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टिकैत की ये बातें मान लेती सरकारें तो नहीं होता कृषि संकट

अक्टूबर 2008 में डाउन टू अर्थ ने किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का साक्षात्कार किया था, प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश -  

By DTE Staff

On: Wednesday 22 May 2019
 
File Photo : Suray Sen
File Photo : Suray Sen File Photo : Suray Sen

महेंद्र सिंह टिकैत ऐसे शख्सियत थे, जो न केवल किसान नेता थे, बल्कि एक दूरदृष्टा भी थे। लगभग 50 साल बाद अब हमें लगता है कि हरित क्रांति के दौरान कई गलतियों की वजह से खेती किसानी की हालत बिगड़ी है, वह एक दशक पहले ही इस बात को कह चुके थे। उनकी कही बातें अब भी जस की तस हैं। सरकारें आई-गई, लेकिन उन्होंने जो मुद्दे उठाए थे, उनकी ओर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि कृषि संकट लगातार गहराता जा रहा है। महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को हुआ था, इस मौके पर टिकैत को याद किया जा रहा है। डाउन टू अर्थ ने टिकैत से अक्टूबर 2008 में लंबा साक्षात्कार किया था, जो 1-15 अक्टूबर 2008 के अंक में प्रकाशित किया गया था। उनका वह इंटरव्यू अब ज्यों का त्यों प्रकाशित किया जा रहा है। ताकि आज का पाठक और सरकार समझ सके कि आखिर महेंद्र सिंह टिकैत तत्कालीन कृषि संकट को किस नजर से देखते थे और कैसे वह कृषि संकट से निजात पाने की बात करते थे?

डाउन टू अर्थ: किसानों की दशा (2008 में) कैसी है?

टिकैत: खेती से अब कुछ नहीं मिलता। खेती करना महंगा हो गया है, लेकिन उसके मुकाबले किसानों को अपने अनाज की सही कीमत नहीं मिल रही। 1966 में जब हरित क्रांति का दौर शुरू हुआ था, एक ट्रैक्टर की कीमत 11 हजार रुपए होती थी और डीजल 40 पैसे प्रति लीटर मिलता था, लेकिन अब (2008 में) ट्रैक्टर का बेसिक मॉडल 2.5 लाख है और डीजल 34 रुपए लीटर। उर्वरक, कीटनाशक और बीज की कीमतों में कई गुणा वृद्धि हुई है।

1966 में किसानों को 24 घंटे बिजली मिलती थी, लेकिन अब तीन दिन में चार घंटे बिजली मिलती है। कई इलाकों में वह भी नहीं मिलती। पहले हम एक क्विटंल गेहूं बेचकर 8-9 बैग सीमेंट खरीद लेते थे, लेकिन अब 100 किलो गेहूं बेच कर 5 बैग सीमेंट भी नहीं खरीद पाते। पहले 250 रुपए में एक तोला सोना मिल जाता थी, जिसकी कीमत अब (2008 में) 13 हजार पहुंच गई है।

डाउन टू अर्थ: किसानों की समस्याओं के क्या कारण हैं?

टिकैत: गलत कृषि नीतियों के कारण किसानों की दशा बिगड़ी है। जब तक किसानों को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलेगा। तब तक इस किसानों की समस्या का समाधान नहीं होगा। 1966 में गेहूं का एमएसपी 76 रुपए क्विंटल और गन्ने का 13 रुपए क्विंटल था, लेकिन आज (2008 में) गेहूं का एमएसपी 1000 रुपए क्विंटल और गन्ने का 81.8 रुपए है। लेकिन मुझे लगता है कि सही एमएसपी गेहूं का 3000 रुपए और गन्ने का 250 रुपए प्रति क्विंटल होना चाहिए, लेकिन मैं यह बात खुल कर नहीं कह सकता है, क्योंकि ऐसा करने से हंगामा मच जाएगा कि किसानों अपने उत्पादों की काफी अधिक कीमत मांग रहे हैं, जबकि यह सही कीमत है, लेकिन किसान को लालची समझा जाने लगेगा।

इसलिए मुझे लगता है कि सरकार को 1966 के आधार पर कृषि में लागत और एमएसएपी तय करनी चाहिए। सरकार की राजकोषीय नीति किसान केंद्रित होनी चाहिए। मेरा मानना है कि 500 और 1000 रुपए के नोट किसानों के काम के नहीं हैं। नोट 1, 2, 5, 10 और 100 रुपए में ही होने चाहिए। बड़े नोटों की वजह से महंगाई बढ़ती है। अगर नोट छोटे रहेंगे तो कीमतें भी नहीं बढ़ेंगी। 

डाउन टू अर्थ: हरित क्रांति का क्या प्रभाव मानते हैं?

टिकैत: हरित क्रांति ने फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। मैं टैक्नोलॉजी के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन हरित क्रांति ने हमसे हमारी पारंपरिक खेती करने का तरीका छीन लिया। हमने बीज को संरक्षित करने का अधिकार खो दिया और हम पूरी तरह से बीज व कीटनाशक कंपनियों की दया पर निर्भर हो गए। सरकार धनी व शक्तिशाली लोगों के साथ है। विदेशी कंपनियों ने हमें डराने के लिए अच्छा जाल बिछाया है। हम एक सीजन से ज्यादा बीज का इस्तेमाल नहीं कर सके। हमारी अपनी पारंपरिक खाने पीने की आदत बदल गई है। बीज और कीटनाशक कंपनियों का फायदा बढ़ रहा है, लेकिन किसानों का नहीं, किसानों को शिक्षा नहीं मिल रही है, खाद्य सुरक्षा नहीं है और इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।

डाउन टू अर्थ: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों को सूदखोरों से कर्ज लेना पड़ता है?

टिकैत: किसान बैंक आदि से लोन ले सकते हैं, लेकिन किसी दलाल के बिना संभव नहीं होता। इसलिए वे स्थानीय लोगों से लोन लेते हैं। हां, ये लोग बहुत ज्यादा ब्याज लेते हैं, लेकिन किसानों की अपना स्वाभिमान होता है और वे बहुत ज्यादा जरूरत पड़ने पर ही सहायता मांगते हैं और उस समय ये लोग ही लोन देने के लिए आगे आते हैं।

डाउन टू अर्थ: लोन माफी योजना पर आपका क्या कहना है?

टिकैत: किसानों के लिए लोन माफी योजना कोई स्थायी  समाधान नहीं है। हमने केंद्रीय कृषि मंत्री (तत्कालीन) शरद पवार और प्रधानमंत्री (तत्कालीन) मनमोहन सिंह को बता दिया है कि सभी किसानों का लोन खत्म किया जाए और इसके बाद इस तरह प्रावधान किए जाएंगे कि किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिले। (जब डाउन टू अर्थ ने उनसे उनकी मांग के बारे में पूछा तो उन्होंने नाराजगी जताई। उन्होंने मांग को उपहासपूर्ण बताया और कहा कि किसानों का लाभ और हानि के बारे में बात करिए, मांग के बारे में नहीं)। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोन, लोन होता है, एक किसान को लोन लेने की जरूरत क्यों पड़ी? उसे उसकी फसल का सही दाम मिलना चाहिए और किसानों की लागत को नियंत्रित किया जाना चाहिए।

महेंद्र सिंह टिकैत के साक्षात्कार की दूसरी किस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें: किसानों को सब्सिडी नहीं, सही कीमत दिलाना चाहते थे महेंद्र सिंह टिकैत

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