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किसानों से कैसे अरबों डाॅलर लूट रही है सरकार, संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार की नीतियों ने किसानों के लिए वे सारे रास्ते बंद कर दिए हैं, जिनसे वे खाद्यान्न की कीमतें कम रखकर उपभोक्ताओं को राहत दे सकते थे

By Richard Mahapatra

On: Tuesday 14 September 2021
 
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

भारत में कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसानों के प्रदर्शन के बीच संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों की एक ताजा रिपोर्ट दर्शा रही है कि भारत ऐसा अजीब देश है, जिसकी सरकार बाकी देशों की सरकारों की तरह अपने किसानों को प्रोत्सााहित करने की बजाय उन्हें दंडित कर रही है।

23 सितंबर को होने वाले विश्व खाद्य सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र की तीन एजेंसियों, खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) , संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने ‘ए मल्टी बिलियन डॉलर ऑपर्च्यूनिटी’ नाम की रिपोर्ट जारी की। इसमें खेती में सुधार के लिए पूरी दुनिया में एक सहयोगी तंत्र विकसित करने की मांग की गई है।

उम्मीद की जा रही है कि वैश्विक स्तर पर खाद्य प्रणाली में सुधार के लिए आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन में ‘साहसी कदम’ उठाए जाएंगे। ऐसा संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों को गति देने के प्रयासों के तहत किया जाएगा।

ताजा रिपोर्ट इसी प्रक्रिया की दिशा में उठाया गया एक कदम है, जिसमें खाद्य प्रणाली में  सुधार के लिए विशेष प्रयासों की मांग की गई है। खासकर उन देशों के लिए जहां सरकारों ने किसानों के लिए कृषि उत्पादों के मूल्यों से छेड़छाड़ की है और ऐसी खेती को बढ़ावा दिया है, जो उत्सर्जन बढ़ाकर ग्लोबल वाॅमिंग में सहयोग कर रही है। साथ ही, जिसने छोटे किसानों के लिए वैश्विक कृषि व्यापार को असमान बना दिया है।

रिपोर्ट ने इन आयामों के आधार पर किसानों के लिए सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयासों और उनके प्रभावों का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारें कृषि में सुधार के नाम पर सालाना 540 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करती हैं। इनमें से आधे से ज्यादा राशि मूल्य कम करने के नाम पर इस्तेमाल की जाती है, जिसका पर्यावरण पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है।

हालांकि कृषि में सुधार का तरीका दुनिया के देशों में अलग-अलग तरह का है। विकसित देश अपने किसानों को वैश्विक स्पर्धा में भाग लेने के लिए उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य पाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जबकि  विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भी अपने किसानों को कई तरह से सहयोग करते हैं।

दूसरी ओर कम आय वाले उप-सहारा अफ्रीकी देशों में किसानों को सरकार से मिलने वाला सहयोग नकारात्मक है। इसकी वजह इन देशों के पास आर्थिक संसाधनों की कमी होना है, जिसके चलते सरकारें खाद्यान्नों की कीमतें कम करने के लिए कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ने से रोकती हैं। इससे उत्पादन करने वाले किसान अपनी फसल का उचित मूल्य कभी नहीं पा पाते। सही मायनों में यह उनके लिए एक सजा है। नीतियों की भाषा में इसे किसानों से लिए जाने वाले ‘टैक्स’ के तौर पर जाना जाता है।

मध्यम-आय वाले देशों में भारत एक अपवाद देश है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘पिछले बीस सालों से भारत में कृषि की नीतियां इस तरह की रही हैं, जिससे खाद्य पदार्थों के दाम न बढ़ाकर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जा सके। इसका खामियाजा किसानों को सजा के तौर पर झेलना पड़ता है। ’

रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि किस तरह से दुनिया के दूसरे मध्यम-आय वाले देशों ने अपने किसानों को सहयोग देकर उनकी मदद की है। यह और बात है कि इसके लिए उन्होंने अलग-अलग उपाय अपनाए। जबकि भारत, अर्जेंटीना और घाना के रास्ते पर चलकर किसानों पर टैक्स लगाने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने में भरोसा करता रहा है। वह इस नीति पर इसलिए चलता रहा है कि ताकि खाद्य पदार्थों की महंगाई न पड़े और वे आम जनता की पहुंच से बाहर न जाएं।

इतना ही नहीं, ये देश मध्यम-आय वाले उन देशों का विरोध भी करते रहे हैं, जो समर्थन मूल्य बढ़ाकर अपने किसानों को सहयोग देते रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘ मध्यम-आय वाले देशों में किसानों को लेकर नजरिया नकारात्मक से सकारात्मक होने का सिलसिला पिछली सदी के अंत में शुरू हुआ। इससे पहले ये देश भी अपने गरीब उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए घरेलू चीजों के दाम कम रखते थे और कृषि क्षे़त्र पर टैक्स लगाते थे।

दूसरी ओर भारत और कुछ अन्य मध्यम-आय वाले देशों ने पिछले दो दशकों में खाद्य पदार्थों के दामों पर नियंत्रण रखना और इस तरह से किसानों को दंडित करने की नीति पर तेजी से बल देना शुरू किया।’ इससे पहले आर्थिक सहयोग और विकास संगठन द्वारा ‘कृषि नीतियों की निगरानी और विकास 2020’ नामक रिपोर्ट में भी यह पाया गया था कि भारत में खाद्य पदार्थों की कीमतें कम रखने की सजा किसानों को भुगतनी पड़ती है।

किसी सरकार द्वारा बजट और दूसरी सब्सिडी के जरिए उत्पादकों को सहयोग देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘उत्पादक समर्थन आकलन’ पद्वति का इस्तेमाल किया जाता है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन द्वारा विकसित इस पद्वति के जरिए वैश्विक स्तर पर सालाना यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किसानों को मदद देने के लिए दुनिया भर की सरकारें क्या कदम उठा रही हैं।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने पाया कि भारतीय किसानों के लिए ‘उत्पादक समर्थन आकलन’ 5.7 फीसद नकारात्मक है। इसके चलते 2019 में किसानों को 23 अरब डाॅलर का नुकसान हुआ।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन में कृषि-खाद्य आर्थिकी के उपनिदेशक मार्को वी सांचेज कहते हैं, ‘हां, यह सही है, जैसा कि रिपोर्ट बता रही है कि भारत जैसे देशों में किसानों को दंडित किया जाता है। इसके बावजूद कैश ट्रांसफर जैसी योजनाओं से खुश होते हैं। भारत में पीएम-किसान योजना के तहत साल में छह हजार रुपये किसानों के अकाउंट में भेजे जाते हैं।’

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट कृषि उत्पादक समर्थन को किसानों को निजी तौर पर मदद देने को समेकित प्रयास के तौर पर परिभाषित करती है। इसमें उन्हें कृषि उत्पादों के मूल्य पर मिलने वाला लाभ और सब्सिडी दोनों शामिल है। यही वजह है कि रिपोर्ट के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने किसानों को मिलने वाले सहयोग के लिए ‘नाममात्र की सहायता’ शब्दावली का इस्तेमाल किया है।