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पड़ताल: क्यों सरकार के दामन से जुड़ा रहना चाहता है किसान

किसान संगठनों का कहना है कि तीनों कानूनों के माध्यम से सरकार कृषि क्षेत्र से अपना पल्ला झाड़ कर कॉरपोरेट्स के हवाले करना चाहती है

By Richard Mahapatra, Raju Sajwan

On: Wednesday 23 December 2020
 
Singhu Border
दिल्ली-सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों के मंच को निहारता एक किसान। फोटो: धनंजय दिल्ली-सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों के मंच को निहारता एक किसान। फोटो: धनंजय

हाल ही में बने तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर बैठ गया है। उन्हें दिल्ली के भीतर नहीं घुसने दिया जा रहा है। सरकार से कई दौर की वार्ता हो चुकी है। सरकार कानूनों में संशोधन को तैयार है, लेकिन किसान तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े हैं। किसान संगठनों का कहना है कि तीनों कानूनों के माध्यम से सरकार कृषि क्षेत्र से अपना पल्ला झाड़ कर कॉरपोरेट्स के हवाले करना चाहती है, लेकिन आखिर किसान सरकार के दामन से क्यों जुड़ा रहना चाहता है। डाउन टू अर्थ ने कारण जानने के लिए व्यापक पड़ताल की। पढ़ें, इस पड़ताल की पहली कड़ी-

किसानों का कहना है कि सरकार किसानों को न केवल अपना समर्थन जारी रखें, बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी देने वाला कानून भी लेकर आए, ताकि किसान से कोई भी व्यापारी एमएसपी से नीचे खरीद न कर सके।

दिलचस्प बात यह है कि देश के सबसे अमीर किसानों वाले प्रदेश पंजाब हो या सबसे गरीब इलाके बुंदेलखंड का किसान हो। दोनों ही इलाके के किसान सरकार से समर्थन जारी रखने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे हुए हैं। आखिर क्यों पंजाब के किसान एमएसपी की मांग पर टिके हुए हैं। पिता और चाचा के बीच जमीन का बंटवारा होने के बाद सुखदीप सिंह के पास अपनी केवल तीन एकड़ खेती बची है, लेकिन वह लगभग 25 एकड़ खेती लीज पर लेकर किसी भी बड़े किसान से मुकाबला करते हैं। वह कहते हैं कि हम केवल गेहूं और धान पर फोकस इसलिए करते हैं, क्योंकि इन दोनों फसलों की खरीद हो जाती है। लेकिन दूसरी फसलों की खरीद नहीं होती।

सुखदीप कहते हैं कि इस बार मक्का 600 रुपए क्विंटल बिका, जबकि एमएसपी 1,850 रुपए क्विंवटल है। नरमा (कपास) की एमएसपी 5,250 है, जबकि सरकारी खरीद न होने के कारण 3,500 से 4,800 रुपए में खरीदी ज रही है। दाल की एमएसपी 6,500 रुपए क्विंटल है, लेकिन खरीद 3,500 से 4,200 रुपए में की जा रही है।

सुखदीप कहते हैं कि हम भी फसलों में बदलाव करना चाहते हैं, लेकिन अगर रेट नहीं मिलेगा तो घाटा होगा और घाटा होने पर पंजाब का किसान भी खेती करना छोड़ देगा। यही वजह है कि हम चाहते हैं कि सरकार एमएसपी पर खरीद करे या कानून बना दे कि कोई भी व्यापारी एमएसपी से नीचे खरीदेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। पिछले कुछ सालों के दौरान फसल की लागत तेजी से बढ़ी है। डीजल के दाम बढ़े हैं, डीएपी की कीमत बढ़ी है, कीटनाशक महंगे हो रहे हैं। मजदूरी बढ़ गई है। लेकिन आमदनी नहीं बढ़ रही है।

संगरूर जिले के सुनाम तहसील के गांव छाजली निवासी बलविंदर सिंह भी अपने गांव के साथियों के साथ संघू बॉर्डर में जमे हैं। वह कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से बासमती धान का अच्छा रेट मिल रहा था, मैंने भी बासमती लगाना शुरू कर दिया, लेकिन तीन-चार साल से लगातार बासमती धान की कीमत कम हो रही है। पिछले साल जो धान 2,500 रुपए प्रति क्विंटल बिकी थी, वहीं इस बार मोटा धान के एमएसपी रेट से भी कम कीमत पर बिकी। अब बताइए, इससे बेहतर तो यही होता कि मैं भी मोटा धान ही लगाता, ताकि एमएसपी पर बिक जाता। यही हमारी डिमांड है कि जो भी फसल खरीदी जाए, उसका न्यूनतम समर्थन मूल्य हो, ताकि हमें इस बात का पता हो कि कम से कम यह रेट तो हमें मिलेगा।

तरणतारण जिले के गांव दबेरशाह से आए बलदेव सिंह कहते हैं कि कुछ साल पहले उन्होंने उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में 10 एकड़ जमीन खरीदी थी। वहां वह गेहूं, धान, गन्ने की खेती करते हैं। इस बार उन्होंने वहां धान लगाई थी। लेकिन इसमें उन्हें लगभग दो लाख का नुकसान हो गया, क्योंकि  इस बार वहां धान की कीमत 1,200 रुपए क्विंटल से अधिक नहीं मिली। उन्होंने कहा कि अगर पूरे देश में एमएसपी पर खरीद हो तो उन्हें नुकसान नहीं उठाना पड़ता। वह कहते हैं कि पिछले सालों के मुकाबले इस साल लागत भी अधिक आई और रेट भी नहीं मिला। इससे उनका नुकसान बढ़ गया। वह कहते हैं कि पंजाब में धान की सरकारी खरीद होती है तो कुछ मुनाफा हो जाता है, लेकिन यूपी में तो खरीद ही नहीं होती, इसलिए हमेशा एमएसपी से कम कीमत पर बेचनी पड़ती है।

बलदेव कहते हैं कि पंजाब के मुकाबले यूपी में खेती करना वैसे भी महंगा है, क्योंकि वहां 1,700 रुपए महीना बिजली का बिल भरना पड़ता है, जबकि पंजाब में बिजली मुफ्त है। उत्तर प्रदेश में आवारा जानवरों से फसल बचाने के लिए खेतों के चारों ओर तारें लगानी पड़ती है, जो अतिरिक्त खर्चा है। हालांकि तब भी आवारा जानवर नहीं रुकते और फसलों को बर्बाद कर देते हैं। वहीं सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि किसान के लिए तो कुदरत की मार भी बहुत दुखदायी होती है। उन्होंने अपने खेत पर धान की वैरायटी 1509 लगाई गई थी, जो हर साल लगभग 24 क्विंटल प्रति एकड़ होती थी, इस बार जैसे ही फसल तैयार हुई, तेज हवाएं चलने लगी और फसल लेट गई। इस बार एक एकड़ में केवल 14 क्विंटल ही निकली। रही-सही कसर व्यापारी ने निकाल दी। जिस व्यापारी ने पिछले साल 2,500 रुपए क्विंटल खरीदी थी, इस साल केवल 1,800 रुपए क्विंटल ही खरीदी। वह कहते हैं कि अगर व्यापारी को एमएसपी पर खरीदने के लिए बाध्य किया जाता तो किसान को कम से कम एक रेट तो मिल जाता।

सुखदीप सिंह कहते हैं कि पेट्रोल कंपनियां भी हमारी मजबूरी का फायदा उठाती है। अप्रैल 2020 में डीजल की कीमत 61.60 रुपए प्रति लीटर थी, जैसे ही फसल की कटाई शुरू हुई और खेतों में ट्रेक्टर चलने लगे तो डीजल का रेट 73 रुपए तक बढ़ गया। इसके बाद जैसे ही धान की बिजाई शुरू हुई, तब डीजल का रेट बढ़ गया। इसी तरह छह साल पहले तक डीएपी खाद का रेट लगभग 1,400 रुपए था, जो बढ़ कर 2,400 रुपए हो चुका है। यूरिया की कीमत पहले 267 रुपए बोरी था, जिसे बढ़ा कर 350 रुपए कर दिया और जिस बोरी में पहले 50 किलोग्राम यूरिया आता था, उसे अब 45 किलोग्राम कर दिया गया है। मजदूरी इस साल दोगुनी हो गई है। पहले मजदूर 2,000 रुपए प्रति एकड़ लेते थे, इस बार 4,000 से 4,500 रुपए प्रति एकड़ मजदूरी ली गई। किसान की लागत बढ़ रही है, लेकिन उपज की कीमत बढ़ने की बजाय घट गई।

खेती की बढ़ती लागत से पंजाब का किसान परेशान है तो मध्यप्रदेश का किसान भी। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले से दिल्ली आ रहे बलबीर केन भी कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से लगातार लागत बढ़ रही है। बीज, खाद, डीजल सब महंगा हो रहा है और फसल की कीमत कम हो रही है। उन्होंने भी अपने खेत में बासमती लगाया था। वह कहते हैं कि जब तक किसान अपनी फसल बेच रहा था, तब तक बासमती 1,700 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही थी और जब किसानों से खरीद कर व्यापारी अब आगे बेच रहा है तो कीमत 2,700 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है। ऐसा लगभग हर बार हर फसल में होता है। किसान छला जाता है, लेकिन अगर सभी फसलों पर एमएसपी की गारंटी हो तो व्यापारी उस कीमत से कम पर नहीं खरीद पाएगा। कम से कम किसान को लागत से कुछ अधिक कीमत मिल जाएगी।

अगली कड़ी में पढ़ें - पंजाब-हरियाणा जैसा मंडी सिस्टम क्यों चाहते हैं दूसरे राज्यों के किसान?