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विदेशी आक्रमण, भाग चार : अफ्रीकी व एशियाई देशों में हमला कर चुका है यह कीड़ा

“विदेशी आक्रमण” श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज जानिए कि एफएडब्ल्यू से अब तक एशिया और अफ्रीका के किन-किन देशों में अपने पैर पसार चुका है

By Anil Ashwani Sharma, Akshit Sangomla, Ishan Kukreti

On: Thursday 09 May 2019
 
अफ्रीकी देशों में फैला है फॉल आर्मीवर्म का प्रकोप। फोटो : लोमिडा अफेडररु
अफ्रीकी देशों में फैला है फॉल आर्मीवर्म का प्रकोप। फोटो : लोमिडा अफेडररु अफ्रीकी देशों में फैला है फॉल आर्मीवर्म का प्रकोप। फोटो : लोमिडा अफेडररु

फसलों को पहुंचे नुकसान को लेकर सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एफएडब्ल्यू का गहराई से अध्ययन करने वाले सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के निदेशक रामंजनयुलु का मानना है कि आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत में बीती खरीफ फसलों को 30 प्रतिशत का नुकसान हुआ है। वह कहते हैं, “शक्तिशाली कीटनाशकों की मदद से लंबे समय से चली आ रही एकीकृत खेती के फलस्वरूप इन कीटों के प्राकृतिक दुश्मन लुप्त हो चुके हैं। लंबे सूखे व बादलों से घिरे आसमान की बदौलत मक्के की फसलों पर एफएडब्ल्यू  के हमलों में तेजी आई है।” 

खाद्य सुरक्षा और आजीविका की जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए एफएडब्ल्यू से निपटना आवश्यक है। भारत में एफएडब्ल्यू के हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह विश्व स्तर पर विनाश का कारण बनेगा। अफ्रीका में प्रवेश करने के ठीक दो साल बाद एफएडब्ल्यू अपने दूसरे महाद्वीप एशिया तक पहुंच गया। अब यह चीन सहित अन्य एशियाई देशों में प्रवेश करेगा। चीन विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मक्का उत्पादक देश है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन(एफएओकी सहायक निदेशक कुंधवी कदीरेसन कहती हैं, “एफएडब्ल्यू का एशिया के मक्का व चावल उत्पादकों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। इनमें से ज्यादातर छोटे किसान हैं जो भोजन और जीवन यापन के लिए अपनी फसलों पर निर्भर रहते हैं।” मक्का एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्सों में खाद्य सुरक्षा के लिए एक मुख्य फसल है। सेंटर फॉर एग्रीकल्चर एंड बायोसाइंस इंटरनेशनल द्वारा 2017 में प्रकाशित रिपोर्ट, “फॉल आर्मीवॉर्मइंपैक्ट्स एंड इम्प्लिकेशन्स फॉर अफ्रीका” का कहना है कि एफएडब्ल्यू की किस्में सर्वप्रथम 2016 की शुरुआत में नाइजीरिया में देखी  गई थीं। एक महीने के अंदर वह मालवाहक जहाजों या विमानों के माध्यम से अटलांटिक पार किया व फिर हवा ने उन्हें चारों ओर फैला दिया। अब एफएडब्ल्यू 44 अफ्रीकी व 6 एशियाई देशों में फैल चुका है।

एफएडब्ल्यू के अफ्रीका में मक्के की फसल तबाह करने के पहले ही पूर्वी रवांडा में मक्का किसानों की एक सहकारी समितिकोप्परोमासा ने  कीटों के हमले की संभावना जताई थी। आधिकारिक तौर पर कीट आने से एक साल पहले, 2015 में सहकारी समिति के अधिकारियों ने पाया कि मक्का का उत्पादन 4 से घटकर 3 टन प्रति हेक्टेयर हो गया था। दो साल बादरवांडा के न्यामगाबे जिले के मुशीशितो मार्शलैंड में एफएडब्ल्यू की पहचान की गई। शोध का दायरा छोटा होने और शुरुआत में पकड़ में नहीं आने की वजह से यह तेजी से फैल गया।

किसानों का चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि मादा एफएडब्ल्यू फसलों के पत्तों पर दिए गएअंडों से विनाशकारी कैटरपिलर जन्म लेते हैं। रवांडा की कृषि मंत्री जेराल्डीन मुकेशिमाना का कहना है कि हालांकि कई लोगों ने इससे निपटना सीख लिया है लेकिन एफएडब्ल्यू अभी भी किसानों के लिए खतरा है।

केन्या ने भी एफएडब्ल्यू को रोकने के उपाय किए हैं। दिसंबर, 2017 में नैरोबी से 120 किमी उत्तर-पूर्व स्थित एमबु में सरकारी अधिकारियों ने कैटरपिलर को हाथ से मारने के लिए कुछ लोगों को काम पर रखा था।

इथियोपिया में पिछले साल मक्का की 60 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल को क्षति हुई थी। युगांडा भी संक्रमण से प्रभावित था। 2017 के मध्य तक एफएडब्ल्यू देश के सभी 127 जिलों में फैल गया और 15 से 75 प्रतिशत तक के फसलों को नुकसान पहुंचाया। एक अनुमान के अनुसार45,000 करोड़ टन मक्का बर्बाद हुआजिसकी कीमत 19.2 करोड़ रुपए आंकी गई है।

मौसम एक प्रमुख कारक

हालांकि एफएडब्ल्यू एक बड़ा खतरा है लेकिन इसे जीवित रहने के लिए अनुकूल मौसम की आवश्यकता है। यह अत्यधिक तापमान या अधिक बारिश को सहन नहीं कर सकता। उप-सहारा अफ्रीका स्थित लेसोथो में ठंडे तापमान के कारण ही अब तक बचा रहा है। एफएडब्ल्यू सहारा की गर्मी भी सहन नहीं कर सकता। मार्च, 2018 में भारी बारिश के शुरू होने से केन्या को राहत मिली। केन्या के एगर्टन विश्वविद्यालय के तेजिमीओ इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल पॉलिसी एंड डेवलपमेंट की निदेशक मिल्टोन अयेको ने डाउन टू अर्थ  को बताया, “ऐसा लगता है मानो बारिश ने एफएडब्ल्यू का जीवनचक्र तोड़ दिया था। एफएडब्ल्यू अपने लार्वा चरण के दौरान ही फसलों पर हमला बोलता था।

एफएओ के अनुसारएफएडब्ल्यू फसलों की 80 प्रकार की फसलों को खा सकता है। लेकिन मक्का इसकी मनपसंद फसल है। नैरोबी में अंतर्राष्ट्रीय मक्का व गेहूं सुधार केंद्र की अफ्रीकी इकाई के प्रमुख वैज्ञानिक स्टीफन मुगो बताते हैं कि केन्या के उत्तर-पूर्वी हिस्से व पड़ोसी सोमालिया और इथियोपिया के वे क्षेत्र जहां मक्के नहीं उगाया जाता हैऐसे क्षेत्र इन कीटों से पूरी तरह से सुरक्षित रहे हैं।

अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा के लिए एफएडब्ल्यू का सामना करना महत्वपूर्ण है। एफएओ की सहायक महानिदेशक व अफ्रीका की क्षेत्रीय प्रतिनिधि बुकर तिजानि ने चेतावनी दी है कि एफएडब्ल्यू का हमला उप सहारा अफ्रीका के 30 करोड़ से अधिक लोगों को भुखमरी के कगार पर धकेल सकता है। यह क्षेत्र पहले से ही सूखे व भोजन की कमी से तबाह है। अगर किसानों की पैदावार कम होती है तो 1.6 करोड़ टन मक्के की कमी होगीजिसका मूल्य लगभग 34,500 करोड़ रुपए आंका गया है।

दो विशेषताएं एफएडब्ल्यू को एक खतरनाक कीट बनाती हैं। सबसे पहले विशाल क्षेत्रों में जल्दी फैलने की क्षमता। वयस्क एफएडब्ल्यू बिना हवाओं की परवाह किए तेज उड़ सकता है और एक रात में 100 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकता है। लेकिन यह संभव नहीं है कि एफएडब्ल्यू दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के बीच लगभग 7,000 किमी की दूरी उड़कर तय कर सके। संभव है यह अमेरिका से नाइजीरिया में मालवाहक जहाजों के माध्यम से आया हो। दूसरा कारण जो एफएडब्ल्यू को खतरनाक बनाता है वह हैइसकी प्रजनन क्षमता। एक अकेली मादा 6 से 700 अंडे दे सकती है। अफ्रीकी परिस्थितियों में यह आंकड़ा 1,600 तक जा सकता है। शैलेश बताते हैं, “एफएडब्ल्यू का संक्रमण अधिक होने की सूरत में हम इमामेक्टिन बेंजोएट (0.4 ग्राम प्रति लीटर पानीके उपयोग की सिफारिश करते हैं। संक्रमण हल्का होने की सूरत में हम नीम के योग को इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। इनके अलावा हम किसानों से किसी अन्य रसायन का उपयोग नहीं करने को भी कह रहे हैं। अगर समय पर प्रबंधन की कोशिश की जाए तो एफएडब्ल्यू को नियंत्रित किया जा सकता है और अब तक भारत में इसने पैदावार को प्रभावित नहीं किया है।