पराली जलाने का इंतजार कर रहे लागत से त्रस्त पंजाब-हरियाणा के किसान

धान का रकबा भले ही इस बार घट गया हो लेकिन पंजाब में लंबी अवधि वाली धान किस्मों का दबदबा बढ़ा है। ऐसे में दीपावली के आस-पास पराली जलाने की घटनाएं तेजी पकड़ सकती हैं।

By Vivek Mishra

On: Monday 25 October 2021
 
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तेज हवाओं ने पराली की आग को और दहका दिया है, जैसे ही गांव में दाखिल हुए धुएं ने आंखों में जलन पैदा कर दी और सांस लेना दूभर होने लगा। पंजाब के गांवों में इन दिनों यह नजारा आम है। धान की कटाई हो चुकी है और घर के बाहर बैठे 64 वर्षीय किसान बलेंद्र सिंह अपने खेतों को निहार रहे हैं।

देश के प्रमुख चावल उत्पादक राज्य पंजाब - हरियाणा में कंबाईन मशीनें इन दिनों धान कटाई में व्यस्त हैं। धान की  विविध किस्मों के बीच कटाई में व्यस्त कंबाईन हार्वेस्टिंग मशीनें हर साल की तरह कृषि अवशेषों (पराली) को खेतों में छोड़ती जा रही हैं।

धान कटाई के साथ-साथ किसानों की धुकधुकी बढी हुई है क्योंकि इस बार ठंड की आहट कुछ पहले हो चुकी है और गेहूं की बिजाई के लिए उन्हें खेतों को साफ और तैयार करना है। लिहाजा कृषि लागत की महंगाई से त्रस्त पंजाब और हरियाणा के अधिकांश जिलों में किसानों ने खेतों में पराली को जलाने का काम शुरू कर दिया है।

पंजाब के तरण तारण जिले में परासौल गांव में और भी धान के खेतों में आग लगी हुई है। डाउन टू अर्थ ने बलेंद्र सिंह से पूछा पराली जलाने की तो मनाही है ?

किसान बलेंद्र सिंह कहते हैं “पराली में आग नहीं लगाएंगे तो क्या करेंगे? गेहूं का तो बंडल बन जाता है तो उसे घर में रख लेते हैं या बेच देते हैं। धान का न तो बंडल बनता है और न ही कहीं इसे बेच सकते हैं। एक एकड़ में करीब 24-25 कुंतल पराली निकल जाती है, इसे किसान घर में भी नहीं रख सकते, आग ही लगाना पड़ता है।”  

कोविड महामारी से बचाव नियमों के बीच पंजाब में बुआई 10 जून के बाद हुई थी, जिसमें लंबी अवधि वाली (140 से 160 दिन में पकने वाली) धान किस्मों का क्षेत्र बढ़ा है और छोटी अवधि वाली धान किस्मों का दायरा घटा है। ऐसे में अभी लंबी अवधि या देर से बोई जाने वाली धान किस्मों (पूसा 44, पीआर-121, बासमती - 1121) के खेतों में पराली का निपटान बाकी है।

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक 2021-22 में पंजाब में छोटी अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का रकबा प्रतिशत बीते वर्ष 2020 में 72 फीसदी था जो 2021 में घटकर 62 फीसदी हो गया है जबकि लंबी अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का रकबा प्रतिशत 2020 में 28 फीसदी था जो 2021 में बढ़कर 32 फीसदी हो गया है।

वहीं, सरकार भले ही कह रही हो कि उसने गांवों में सीमांत, लघु और मध्यम आकार वाले किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए हैप्पी सीडर और सुपर सीडर मशीनों की व्यवस्था कर दी गई है। लेकिन बलेंद्र सिंह इससे इत्तेफाक नहीं रखते। वह बताते हैं कि आजतक उन तक ऐसी कोई मशीन नहीं पहुंची। कुछ बड़े जिमीदारों (किसानों) को छोड़ दें तो यह सुविधा उन जैसे छोटे किसानों के लिए नहीं है।   

बलेंद्र सिंह पराली जलाने वाले अकेले किसान नहीं है। पंजाब के अमृतसर, तरण-तारण, लुधियाना, मोगा, जलंधर, और हरियाणा में करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल जिलों का दौरा करने के दौरान डाउन टू अर्थ ने पाया कि हर तरफ किसान पराली जला रहा है।

अमेरिकी अतंरिक्ष एजेंसी नासा के सेटेलाइट इमेज भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि जैसे ही धान की कटाई का सीजन शुरु हुआ पंजाब के अमृतसर, तरण-तारण और हरियाणा के कैथल और करनाल में सबसे पहले पराली में आग लगाने की घटनाएं दर्ज की गईं।

पराली जलाने का इंतजार कर रहे किसान

विजिबल इंफ्रारेड इमैजिंग रेडियोमीटर सूट (वीआईआईआरएस) के आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा और पंजाब में पराली में आग लगाने की घटनाओं में उतार-चढ़ाव जारी है। खासतौर से पंजाब में यह कुछ ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में वर्ष 2016 (15,377 घटनाएं) के बाद 2017 (10,621) में सर्वाधिक आग लगाने की घटनाएं हुईं। वर्ष 2018 में 3502 घटनाएं और वर्ष 2019 में 4042 घटनाएं हुईं। इन दोनों वर्षों में कुछ काबू रहा लेकिन वर्ष 2020 में तीन कृषि कानूनों के विरोध और धान क्षेत्र बढ़ने के साथ ही 2017 से भी ज्यादा आग लगाने की घटनाएं (11,664 घटनाएं) हुईं।

वहीं, 2021 में धान की बुआई का रकबा कम होने की वजह से आग की घटनाएं कम होने का अनुमान लगाया जा रहा है। कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) के मुताबिक पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में इस वर्ष 2020 के मुकाबले 7.7 फीसदी कम धान की बुआई हुई है। इसके अलावा गैर बासमती धान किस्मों से पराली में भी 12.4 फीसदी की कमी आएगी। ऐसे में आग लगने की घटनाओं में कमी दर्ज की जा सकती है।

हालांकि, डाउन टू अर्थ ने यात्रा के दौरान पाया कि अभी खासतौर से पंजाब में धान की छोटी अवधि वाली किस्मों की कटाई हुई है और उनकी पराली में आग लगाई गई है, 4 से 10 नवंबर के बीच आग लगाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। किसान लंबी अवधि वाली धान किस्मों की कटाई के बाद पराली में आग लगा सकता है।   

वआईआईआरएस के आंकड़ों के मुताबिक 22 अक्तूबर तक ही पंजाब में 5772 घटनाएं पराली में आग लगने की दर्ज हुई हैं। ऐसे में आने वाले वक्त में लंबी अवधि वाली धान किस्मों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने के साथ दिल्ली-एनसीआर की वायु प्रदूषण की मुसीबतें भी बढ़ सकती हैं।

डाउन टू अर्थ ने पाया कि उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों जगह भविष्य में विधानसभा चुनाव है और किसान नाराज हैं। ऐसे में पराली में आग लगाने की घटनाओं की रोकथाम को लेकर सरकार और प्रशासन का रवैया नरम बना हुआ है।

अमृतसर के छिब्बा गांव में पांच एकड़ के किसान गुरुबचन सिंह डाउन टू अर्थ से कहते हैं कि उन्होंने इस बार बासमती ( किस्म 1509) ज्यादा लगाई थी। उसकी पराली 2 से 3 फीट पहुंच जाती है ऐसे में खेतों में पाटना आसान नहीं है। वह कहते हैं “डीजल के भाव देखिए 100 रुपए के पार हैं। खेतों से पराली को हटाने के लिए किसान कितना तेल (ईंधन) फूंकेगा।”

 

तीन फसलों का चक्कर

पंजाब के फसली चक्र (धान-गेहूं) में अभी कोई बड़ा बदलाव नहीं है। लेकिन कई जगह किसान तीन फसलें भी ले रहे हैं। इनमें तरण-तारण, अमृतसर से जलंधर और लुधियाना हाई-वे की ओर बढ़ने पर मौजूद ब्लॉक और गांवों में धान की कटाई के बाद आलू-मटर की बुआई भी हो रही है। खासतौर से मालवा क्षेत्र में तीन फसलों पर ज्यादा जोर है। ऐसे में धान की वह किस्में जिससे किसानों को रबी सीजन में गेहूं की बुआई के लिए का ज्यादा दिन का मौका किसानों का मिल सकता है किसान उन्हें अपना रहे हैं और उसके बाद भी पराली में आग लगाए जाने का काम जारी है।

अमृतसर के किसान विज्ञान केंद्र में डॉक्टर नरिंदर पाल बताते हैं कि धान की जल्द तैयार होने वाली किस्मों को वही किसान अपना रहे हैं जो तीसरी फसल यानी सब्जी पैदा कर रहे हैं।

ऐसे में धान की ऐसी किस्में जो जल्दी तैयार हो जाती हैं किसान उनकी बुआई देरी से करता है और फिर पराली में उन्हें आग लगानी पड़ती है। इसी तरह मोगा के प्रोग्रेसिव रसपाल सिंह किसान बताते हैं कि 55 किल्ला (एकड़) उन्होंने अपने खेतों में तीन-चार से धान किस्में लगाई थीं। उन्होंने बताया कि बीते वर्ष पूसा-44 (लंबी अवधि 160 दिन में तैयार होने वाली) किस्म धान लगाई थी लेकिन इस बार उसकी जगह 35 एकड़ में पीआर-126 (छोटी अवधि में तैयार होने वाली किस्म) और बासमती 1509 में लगाई क्योंकि आलू की पैदावार करनी है।    

इसी तरह से तरण-तारण जिले में भी बलेंद्र सिंह बताते हैं कि आलू और मटर की पैदावार के लिए खेतों को जल्द तैयार करने से पहले पराली जलाना पड़ता है। बलेंद्र बताते हैं कि किसान कीमतों पर निर्भर है। इस बार तीसरी फसल के तौर पर वह सरसों की बुआई करेंगे क्योंकि इसकी कीमतें अच्छी मिल रही हैं। खेत खाली करना था तो उन्हें पराली जलानी पड़ी है।

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