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कौन लिख रहा है किसानों का मर्सिया

एक किसान के पास अब निवेश के लिए आधार पूंजी भी नहीं है और न ही उसमें कृषि क्षेत्र में वापस जाने के लिए जोखिम लेने की क्षमता है

By Richard Mahapatra

On: Friday 25 September 2020
 

अशोक दलवाई के नेतृत्व में बनी “द कमेटी ऑन डबलिंग फार्मर्स इनकम” की पहली रिपोर्ट में 100 विशेषज्ञों के रिसर्च और इनपुट का उपयोग किया गया थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि 2004-2014 के दौरान देश के कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक विकास हुआ। रिपोर्ट इसे सेक्टर का “रिकवरी फेज” कहती है। ये एक ऐसा शब्द है, जो इसे ऐतिहासिक बनाता है। ये रिपोर्ट, किसानों की आय दोगुना करने के तरीकों का सुझाव देने से ज्यादा, भारतीय कृषि की हालत पर आंख खोलती है। डाउन टू अर्थ यहां देश की कृषि से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहा है, जिनकी खबरें आमतौर पर सामने नहीं आतीं

किसान घटे, कृषि मजदूर बढ़े

कोई भी राष्ट्र अपनी कृषि और किसानों से समझौता नहीं कर सकता और भारत जैसे देश में तो बिल्कुल भी नहीं। भारत में, जहां 1951 में 70 मिलियन (7 करोड़ परिवार) हाउसहोल्ड (घर) कृषि से जुड़े हुए थे, वहीं 2011 में ये संख्या 11.9 करोड़ हो गई। इसके अलावा, भूमिहीन कृषि मजदूर भी हैं, जिनकी संख्या 1951 में 2.73 करोड़ थी और 2011 में बढ़कर ये संख्या 14.43 करोड़ हो गई। भारत की इतनी बड़ी आबादी का कल्याण एक मजबूत कृषि विकास रणनीति से ही हो सकती है, जो आय वृद्धि की दृष्टिकोण से प्रेरित हो।


भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए कृषि आजीविका का स्रोत बनी रही।  2014-15 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस सेक्टर ने करीब 13 फीसदी का योगदान दिया था। 1971 से कृषि में लगे श्रमिकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि, 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में कमी आई है।  कृषि मजदूरों की संख्या 107 मिलियन से बढ़कर 144 मिलियन हो गई। इसके विपरीत, कृषि मजदूरों की संख्या 2004-05 के 92.7 मिलियन से घटकर 2011-12 में 78.2 मिलियन हो गई। ये दर्शाता है कि प्रति वर्ष लगभग 22 लाख कृषि मजदूरों ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया। उसी समय, रोजगार और बेरोजगारी पर एनएसएसओ सर्वेक्षण के अनुसार, 2004-05 से 2011-12 के दौरान खेती करने वालों की संख्या प्रति वर्ष 1.80 प्रतिशत की दर से घटती गई। 1967-71 के बाद, हाल के दशक में कृषि में लगे किसानों की संख्या में नकारात्मक वृद्धि देखी गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि लोग खेती से दूर जा रहे हैं।  

किसानों की आय 7 रुपये प्रति माह

गैर-कृषि मजदूर, किसान से तीन गुना अधिक कमाता है

आइए, भारत में एक किसान की आय को देखें।  “रिकवरी फेज” के दौरान भी,  एक कृषक परिवार का एक सदस्य लगभग 214 रुपये प्रति माह कमाता था। लेकिन, उसका खर्च करीब 207 रुपये था।

सरल भाषा में कहें तो एक किसान की डिस्पोजल मासिक आय 7 रुपए थी। 2015 के बाद से, भारत में दो भयंकर सूखे पड़े। बेमौसम बरसात से और अन्य संबंधित घटनाओं के कारण फसल बर्बाद होने की लगभग 600 घटनाएं हुईं। और अंत में बंपर फसल के दो साल के दौरान किसानों को उचित कीमत ही नहीं मिली।

इसका मतलब है कि एक किसान के पास अब निवेश के लिए आधार पूंजी भी नहीं है और न ही उसमें कृषि क्षेत्र में वापस जाने के लिए जोखिम लेने की क्षमता है। इससे संकट में बढ़ोतरी हुई, जिसने असंतोष को और अधिक बढ़ा दिया।  

अक्सर यह महसूस किया जाता है कि कृषि आय और गैर-कृषि आय के बीच असमानता बढ़ रही है और जो लोग कृषि क्षेत्र से बाहर काम करते हैं, वे उन लोगों की तुलना में बहुत तेजी से प्रगति कर रहे हैं, जो कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। 1983-84 में एक मजदूर की कमाई से तीन गुना अधिक किसान कमाता था। एक गैर-कृषि मजदूर उन किसानों या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा कमाई गई आय से तीन गुना अधिक कमाता था, जो मुख्य रूप से कृषि से जुड़े हुए थे।

हाल के इतिहास में पहली बार, अपेक्षाकृत अमीर किसान अपने उत्पादों के बेहतर मूल्य के लिए सड़क पर विरोध कर रहे थे। दलवाई समिति की रिपोर्ट बताती है कि मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए, खाद्यान्न आयात करने की सरकार के कदम ने घरेलू किसानों के बाजार को कमजोर किया है। भारत का कृषि उत्पादन का निर्यात कम हो गया है। यह 2004-2014 के दौरान, पांच गुना वृद्धि दर्ज करते हुए 50,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 260,000 करोड़ रुपए हो गया था। एक साल में, यानी 2015-16 में ये 210,000 करोड़ रुपए तक आ गया। इसका अर्थ है कि बाजार को 50,000 करोड़ रुपए का संभावित नुकसान हुआ।  

दूसरी ओर, कृषि आयात में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। यह 2004-5 में 30,000 करोड़ रुपए था, जो 2013-14 में बढ़कर 90,000 करोड़ रुपए हो गया। यह यूपीए-2 सरकार का अंतिम साल था। 2015-16 में, यह बढ़कर 150,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

करीब 22 प्रतिशत किसान गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। किसानों की आय में गिरावट को देखते हुए, आय दोगुना करने का वादा “न्यू इंडिया” के लिए एक और भव्य योजना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कृषि विकास ही किसानों की गंभीर गरीबी कम करने का काम कर सकता है।

बागवानी: मुख्य संचालक

अपने उत्पाद को बेचने में सक्षम नहीं होना ही किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा है

लगातार छह साल तक, बागवानी (फल और सब्जियां) उत्पादन अनाज उत्पादन से आगे रहा है। हाल के समय में, बागवानी का उदय, कृषि विकास का एक कम स्वीकार्य पहलू रहा है। विशेषकर 2004-14 के उच्च विकास चरण के दौरान। हालांकि यह सिर्फ खेती के 20 प्रतिशत हिस्से को ही कवर करता है, लेकिन यह कृषि जीडीपी में एक तिहाई से भी ज्यादा का योगदान देता है। पशुधन के साथ, कृषि के इन दो उपक्षेत्रों में वृद्धि जारी रही है और ये अधिकतम रोजगार भी दे रहे हैं। देश में फलों और सब्जियों का उत्पादन, खाद्यान्न से आगे निकल गया है। कृषि मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी एक बयान में कहा गया है कि वर्ष 2016-17 (पूर्वानुमान) के दौरान 300.6 मिलियन टन बागवानी फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक है।  

बागवानी किसानों की सबसे बड़ी चुनौती बिक्री और फसल होने के बाद में होने वाली हानि (बर्बादी) है। इससे यह किसानों के लिए कम आकर्षक सेक्टर बन जाता है। हालांकि, सरकार ये बात गर्व के साथ कहती है कि भारत दुनिया में सब्जियों और फलों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, लेकिन यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि फसल पैदा होने के बाद होने वाली बर्बादी की वजह से फल और सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता काफी कम है। फल और सब्जियों की बर्बादी कुल उत्पादन का लगभग 25 से 30 प्रतिशत होता है।  

फल और सब्जियों की ये बर्बादी कोल्ड चेन (शीत गृह) की संख्या में कमी, कमजोर अवसंरचना, अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता, खेतों के निकट कोल्ड स्टोरेज का न होना और कमजोर परिवहन साधन की वजह से होती है। किसानों की आय दोगुना करने के लिए बनी कमेटी के मुताबिक, “अखिल भारतीय स्तर पर, किसानों को 34% फल, 44.6%,सब्जियां और 40 फीसदी फल और  सब्जी के लिए मौद्रिक लाभ नहीं मिल पाता है। यानी, इतनी मात्रा में फल और सब्जियां किसान बेच नहीं पाते या बर्बाद हो जाती है।”  

इसका मतलब है कि हर साल, किसानों को अपने उत्पाद नहीं बेच पाने के कारण 63,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो जाता है, जिसके लिए उन्होंने पहले ही निवेश किया होता है। इस चौंकाने वाले आंकड़े को ऐसे समझ सकते है कि यह राशि फसल कटाई के बाद होने वाली बर्बादी से बचने के लिए आवश्यक कोल्ड चेन अवसंरचना उपलब्ध कराने के लिए जरूरी निवेश का 70 प्रतिशत है। यह किसानों द्वारा किए जा रहे व्यापक विरोध प्रदर्शन की व्याख्या करता है। मिर्च, आलू और प्याज की कम कीमत इसके पीछे प्रमुख कारणों में से एक थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में जहां 628 कृषि से जुड़े प्रदर्शन हुए थे, वहीं 2016 में इसमें 670 फीसदी बढ़ोतरी हुई और ये संख्या बढ़कर 4,837 हो गई थी। 

दोगुनी आय: एक नया सौदा

कृषि योग्य भूमि का 60 प्रतिशत हिस्सा बारिश पर निर्भर

2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे महत्वाकांक्षी राजनीतिक वादा है। लेकिन दलवाई समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों को देखते हुए, यह एक मुश्किल चुनौती प्रतीत होती है, हालांकि यह संभव है। इन रिपोर्टों के अनुसार, इसमें कृषि के लिए बड़े पैमाने पर निजी और सार्वजनिक खर्च को शामिल किया गया है, जिसने लगातार कम निवेश नहीं देखा है। कृषि से कम होती आय के कारण, किसान इस आजीविका को छोड़ रहे हैं। इसलिए, पहले उन्हें खेतों तक वापस लाया जाना चाहिए और फिर आय बढ़ाने के लिए काम किए जाने चाहिए, ताकि वे खेती जारी रखें।

नीति आयोग के अर्थशास्त्री रमेश चंद, एसके श्रीवास्तव और जसपाल सिंह ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन और रोजगार सृजन पर इसके प्रभावों पर एक चर्चा पत्र जारी किया था। इस पत्र के अनुसार, 1970-71 से 2011-12 के दौरान, “भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था 2004-05 की कीमतों पर 3,199 खरब रुपये से बढ़कर 21,107 खरब हो गई।” यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सात गुना वृद्धि थी। अब इस वृद्धि की तुलना रोजगार वृद्धि के साथ करें।  इसी अवधि में ये 19.1 करोड़ से बढ़कर 33.6 करोड़ हो गई। दलवाई समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, “किसानों की आय को दोगुनी करने की रणनीति के तहत मुख्य रूप से खेती की व्यवहार्यता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इसलिए, इस रणनीति का उद्देश्य कृषि आय का अनुपात गैर-कृषि आय के 60 से 70 प्रतिशत मौजूदा दर को बढ़ाना चाहिए।” इसी के साथ, इस विकास रणनीति को समानता पर भी ध्यान देना चाहिए, जैसे कम विकसित क्षेत्रों में उच्च कृषि विकास को बढ़ावा देना, जिसमें बारिश पर निर्भर क्षेत्रों सहित, सीमांत और छोटे भूमि धारक भी शामिल हों।

भारत की खेती योग्य भूमि का 60 प्रतिशत हिस्सा बारिश पर निर्भर है और इन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं और इन्हें सूखे का सामना करना पड़ रहा है। ये वो क्षेत्र है, जहां सरकार वर्तमान में हरित क्रांति 2 को क्रियान्वित कर रही है। 

 

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की लक्ष्मी साहू का कहना है कि उनके पति ने जून 2017 को आत्महत्या कर ली। क्योंकि वह 4.48 लाख रुपए का कृषि ऋण चुकाने में असमर्थ थे (पुरुषोत्तम ठाकुर)

 

प्रदर्शनों से निपटने का तरीका

मध्य प्रदेश के मंदसौर में पिछले साल भड़की गुस्से की चिंगारी अभी शांत नहीं हुई है। मंदसौर की जमीन राज्य के बाकी जिलों से उपजाऊ हैं और यहां के किसान दूसरे जिलों की तुलना में संपन्न हैं। 6 जून 2017 को किसानों के उग्र प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस ने गोलियां चला दीं जिसमें छह लोगों की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी किसान कर्ज माफी और अपनी उपज के सही दाम की मांग कर रहे थे। बंपर उत्पादन के बाद प्याज के दाम गिरने और खरीदार न मिलने पर किसानों ने यह प्रदर्शन किया था। पुलिस की गोली से मारे गए लोगों में बरखेड़ा पंत गांव के अभिषेक पाटीदार भी शामिल थे।

मौके पर अभिषेक के 30 वर्षीय भाई मधुसूदन भी थे। वह बताते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 14 जून को सांत्वना देने उनके घर आए थे। उन्होंने परिवार के सदस्यों को नौकरी और फायरिंग करने वाले पुलिसवालों पर मुकदमा दर्ज करने का आश्वासन दिया था। लेकिन अब तक न तो पुलिसवालों पर कार्रवाई हुई है और न ही परिवार के किसी सदस्य को नौकरी दी गई है। अभिषेक के 80 वर्षीय दादा भवरलाल पाटीदार कहते हैं “कोई दूसरी सरकार किसानों पर गोली नहीं चलाती। प्रदर्शन के छह महीने बाद भी किसानों के मुद्दे अनसुलझे हैं।”  

मध्य प्रदेश क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एमपीआरसीबी) के अनुसार, पिछले 15 साल में राज्य में 18,000 किसानों ने खुदकुशी की है। फरवरी 2016 से फरवरी 2017 के बीच करीब 2,000 किसान और खेतीहर मजदूर राज्य में आत्महत्या कर चुके हैं। 2013-14 को छोड़कर पिछले 15 साल में हर साल सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इससे किसान बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पिछले एक साल के दौरान राज्य में किसानों के 25 से ज्यादा विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। मीडिया में आई खबरों की मानें तो मंदसौर गोलीकांड के बाद 160 किसान आत्महत्या कर चुके हैं जबकि 27 ने जान देने की कोशिश की है।

कक्काजी बताते हैं “जब शिवराज सिंह चौहान पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब राज्य के कुल किसानों पर 2,000 करोड़ रुपए का कर्ज था। आज यह बढ़कर 44,000 करोड़ रुपए हो गया है।”  

गैर राजनीतिक संगठन आम किसान यूनियन के संस्थापक केदार सिरोही मध्य प्रदेश में किसानों के हित में काम कर रहे हैं। उनका कहना है “सरकार दावा करती है कि उसने किसानों के हित में कुछ कदम उठाए हैं। लेकिन तथ्य यह है कि किसानों का व्यापारियों और नौकरशाहों द्वारा शोषण किया जा रहा है।” फसलों के दाम में उतार-चढ़ाव का देखते हुए राज्य सरकार ने भावांतर योजना शुरू की है। मध्य प्रदेश कृषि विभाग में प्रमुख सचिव राजेश राजौरा बताते हैं, “अगर फसल का विक्रय मूल्य एमएसपी से कम रहता है तो इसके अंतर की भरपाई सरकार करेगी।

यह अंतर सीधा किसान के खाते में भेज दिया जाएगा।” राजौरा बताते हैं कि इससे किसान को अपनी फसल का उचित मूल्य मिलेगा। करीब 40 प्रतिशत किसानों ने योजना के तहत पंजीकरण करा लिया है। वह बताते हैं कि तिलहन और दलहन समेत आठ फसलों का भुगतान सरकार करेगी। बागवानी की फसलों को भी इस योजना के दायरे में लाया जाएगा।  

कक्काजी बताते हैं “सरकार भावांतर योजना के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन इसके लागू होने के बाद फसलों के दाम 400 प्रतिशत तक गिर गए हैं। जो उड़द 5,500 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही थी वह योजना लागू होने के बाद 1,000 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही है। चना और मूंग भी सस्ती हो गई है। सरकार ने जिन फसलों की खरीद की है, उसके दाम भी अब तक नहीं मिले हैं। यह योजना मंडी एक्ट का सरासर उल्लंघन है।

सीएम के खिलाफ हमने उच्च न्यायालय में केस किया है।” वह बताते हैं, “प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद किसान 10 से 15 गुणा कर्जदार हो गया है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में किसान आत्महत्या की दर में तेजी

से बढ़ोतरी हो रही है।” कक्काजी ने बताया कि राष्ट्रीय किसान महासंघ के तहत आंदोलन में शामिल हुए संगठनों की केवल दो ही मांगें हैं। पहली, किसानों को उसकी फसल लागत का 50 प्रतिशत लाभकारी मूल्य और दूसरी, पूरे देश के किसानों को ऋण मुक्ति।  

चिंता की बात यह भी है कि पिछले साल दिसंबर में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि सामान्य मानसून और अत्यधिक पैदावार के कारण आगे भी किसानों को इच्छानुसार दाम नहीं मिलेंगे। यानी किसानों की नाराजगी कम होने के बजाय बढ़ेगी और कृषि संकट चुनावी मुद्दा बनेगा। कुछ समय पहले किसान संगठनों ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिलकर कुछ आंकड़े सौंपे हैं, मसलन एक किसान की दैनिक आमदनी महज 50 रुपए है। इन संगठनों ने चेता भी दिया है कि किसान इस भ्रम में नहीं है कि सरकार उनके बारे में सोच रही है। किसानों की चेतावनी बताती है कि बीजेपी के लिए आगे का रास्ता बेहद मुश्किल है।

किसानों ने क्यों नकारा गुजरात मॉडल
 

मोहम्मद कलीम सिद्दीकी

गुजरात में बीजेपी को किसानों की नाराजगी का खामियाजा विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा। दरअसल जिस गुजरात मॉडल का बीजेपी ढोल पीट रही है, उसे किसानों ने सबसे अधिक खारिज किया। इसकी वजह भी है। गुजरात की मुख्य फसल कपास और मूंगफली है। गुजरात खेडूत समाज के महासचिव सागर रबारी के अनुसार, राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बहुत कम मात्रा में खरीदी करती है। किसान को तुरंत पैसों की आवश्यकता होती है, लेकिन सरकार चेक से पैसे देती है जो समय पर नहीं मिल पाता। इस कारण किसान खुले बाजार में नुकसान में ही बेचकर चला जाता है।

भावनगर के गरियाधार के किसान रमेश भाई वल्लभ भाई वीरानी बताते हैं कि आज भी सिंचाई बारिश आधारित है। बारिश देर सवेर होने पर किसानों का नुकसान होता है। मूंगफली का न्यूनतम समर्थन मूल्य 900 रुपये प्रति 20 किलो और खुले बाजार में 700 रुपये के भाव में लागत नहीं मिल पाती। यदि 1400-1500 का भाव मिले तो किसान को लाभ होगा। सरकार 10 से 15 प्रतिशत सिर्फ दिखावे के लिए खरीदी करती है। रमेश भाई मानते हैं कि इस वर्ष कपास की खेती अच्छी हुई है। पाकिस्तान और चीन में मांग बढ़ने के कारण किसानों को कपास का भाव 5,200 रुपये तक मिला जबकि इस वर्ष कपास न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल था।


नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात में 1998 से 2010 तक दस हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। क्रांति संस्था के भरत सिंह झाला को आरटीआई के माध्यम से मिली जानकारी के अनुसार, गुजरात में वर्ष 2003–2007 के दरमियान 2479 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2008–12 के बीच 152 और 2013–16 के बीच 89 किसान आत्महत्या के केस दर्ज हुए। गुजरात में हो रही किसानों की आत्महत्या लेकर क्रांति संस्था ने जुलाई 2014 में गुजरात हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में आत्महत्या रोकने के लिए नीति बनाए जाने की मांग की गई थी जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।

उसके बाद क्रांति संस्था सुप्रीम कोर्ट गई। 27 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सहित अन्य राज्यों को भी किसान आत्महत्या रोकने के लिए 6 हफ्तों के भीतर नीति बनाने का आदेश दिया लेकिन अब तक किसी भी राज्य या केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं किया। भरत सिंह झाला कहते हैं मोदी सरकार को तीन तलाक पर कानून बनाने की जल्दी है परन्तु किसानों की आत्महत्या दिखाई नहीं देती।  

इसी वर्ष फरवरी में सानंद के 32 गांव के 4-5 हजार किसान नर्मदा का पानी किसानों को न देकर उद्योग को दिए जाने के खिलाफ सानंद से गांधीनगर तक पैदल मार्च कर रहे थे लेकिन उपरथल गांव के पास ही पुलिस ने बल उपयोग कर उन्हें रोक दिया।  लाठी चार्ज में सैकड़ों किसान घायल भी हुए थे। 22 किसानों को धारा 307 के तहत गिरफ्तार कर मुकदमा भी दर्ज किया था।

गुजरात में आदिवासियों की जनसंख्या 15 प्रतिशत है। इनकी मुख्य समस्या जल, जंगल और जमीन के अलावा नेताओं और प्रशासन के सहयोग से आदिवासी इलाकों में चलने वाली चिट फंड कंपनियों द्वारा गरीब बेरोजगार आदिवासियों को लूटे जाने का है। आदिवासी किसान संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष रोमेल सुतारिया ने 22,000 चिट फंड पीड़ित आदिवासियों की सूची गुजरात पुलिस सूरत रेंज के आईजी ज्ञानेंद्र सिंह मलिक को सौंपी है लेकिन अब तक संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी के कारण ही चिट फंड कंपनियों को फलने-फूलने का मौका मिलता है।

उड़ीसा स्थित सामाजिक कार्यकर्ता आलोक जेना ने सुप्रीम कोर्ट में 78 चिट फंड कंपनियों के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। 78 में से 17 गुजरात की थी। दरअसल, गुजरात मॉडल में लाभार्थी वर्ग ही सुखी संपन्न है, अन्य वर्ग पीड़ित हैं। इन पीड़ितों की उपेक्षा के चलते ही भारतीय जनता पार्टी दहाई के आंकड़े पर सिमट गई है।

(लेखक इंसाफ फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं)

 

 नोट : यह स्टोरी फरवरी 2018 में डाउन टू अर्थ, हिंदी पत्रिका में प्रकाशित की गई थी। कुछ जरूरी बदलाव के बाद इसे अपडेट किया गया है।