महाराष्ट्र: पीला मोजेक वायरस से लाखों हेक्टेयर सोयाबीन पर संकट

पीला पोजेक रोग के कारण महाराष्ट्र में सोयाबीन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है और किसानों को लागत तक न निकलने का डर सता रहा है

By Mane Siddhanath Vaijinath

On: Monday 19 September 2022
 
महाराष्ट्र के लातूर जिले में सोयाबीन की फसल को पीला मोजेक रोग लग गया है। फोटो: माने सिद्धनाथ
महाराष्ट्र के लातूर जिले में सोयाबीन की फसल को पीला मोजेक रोग लग गया है। फोटो: माने सिद्धनाथ महाराष्ट्र के लातूर जिले में सोयाबीन की फसल को पीला मोजेक रोग लग गया है। फोटो: माने सिद्धनाथ

महाराष्ट्र राज्य में वर्ष 2022-23 के खरीफ मौसम में 48.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की फसल बोई गई है और फसल फूल आने की अवस्था में है, लेकिन कई जगहों सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक रोग की चपेट में आ गई है।

लातूर के किसान महारूद्र शेट्टे ने बताया, "मेरे पास कुल दस एकड़ खेती हैं, उसमें दो एकड़ में गन्ना और आठ एकड़ में सोयाबीन लगाई है। बुआई 15 जून को की थी, लेकिन तब गोगलगाय के कारण नुकसान हुआ और जो बचा हैं वो अब पीला मोजेक की चपेट में आ गया है। दो बार कीटनाशक डालने के बाद भी कोई असर नहीं हुआ।"

शेट्टे कहते हैं कि एक एकड़ सोयाबीन की बुआई से लेकर कटाई तक लगभग 20 हजार रुपये का खर्च आता है, लेकिन अब इस खर्च की वसूली हो पाएगी या नहीं, यह डर किसान को सता रहा है। 

सोयाबीन मोजेक पॉटीवायरस के कारण होता है। सोयाबीन के साथ-साथ यह अन्य दलहनी फसलों को भी प्रभावित करता है। रोग का प्रकोप मुख्य रूप से रोगग्रस्त बीजों के कारण होता है। इसके अलावा यदि तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है तो आमतौर पर रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। यदि रोग की गंभीरता बढ़ जाती है तो सोयाबीन की उपज 50 से 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

रोग के लक्षण: प्रारंभ में, शीर्ष पर युवा पत्तियों की नसें पीली हो जाती हैं। पत्तियों पर गहरे हरे धब्बों वाले उभरे हुए धब्बे दिखाई देते हैं। संक्रमित पेड़ों की पत्तियाँ सिकुड़ कर नीचे की ओर मुड़ जाती हैं। यदि रोग की गंभीरता बढ़ जाती है, तो पेड़ की चोटी और ऊपर के पास के पत्ते काट दिए जाते हैं और पत्ते झड़ जाते हैं और पेड़ सूख जाते हैं।

रोगग्रस्त पौधे अविकसित रह जाते हैं। ऐसे पौधे कम फली पैदा करते हैं। फलियां मुड़ी हुई, चपटी और फैली हुई दिखाई देती हैं। ऐसी फलियों के दानों की सतह पर धूसर काले धब्बे दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त वृक्षों की जड़ों पर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली गांठों की संख्या कम हो जाती है और वे आकार में छोटे रह जाते हैं। मोजेक प्रभावित पौधे, पत्ते, फली आसानी से अन्य कीटों और बीमारियों के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं।

फसल संरक्षण कृषि विज्ञान केंद्र, तुळजापुर, महाराष्ट्र के वैज्ञानिक डॉ. श्रीकृष्ण झगडे कहते हैं कि पीला मोजेक सफेद मक्खी से होने वाला एक वायरल रोग है, इसलिए यदि फसल 20 से 25 दिन पुरानी है, तो 5 प्रतिशत  निंबोली के अर्क का छिड़काव करने से सफेद मक्खी पत्ती पर बसने से रोकेगी। चूंकि सफेद मक्खी पीले रंग की ओर आकर्षित होती है, 20 से 25 पीली प्रति हेक्टेयर जाल बिछाना चाहिए। रासायनिक कीटनाशक में थायमेथोक्सम 25% wg 40 ग्राम कीटनाशक प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

उधर, राज्य में जून से अगस्त तक हुई भारी बारिश से खरीफ की फसल को भारी नुकसान हुआ है। इसके लिए राज्य सरकार ने 3500 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की है। प्रारंभिक अनुमान है कि सोयाबीन, तूर की खरीफ फसल लगभग 10 से 12 लाख हेक्टेयर का नुकसान हुआ है। 

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