह भारतीय कृषि मेधाओं का पलायन कहलाता है। एक ऐसा मंजर दिखाई देता है कि जो भी अपने परिवार के खेतों में काम कर रहा है या किसी दूसरे तरीके से कृषि में शामिल है, वह मजबूरी में यह काम कर रहा है।

गैर लाभकारी संस्था प्रथम की ओर से प्रकाशित एनुअल स्टेट ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) 2017 देखें तो सर्वे किए गए 30,000 ग्रामीण युवाओं में सिर्फ 1.2 फीसदी ही किसान बनना चाहते हैं। 18 फीसदी लड़के सेना में और 12 फीसदी लड़के इंजीनियर बनना चाहते हैं। इसी तरह पारंपरिक खेती में बड़ी भूमिका निभाने वाली लड़कियों में 25 फीसदी शिक्षिका बनना चाहती हैं। प्रथम की सर्वे रिपोर्ट में संस्थापक माधव चव्हाण लिखते हैं कि पूरे भारत में स्नातक स्तर पर होने वाले दाखिले के मुकाबले कृषि में या पशुधन शिक्षा में छात्रों के दाखिले का प्रतिशत आधे से भी कम है। रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि कृषि और संबंधित क्षेत्रों में काम करने वाली आबादी का प्रतिशत अब लगभग 50 फीसदी तक कम हो गया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो अग्रणी देशों की उत्पादकता को ध्यान में रखकर अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित कार्यबल का उपयोग कर सकता है। 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के तरीके ईजाद करने वाली समिति के अनुसार, कृषि क्षेत्र में श्रमशक्ति का सूखा है। खासतौर से कृषि विस्तार गतिविधियों में श्रमशक्ति नहीं है जो व्यावहारिक तौर पर संस्थानों से वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान किसानों तक पहुंचाते हैं। 2012-13 की सूचना के मुताबिक, 13.28 करोड़ कृषि जोत के लिए कृषि की वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान गतिविधियों के लिए 1,19,048 श्रमशक्ति ही मौजूद थी। 1,162 कृषि जोत पर एक ही एक्सटेंशन पदाधिकारी काम कर रहा था।

1871 में ब्रितानी नौकरशाह एओ ह्यूम (राष्ट्रीय कांग्रेस दल के संस्थापक) ने देश के पहले कृषि विभाग को राजस्व, कृषि और वाणिज्य विभाग के तौर पर शुरू किया। इसमें कृषि शिक्षा मुख्य केंद्र में थी। हालांकि, यह देश में सबसे अधिक प्रचलित निजी उद्यम यानी कृषि को मजबूत करने के लिए कुशल मानव संसाधन की भारी मांग को पूरा करने में असमर्थ रही। तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को अस्थायी रूप से कृषि शिक्षा और अनुसंधान केंद्र स्थापित करने में 20 साल और लग गए। वर्ष 1892 में एक कृषि रसायनज्ञ और एक सहायक रसायनज्ञ को भारत में अनुसंधान और शिक्षण की देखभाल करने के लिए यह केंद्र आवंटित किया गया था, जो राजस्व और कृषि विभाग में पहला वैज्ञानिक स्टाफ था।

आखिरकार, 1901 में कृषि मामलों पर शाही और प्रांतीय सरकारों को सलाह देने के लिए कृषि महानिरीक्षक नियुक्त किया गया। चाहे सरकार हो या किसान, तब से अब तक राजस्व ही हमारा जुनून है। इस राजस्व को ज्यादा और स्थायी बनाने के लिए हम शिक्षा और तकनीकी विकास पर कभी ध्यान केंद्रित नहीं कर सके। यह ऐसा समय है जब किसान बूढ़े हो रहे हैं और अगली पीढ़ी उनकी जगह नहीं ले रही है। 2016 में एक भारतीय किसान की औसत आयु 50.1 वर्ष थी। यह चिंताजनक स्थिति है। तर्क है कि भारत की कृषि को पुनर्जीवित करना देश का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा है। इससे पहले कभी भी भारत को खाद्य मांग को पूरा करने के लिए इतनी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा है। 2050 में भारत की अनुमानित आबादी 1.9 अरब होगी। इसमें दो-तिहाई से अधिक मध्यम आय वर्ग के होंगे। ये खाद्यान्न की मांग को दोगुना कर देंगे।

यह संभावित है कि किसानों की बढ़ती उम्र कृषि के विकास को अनिश्चित और अप्रत्याशित तरीके से प्रभावित करे। लेकिन इस खाद्यान्न मांग को एक बड़े आय अवसर में परिवर्तित किया जा सकता है, बशर्ते यदि देश में किसान हों और उन्हें शैक्षणिक संस्थाओं के जरिए तकनीकी साधन मुहैया कराए जाए।

देर से ही सही, इस वास्तविकता ने भारतीय नीति निर्माताओं को चौंका दिया है। अब कृषि को युवाओं के लिए आकर्षक बनाने के प्रयास हैं। नए भारत में कृषि शिक्षा को अधिक रोजगारपरक भी बनाया जा सकता है। भारत सरकार आर्या (एआरवाईए) यानी “कृषि में युवाओं को आकर्षित करने और बनाए रखने” के नाम से एक कार्यक्रम भी चला रही है। इसे 25 राज्यों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से लागू किया जा रहा है। प्रत्येक जिले में कुछ 200-300 ग्रामीण युवाओं की पहचान उद्यमिता में उनके कौशल विकास और कृषि से संबंधित सूक्ष्म-उद्यम इकाइयों की स्थापना के लिए की जाती है। इसके बदले चिन्हित युवा अन्य युवाओं को कृषि-संबंधित कौशल-आधारित पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसी तरह एक और योजना है, जिसे फर्स्ट प्रोग्राम कहा जाता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिकों और किसानों के बीच की खाई को पाटना है। यह एक लंबी समस्या रही है। भारतीय किसान और कृषि पेशेवर/ वैज्ञानिक एक-दूसरे से शायद ही बातचीत करते हैं या एक-दूसरे के लिए उपयोगी साबित होते हैं। यह एक बड़ी वजह रही है कि कृषि शिक्षा लेने वाले छात्र वापस न तो खेतों मे जाते हैं और न ही उससे कोई जुड़ाव महसूस करते हैं। यह एक बड़ी समस्या है जिसे फर्स्ट प्रोग्राम के तहत चिन्हित किया गया है। इस कार्यक्रम में 45,000 किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को एक साथ लाने का दावा किया गया है। लेकिन यहां चुनौतियां बहुत बड़ी हैं और देश में कृषि शिक्षा को लागू करने के तरीके में एक बुनियादी बदलाव की जरूरत है।

इसमें नए पहलू भी जुड़ गए हैं जैसे जलवायु परिवर्तन कृषि को आपदाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। ऐसे में हमारे कृषि छात्रों को शिक्षा प्रणाली के माध्यम से इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए, ताकि कृषि क्षेत्र के लिए वह अधिक प्रासंगिक हो। इसी प्रकार, खाद्य प्रसंस्करण और पशुधन सहित बागवानी देश में कृषि क्षेत्र के चालक के रूप में उभर रहे हैं। कृषि का युवाओं के लिए प्रासंगिक बने रहना भारत की कृषि शिक्षा क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।

1963

“हम किसानों को दोष नहीं दे सकते, हम अपनी जमीनों को दोष नहीं दे सकते और हम किसी चीज को दोष नहीं दे सकते। हम देश के नेता हैं, हमें हर हालत में किसानों को असफल होने से बचाना है। हमें उन तक नवीनतम ज्ञान पहुंचाने की कोशिश करनी है। यदि हम ऐसा ही करते हैं तो निश्चित रूप से बाहर के मुल्कों से अनाज का आयात बंद कर देंगे... मैं आशान्वित हूं कि इस विश्वविद्यालय के स्नातक मिसाल कायम करेंगे और कृषि में सुधार के लिए कुछ ठोस करेंगे।”

- सर्वपल्ली राधाकृष्णन - देश के पहले कृषि विश्वविद्यालय गोविंद बल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के पहले सम्मेलन में दिया गया संबोधन

अब

“सतरंगी क्रांतियों, 73 कृषि विश्वविद्यालय और 103 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) वाली व्यापक राष्ट्रीय कृषि शोध और शिक्षा व्यवस्था (एनएआरईएस) के बावजूद देश की एक-चौथाई आबादी भूख और गरीबी का शिकार है। इसकी प्रमुख वजह कृषि विश्वविद्यालयों का औसत प्रदर्शन है। शिक्षा मानक, संकायों की गुणवत्ता, स्नातक, रोजगार और शोध व तकनीकी विस्तार के परिणामों में गिरावट आई है।”

- पांचवी डीन्स कमेटी रिपोर्ट, कृषि शिक्षा प्रभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद