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वैज्ञानिकों ने माना, किसानों के पारंपरिक ज्ञान से रुक सकता है जलवायु परिवर्तन

वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानों और स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान इससे निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं

By Dayanidhi

On: Tuesday 22 September 2020
 
Photo: Agnimirh Basu
Photo: Agnimirh Basu Photo: Agnimirh Basu

आधुनिक कृषि पद्धतियां आने के बाद से पारंपरिक फसलें और फसल प्रथाएं विलुप्त होती जा रही हैं। पर अब, जब हम जलवायु परिवर्तन से निपटने वाली किस्में और उपज बढ़ाने की बात करते हैं तो वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानों और स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान इससे निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं।

वैज्ञानिकों ने विभिन्न फसलों की किस्मों पर किसानों की जानकारी को महत्वपूर्ण बताया है। जिनकी अकसर इससे पहले वैज्ञानिकों द्वारा अनदेखी की जाती रही है।

शोधकर्ताओं का तर्क है कि फसलों के सुधार के लिए किसानों के ज्ञान और उच्च तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। फसलों को उगाने में प्रभावी ढंग से जलवायु से संबंधित खतरों का मुकाबला किया जा सकता है। साथ ही, इसे पौष्टिक खाद्य आपूर्ति के साथ जोड़ा जा सकता है। फसल सुधार में किसानों को शामिल कर इस तरह की संभावनाओं को बढ़ाया जा सकता है। इस तरह के प्रयोग से जलवायु से मुकाबला करने वाली नई किस्मों को अपनाया जाएगा, जिससे फसलों में सुधार और अधिक कुशलता से होगा।

एलायंस ऑफ बायोवेसिटी एंड इंटरनेशनल सेंटर फॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर से जुड़े कार्लो फड्डा ने कहा कि लैब में इस तहत के आधुनिक 'उत्कृष्ट' किस्मों को तेजी से उगाया जा सकता है, जो महत्वपूर्ण तरीके से उपज को बढ़ा सकती है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या वे किस्में और विशेषताएं किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो सकती हैं? क्या वे उन्हें उगाएंगे? दूसरी तरफ, पारंपरिक किस्में बदलती जलवायु परिस्थितियों का बेहतर ढ़ंग से सामना कर सकती हैं, लेकिन क्या ये किस्में उच्च उपज देने वाली हैं?

इथियोपिया में पहली बार ड्यूरम गेहूं उगाने के लिए इस्तेमाल बीज (ट्रायल फॉर नीड्स एप्रोच) ने पहले ही आश्चर्यजनक परिणाम दिए हैं। जब वैज्ञानिकों ने किसानों से उनकी राय लेने के लिए इथियोपिया बायोडायवर्सिटी इंस्टीट्यूट (ईबीआई) से प्राप्त उत्कृष्ट और पारंपरिक ड्यूरम गेहूं की किस्मों का चयन किया। तो पाया कि पारंपरिक किस्में, उत्कृष्ट किस्मों की तुलना में बेहतर हैं। राष्ट्रीय ड्यूरम गेहूं की पैदावार दोगुनी हो गई, जबकि यह किस्म प्रमुख बीमारियों से मुकाबला भी कर सकती है। यह शोध फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस में प्रकाशित हुआ है।

फड्डा कहते हैं कि व्यापक उत्पादन की स्थिति का सामना करने के लिए बड़े पैमाने पर बीज का उत्पादन करने की बजाय, हमें प्रत्येक जगह पर पैदावार को बढ़ाने के लिए, स्थानीय आधार पर किस्मों को खोजने की आवश्यकता है। परंपरागत रूप से किसान विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने और विभिन्न उत्पाद बनाने के लिए फसलों की एक सूची बनाते हैं।

जरूरत के लिए बीज (सीड्स फॉर नीड्स) दृष्टिकोण आगे चलकर जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने वाले लक्षणों वाली किस्में और अधिक उपज देने वाली किस्मों को अपनाना है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन किस्मों का किसान द्वारा चयन किए जाने के साथ-साथ, इनका क्षेत्र की स्थितियों से सामना करने की बेहतर क्षमता होनी चाहिए। यदि परिणाम बेहतर रहते हैं तो निश्चित रूप से खाद्य आपूर्ति में वृद्धि होगी।

फड्डा कहते हैं जलवायु परिवर्तन एक बदलाव है, और इससे मुकाबला करने के लिए हमें एक गतिशील प्रक्रिया की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोण एक इलाके के भीतर की स्थितियों से निपटने के लिए नए उपाय बतलाता है। इस दृष्टिकोण के साथ, बढ़ते जलवायु परिवर्तन को देखते हुए, स्थानीय परिस्थितियों के लिए हमेशा अच्छी तरह से अनुकूलित फसल की किस्में होंगी, साथ में उच्च तकनीकी दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान भी इसमें समाहित होगा।

इटली के पीसा में जीव विज्ञान संस्थान और आनुवंशिकीविद माटेयो डेल अक्का कहते हैं कि यह दृष्टिकोण किसान समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक आधार को भी जोड़ता है। इस विधि में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए कृषि प्रणालियों के स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आधुनिक तरीके से फसल उगाने और अन्य विधियां एक दूसरे के पूरक हो सकती हैं।

डिजिटल उपकरणों के आगमन के साथ शोधकर्ताओं का कहना है कि किसान 'नागरिक वैज्ञानिक' जलवायु-प्रेरित तनाव के प्रति पर्याप्त और विश्वसनीय जानकारी प्रदान कर सकते हैं। इथियोपिया, होंडुरास और भारत में किसानों के साथ किए गए शोध से पता चलता है कि वे परीक्षण का हिस्सा बनने, शोध में योगदान देने में उत्सुक थे।

इथियोपिया में 'सीड्स फॉर नीड्स' दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए गेहूं की दो किस्मों को आवश्यक औसत समय से पहले ही जारी कर दिया गया है। अब इस दृष्टिकोण का उपयोग पूरे अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन में किया जा रहा है।