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“इस किसान वैज्ञानिक को कब मिलेगा न्याय?”

जमीनी स्तर पर विज्ञान व तकनीक को प्रोत्साहित करने की बात तो बहुत की जाती है, पर हकीकत यह है कि ग्रामीण प्रतिभाओं के आगे आने में कई बाधाएं हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण हैं मंगल सिंह। 

By BHARAT DOGRA

On: Tuesday 03 December 2019
 
तारिक अजीज / सीएसई
तारिक अजीज / सीएसई तारिक अजीज / सीएसई

लगभग तीन दशक पहले बंुदेलखंड के ललितपुर जिले के यह किसान विज्ञान व तकनीक जगत पर तेजी से उभरे थे, जब उनके गांव भैलोनी लोध में उनके द्वारा बनाए गए मंगल टरबाईन का सफलतापूर्वक प्रदर्शन कर बताया गया कि बिना डीजल व बिजली के नदी-नाले के पानी को लिफ्ट कर कैसे सिंचाई की जा सकती है। उन्होंने मंगल टरबाईन के लिए पेटेंट प्राप्त किया। भारतीय सरकार के साथ मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के अनेक उच्च अधिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टरबाईन का परीक्षण किया व इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

आईआईटी दिल्ली व विज्ञान शिक्षा केंद्र ने बंुदेलखंड के जल संसाधनों के अध्ययन में मंगल टरबाईन को धरती की प्यास बुझाने व खेती पर खर्च घटाने के लिए बहुत उपयोगी बताया। बाद में एक अन्य विशेषज्ञ जयशंकर सिंह ने विस्तृत आकलन कर बताया कि एक दिन में 11 घंटेे चलने पर मंगल टरबाईन 44 लीटर डीजल बचाती है तो अपने जीवनकाल में एक औसत मंगल टरबाईन 335 टन ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम करेगी। इतने महत्त्वपूर्ण आविष्कार के बावजूद मंगल सिंह को पिछले तीन दशकों से उपेक्षा व तिरस्कार ही मिला। उनको आर्थिक संकट के साथ बहुत मानसिक तनाव भी झेलना पड़ा। इसके बावजूद जगह-जगह जाकर मंगल टरबाईन का प्रचार-प्रसार करना उन्होंने आज तक जारी रखा है। कई मोर्चों पर संघर्षरत इस किसान वैज्ञानिक योद्धा से भरत डोगरा की बातचीत

वर्ष 1987 के आसपास आपने मंगल टरबाईन का सफल प्रदर्शन कर दिया था। उसके बाद के अपने अनुभव बताएं।

आरंभ में तो कई सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों ने मेरे कार्य की बहुत प्रशंसा की, पर बाद में जब उन्होंने देखा कि मैं स्वतंत्र विचारों का व्यक्ति हूं और किसी की कठपुतली की तरह कार्य नहीं कर सकता तो उनका व्यवहार बदलने लगा। कपार्ट सरकारी संस्थान बहुत थोड़े से बजट का प्रोजेक्ट देता था फिर किश्त रोक देता था। मैं अपना पैसा लगाकर भी किसी तरह काम पूरा करता था तो वे जांच दल भेजकर कोई न कोई ऑब्जेक्शन लगा देते थे कि समय पर हिसाब-किताब क्यों नहीं भेजा। मेरा जवाब था कि मैं ग्रामीण वैज्ञानिक हूं, एकाउंटेंट नहीं हूं, बाकी आप देख लीजिए कि आपके बजट से भी अधिक कार्य कर दिखाया है। मुझे लगभग 6,500 रुपए देकर कहा गया कि यह देश में मंगल टरबाईन का प्रचार-प्रसार करने का आपका कुल बजट है।

दूसरी ओर कुछ स्थानीय व्यक्ति मेरी अचानक मिली प्रसिद्धि से परेशान थे। कुछ संस्थानों ने उन्हें अपने साथ मिलाकर मेरे अपने गांव भैलोनी लोध के आसपास किए गए कार्य को क्षतिग्रस्त किया। पाईपों को तोड़ दिया गया। मेरे सहयोगियों को अधिक धन देकर मेरे कार्य से हटा दिया गया। इस तरह जिस कार्य को मैंने बहुत मेहनत से खड़ा किया था वह नष्ट होने लगा व कुछ अन्य कार्य अधूरे छूट गए।

फिर मैं न्याय के लिए इधर-उधर भटकने लगा व वह दौर अभी तक जारी है। पर मैंने इन सब कठिनाईयों के बावजूद मंगल टरबाईन का प्रचार-प्रसार नहीं छोड़ा व देश के दर्जनों स्थानों पर जाकर इसका प्रचार-प्रसार किया, लोगों को इस तकनीक की जानकारी दी।

क्या सरकारी तंत्र ने आपसे हुए अन्याय को दूर करने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की?

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस जांच के लिए एक उच्च अवकाश प्राप्त अधिकारी बीपी मैथानी को नियुक्त किया। उनकी रिपोर्ट को वर्ष 2012 में ग्रामीण विकास मंत्रालय को सौंपा गया। मैंने इस रिपोर्ट को सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त किया। इस रिपोर्ट में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि मंगल सिंह पर जो भी आरोप लगाए गए, वे पूरी तरह अनुचित थे। इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह कुछ सरकारी अधिकारियों ने मुझे परेशान किया, जिससे मेरे अनुसंधान कार्य की बहुत क्षति हुई। मैथानी रिपोर्ट ने मुझसे बार-बार हुए अन्याय के लिए क्षतिपूर्ति की संस्तुति भी की है।

क्या सरकार ने मैथानी रिपोर्ट पर उचित कार्यवाही की?

इसकी संस्तुतियों को तोड़-मरोड़कर बहुत मामूली सी क्षतिपूर्ति का एक पत्र मुझे भेजा गया था, जो मुझे अपमानजनक लगा। अतः न्याय प्राप्त करने के लिए मैंने अपने प्रयास जारी रखे।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जिस समय किसान का संकट इतना बड़ा मुद्दा है, उस समय भी किसान के खर्च को कम करने वाली मंगल टरबाईन उपेक्षित है। मुझे बताया गया है कि इस समय ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करना बहुत बड़ी प्राथमिकता बन रहा है। इस स्थिति में तो डीजल की खपत बहुत कम करने वाली मंगल टरबाईन को बहुत प्राथमिकता मिलनी चाहिए, पर मंगल टरबाईन को तो केवल सरकार की उपेक्षा ही मिली है।

उच्च अधिकारियों व विशेषज्ञों की प्रशंसा
 
देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों व अधिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टरबाईन का अध्ययन किया है और इस आविष्कार की बहुत प्रशंसा करते हुए इसकी व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया है। मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव बीके साहा ने लिखा है कि स्टाप डैम के खर्च को जोड़ लिया जाए तो भी मंगल टरबाईन की व्यवस्था छोटी नदियों से जल उठाने की अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक सस्ती है। मंगल टरबाईन से डीजल व बिजली की बचत होती है व यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक टीपी ओझा ने लिखा है कि मंगल टरबाईन में बड़ी संभावनाएं निहित हैं। भारतीय सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व सचिव (विभाग के उच्चतम अधिकारी) बीके सिन्हा ने कई बार मंगल टरबाईन व इसके आविष्कारक की प्रशंसा की है व राष्ट्रीय हित में इन्हें प्रोत्साहित करने के लिए कहा है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जाने-माने विद्वानों व संस्थानों ने मंगल टरबाईन की उपयोगिता व संभावनाओं को कई बार स्वीकार किया।

सरकार को मंगल टरबाईन के उचित उपयोग के लिए क्या करना चाहिए? इसे कैसे स्केल-अप किया जाए?

सरकार को चाहिए कि वह शीघ्र ही अपने सिंचाई, पेयजल व शाश्वत ऊर्जा कार्यक्रमों में मंगल टरबाईन को समुचित स्थान दे ताकि देश में अनेक उपयुक्त स्थानों पर मंगल टरबाईन की तकनीक का लाभ लोगों को मिल सके व पर्यावरण की रक्षा में इसका योगदान प्राप्त हो सके। अनेक स्थानों पर यह कार्य शीघ्र आरंभ होने चाहिए। देश में अनेक लिफ्ट सिंचाई योजनाएं विविध कारणों से बंद पड़ी हैं। इनमें से अनेक को उचित स्थानों पर मंगल टरबाईन लगाकर नया जीवन दिया जा सकता है। इस तरह कम लागत पर अधिक लाभ प्राप्त होगा।

देखिए मेरे जैसा किसान-वैज्ञानिक अपने सीमित संसाधनों में एक सीमा तक ही कार्य कर सकता है। उसे स्केल-अप करना, उसके लाभों को अधिक लोगों तक ले जाने में सरकार की सहायता की जरूरत है। गैर-सरकारी संगठनों की भी इसमें उपयोगी भूमिका हो सकती है।

मंगल टरबाईन में आपने अपना जीवन लगा दिया है। यदि सरकार देर से ही सही इस बारे में सक्रिय होती है तो क्या आपका सहयोग सरकार प्राप्त कर सकती है?

तमाम कठिनाईयों के बावजूद मैं देश के विभिन्न भागों में मंगल टरबाईन का प्रचार-प्रसार तीन दशकों से करता रहा हूं। कभी राजस्थान तो कभी गुजरात, कभी उत्तराखंड तो कभी जम्मू-कश्मीर, कभी पश्चिम बंगाल तो कभी मध्य प्रदेश-मेरे यह प्रयत्न मुझे अनेक स्थानों पर ले गए हैं।
अब यदि सरकार सक्रिय होती है तो कुछ उपयुक्त स्थानों पर मेरी देखरेख में कार्य आरंभ किया जा सकता है। इन स्थानों पर मैं युवाओं  को मंगल टरबाईन संबंधी प्रशिक्षण भी साथ-साथ देना चाहूंगा ताकि नई पीढ़ी को भी इस तकनीक के बारे में पर्याप्त जानकारी मिल सके। मेरी आयु 70 वर्ष के पास होने जा रही है व बहुत परिश्रम व तनाव बढ़ने से स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर  पड़ा है। एक समय छात्र जीवन में मेरे अच्छे स्वास्थ्य के कारण मुझे ‘टारजन’ कहा जाता था, पर अब स्वास्थ्य बहुत गिर गया है अतः इस दिशा में मेरी सेवाओं का उपयोग शीघ्र ही कर लेना चाहिए। इसके साथ मेरे साथ हुए विभिन्न तरह के अन्याय को दूर करना चाहिए। मैथानी समिति की संस्तुतियों को सही भावना से लागू कर क्षतिपूति भी करनी चाहिए।

क्या है मंगल टरबाईन
 
हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीजल पंप सेट से पानी उठाते हैं। अनेक गांवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीजल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है व प्रदूषण भी होता है।

ललितपुर जिले के एक किसान व ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा व मंगल टरबाईन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीजल व बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पंहुचाया जा सके।

अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह स्वयं बताते हैं, “मंगल टरबाईन गांव में ही बनने वाली ऐसी मशीन है, ग्रामीण तकनीक है जो बहती हुई जल धारा से चलती है। एक आवश्यकता के अनुरूप छोटा बड़ा व्हील बनाते हैं जिसे एक चक्कर बढ़ाने वाले गियर बाक्स से जोड़ते हैं। इससे इंजन मोटर की भांति तेज स्पीड चक्कर बनाते हैं। गियर बाक्स की आउटपुट शाफ्ट दोनों तरफ निकली होती है जिससे क्लोकवाइज या एंटी-क्लोकवाइज कोई एक या दोनों भी एक साथ पंप चला सकते हैं। गियर बाॅक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर पुल्ली लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पेराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आमतौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी नालों से डीजल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टरबाईन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीजल, बिना बिजली के सिंचाई कर सकते हैं। पाइपों के द्वारा पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं।

मंगल टरबाईन का उपयोग यदि उन सभी स्थानों पर किया जाए जो इसके अनुकूल हैं तो इससे करोड़ों लीटर डीजल की बचत प्रतिवर्ष हो सकती है व किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही प्रदूषण विशेषकर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।
बिना बिजली, बिना डीजल, बिना इंजन के चलने वाला मंगल टरबाईन