खराब वैक्सीन से पशुपालकों की आय को बड़ा झटका, मुआवजे की नीति नहीं

ऐसे किसान जो पशुपालन से अपनी आजीविका चलाते हैं और पारंपरिक तौर पर उसी पर निर्भर हैं, वे अपने जानवरों को तमाम रोगों के साथ प्रयोग के दौरान इस्तेमाल की गई खराब वैक्सीन के चलते खो रहे हैं।

By Vivek Mishra

On: Wednesday 11 August 2021
 

जानवरों से इंसानों में पहुंचने वाली संक्रामक बीमारियों (जूनोटिक) मानवता के लिए घातक होती जा रही हैं। वहीं, अन्य बीमारियों से त्रस्त पशुपालक किसान भी उचित व समुचित इलाज के अभाव से त्रस्त और हतोत्साहित हो रहे हैं। देश में अब भी जानवरों में होने वाले रोगों की रोकथाम को लेकर ठोस काम नहीं हो पाया है। खासतौर से गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन की अनुपलब्धता और नीतियों का अभाव इसे और खतरनाक बना रहा है। गांव और ब्लॉक स्तर पर अब भी जानवरों की बीमारी की खोजबीन और उनके इलाज की व्यवस्थाएं उदासीन या नदारद हैं।  

केंद्रीय मत्स्य पाल, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने 05 अगस्त, 2021 को "स्टेटस ऑफ वेटरिनरी सर्विसेज एंड अवेलिबिलिटी ऑफ एनिमल वैक्सीन इन द कंट्री" नामक रिपोर्ट में कहा है कि कई राज्यों के गांवो में अब भी बुनियादी जांच सुविधाओं का अभाव है। यहां तक कि यदि नमूने ले भी लिए जाते हैं तो उन्हें ब्लॉक या जिला स्तर पर भेजने की कवायद भी काफी मशक्कत भरी है। ऐसे में यह न सिर्फ पशुपालकों के लिए परेशानी भरा है बल्कि बीमारी के फैलने की भी संभावना बनी रहती है।

स्थायी समिति ने कहा कि ऐसे में ग्रासरूट लेवल पर दक्ष लोगों की जरूरत है जो इस समस्या का काफी हद तक समाधान कर सकते हैं। अभी कुछ राज्यों में गांवों में मोबाइल वेटरिनरी यूनिट्स बुनियादी जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं हालांकि, ज्यादातर फंड की कमी या संसाधनों के अभाव में उदासीन हैं।

देश में जानवरों में बीमारियों की खोजबीन और पता लगाने के लिए 256 राज्य प्रयोगशालाएं, 56 वेटेरिनरी कॉलेज की प्रयोगशालाएं, 33 एलीसा प्रयोगशालाएं, 5 क्षेत्रीय डिजीज डायगनोस्टिक लैबोरेट्री और एक सेंट्रल डिजीज डायग्नोस्टिक लेबोरेट्री मौजूद हैं जो ब्लॉक, जिला या गांव स्तर पर ऐसी समस्याओं से जूझने के लिए अपर्याप्त हैं। 

वहीं, कई तरह के रोगों से बचाव के लिए वैक्सीन जैसे अहम हथियार का गुणवत्तापूर्ण  इस्तेमाल अभी तक नहीं हो रहा है। ऐसे किसान जो पशुपालन से अपनी आजीविका चलाते हैं और पारंपरिक तौर पर उसी पर निर्भर हैं, वे अपने जानवरों को तमाम रोगों के साथ प्रयोग के दौरान इस्तेमाल की गई खराब वैक्सीन के चलते खो रहे हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें कोई मुआवजा भी नहीं मिलता है। यहां तक कि ऐसे मामलों में संवाद के लिए पशुपालक या पोल्ट्री मालिकों और पशुपालन विभाग  के बीच संवाद की कोई कड़ी भी नहीं है। 

स्थायी समिति ने गौर किया कि अभी तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पशुपालक को वैक्सीन लगने के बाद जानवर के मर जाने पर किसी तरह का मुआवजा देता हो। समिति ने कहा कि इस दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। ग्रासरूट लेवल पर ही वन स्टॉप सेंटर बनाकर ऐसी समस्याओं का समाधान होना चाहिए। 

इसके अलावा स्थायी संसदीय समिति ने कहा कि ऊंट, याक व अन्य ऐसे जानवर जिनके दूध का कहीं-कहीं या यदा-कदा प्रयोग होता है वेटेरिनेरी हेल्थकेयर सर्विसेज और वैक्सीनेशन प्रोग्राम में शामिल नहीं हैं। ऐसे में एक समावेशी कार्यक्रम होना चाहिए।  और खासतौर से हिमालयी राज्यों व पूर्वोत्तर राज्यों की सरहदों पर जागरुकता कार्यक्रम भी चलाया जाना चाहिए। 

देश में नेशनल एनिमल डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनएडीसीपी) कार्यक्रम के तहत सरकार फुट एंड माउथ डिजीज (मुंह और खुर में रोग) को वैक्सीनेशन के तहत 2025 तक 100 फीसदी खत्म करने का वादा करती है। सरकार के मुताबिक इसकी वैक्सीन पर्याप्त है। हालांकि गाय और भैंसों में होने वाले संक्रामक ब्रुसेलोसिस रोग के लिए मौजूदा जरूरत के हिसाब से ब्रुसलोसिस वैक्सीन की 580 लाख खुराक कम है। यह जानवरों से इंसानों में भी फैल सकता है। 

लेकिन वैक्सीन की गुणवत्ता एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है। स्थायी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है कि पशुपालन विभाग के लोगों का कहना है कि इस मामले में हमारी रिसर्च इतनी व्यापक और गहरी नहीं है। ऐसे में न सिर्फ वैक्सीनेशन प्रोग्राम में देरी हो रही है बल्कि रोग को प्रसार का मौका भी मिल रहा है। 

स्थायी संसदीय समिति ने गौर किया कि 2019-20 में फुट एंड माउथ डिजीज में 45.6 करोड़ वैक्सीन के लक्ष्य के विरुद्ध 18.2 करोड़ वैक्सीन ही लगाया जा सका। इसी तरह से क्लासिकल स्वाइन फीवर का केवल 3 लाख वैक्सीन ही लगाया जा सका। वहीं, 2020-21 में यह अभी तक जीरो है। ऐसे में वैक्सीन निर्माण की तकनीकी जानकारी पशुपालन विभाग को किसी अन्य कंपनी को ट्रांसफर करना चाहिए। 

इसी तरह पशु संबंधी संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए स्थायी संसदीय समिति ने एंटी माइक्रोबियल रसिस्टेंस पर चिंता जाहिर की है और अपने सुझाव में कहा है कि सरकार को पशुओं को दी जाने वाली दवाएं और हॉर्मोन पर भी गौर करना चाहिए। इसका दुरुपयोग हो रहा है जिसके देख-रेख की जरूरत है।