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खत्म हुई कृषि की प्रधानी!

देश में कृषि और कृषि शिक्षा की पड़ताल करती डाउन टू अर्थ की खास रिपोर्ट में आज प्रस्तुत है किसानों की जुबानी- 

By Vivek Mishra

On: Thursday 22 August 2019
 
खत्म हुई कृषि की प्रधानी!
मुजफ्फरपुर में यह किसान अपने परंपरागत पेशे का अंतिम उत्तराधिकारी है (फोटो: सत्यम कुमार झा) मुजफ्फरपुर में यह किसान अपने परंपरागत पेशे का अंतिम उत्तराधिकारी है (फोटो: सत्यम कुमार झा)

अब भारत वाकई कृषि प्रधान देश नहीं रहा। यह तय जैसा हो गया है कि अब 10 वर्ष बाद यहां पानी की एक बूंद नहीं बचेगी। भू-जल स्तर रोज नीचे गिर रहा है। लगता है पीने के लिए पानी भी नहीं बचेगा। पानी ही ऐसा मुद्दा था, जब मुझे खेती छोड़कर बागान की तरफ रुख करना पड़ा। मुझे लगा इससे दो फायदे होंगे, पहला पानी कम लगेगा दूसरा पेड़-पौधे ऑक्सीजन भी देंगे। यह काम सारे किसान नहीं कर सकते। बागान लगाने का काम तो कम से कम 15 से 20 एकड़ खेत वाले किसान ही कर सकते हैं। छोटे किसान तो सिर्फ इसलिए अपना जीवन बचाए हुए हैं क्योंकि उनके पास पशुधन है जिससे वे जीवन को चलाने के लिए रोजाना कुछ आमदनी कर लेते हैं। ऐसे किसान भयंकर गरीबी में जी रहे हैं।

ये बातें पंजाब में सबसे बड़े आम बागान के मालिक और 2012 में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले किसान सुभाष मिश्रा ने डाउन टू अर्थ से कहीं। देश में खेती-किसानी को नई दिशा देने वाले पंजाब-हरियाणा में किसानों का दर्द छलक रहा है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की खराबी और पानी की कमी के चलते हो रहे नुकसान से किसान हलकान हैं। जालंधर जिले में अलवरपुर गांव के निवासी वृद्ध सुभाष मिश्रा कहते हैं कि मैं केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को चिट्ठियां लिख-लिखकर थक चुका हूं। किसी तरह का जवाब और आश्वासन न मिलने पर निराश हूं। खेती-किसानी अब नहीं रह जाएगी। पंजाब सरकार की यह चिट्ठी मुझे हासिल हुई थी कि आपका खत मिल गया है। इसके बाद मुझे कुछ नहीं बताया गया। वह बताते हैं, “मुझे नाशपाती की एक खास किस्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। उस वक्त वैज्ञानिकों से मैंने कहा था कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आ रहे फलों पर शोध क्यों नहीं करते। यह समय बैठने का नहीं रहा। यदि अब बैठे तो हम सिर्फ कहानियां सुनाएंगे कि भारत कृषि प्रधान देश था।”

सुभाष मिश्रा के पूर्वज कई पीढ़ियों पहले अफगानिस्तान से आए थे। उन्हें 1993 में कृषि क्षेत्र में राज्य का पहला पुरस्कार हासिल मिला। पंजाब सरकार तीन बार उनका नाम पद्मश्री के लिए नामित कर चुकी है। 1982 में पीएम पुरस्कार भी जीता। उन्होंने प्रधानमंत्री को कृत्रिम बादल तैयार कराने की तकनीक पर काम करने के लिए चिट्ठी लिखी है और यह काम करने वाले वैज्ञानिक को एक करोड़ रुपए इनाम के रूप में देने को कहा है। वह अपनी तरफ से भी ऐसे वैज्ञानिक को एक लाख रुपए देने को तैयार हैं। उनका कहना है कि वर्षा जल संचयन, रीचार्जिंग जैसे काम आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गए हैं। मिश्रा बताते हैं, “मैं आज बहुत दुख महसूस करता हूं कि मैंने नासमझी के कारण अपने बच्चों को कृषि शिक्षा नहीं दी। मेरे दोनों बेटे इंजीनियर हैं। गांव में सबसे ज्यादा मेरे ही बच्चे पढ़ पाए। ज्यादातर किसानों के बच्चे सीधा खेतों में लग जाते थे। अब बड़े और संपन्न किसान अपने बच्चों को कृषि की पढ़ाई के लिए नसीहत देते हैं। उन्होंने बताया कि आज जो किसान धान के बाद आलू फिर मक्का लगाते हैं, उनकी गाड़ी तो चलती है लेकिन जो सिर्फ एक फसल पर टिके रहते हैं उन्हें कभी-कभार बहुत नुकसान होता है। फसलों की कीमत नहीं रही। मक्का और बासमती के स्थायी मूल्य का निर्धारण हो तो किसान इनकी तरफ जाएंगे। इससे भू-जल की समस्या कम हो सकती है। सिर्फ धान से तो काफी नुकसान होता जा रहा है।

पंजाब के जालंधर में अलवर गांव के आम बगान के सबसे बड़े किसान सुभाष मिश्रा

देश के सबसे समृद्ध कहे जाने वाले हरियाणा के कुल 22 में से 17 जिलों में डाउन टू अर्थ ने खेती-किसानी की मौजूदा हकीकत जानने की कोशिश की। इस पड़ताल से यह बात निकलकर बाहर आई कि आज भी खेतों में अनाज भंडारण के कक्ष तो नहीं हैं लेकिन खेत-खलिहानों के बीच बड़ी-बड़ी विदेशी मोटर गाड़ियों के भंडारण कक्ष जरूर बन गए हैं। यह परिदृश्य अकेले हरियाणा में नहीं है बल्कि पंजाब के कई जिलों में भी इस तरह के दृश्य आसानी से देखे जा सकते हैं। पंजाब और हरियाणा की बात इसलिए क्योंकि ये हरित क्रांति के मंदिर हैं। इस बारे में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में मिले किसान अरुण कुमार बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। वह हरियाणवीं और खड़ी हिंदी मिलाकर बोलते हैं, “अरे भई खेतों में अभी तो आप आधे से अधिक जिलों में यह दृश्य देख रहे हैं। आने वाले समय में इस राज्य या देश भर के खेतों में ये बड़ी-बड़ी गाड़ियां ही खेतों में खड़ी नजर आएंगी और खेत इन गाड़ियों के कल कारखाने बन जाएंगे। किसान बन जाएंगे मजदूर। अब खेतीबाड़ी के दिन लद गए। मेरे पिताजी ने भी कहा है कि खेती किसानी में कुछ नहीं रखा है। कुछ नौकरी कर ले तो जिंदगी तो सुधर जाएगी। ऐसे में आप कैसे उम्मीद करते हैं कि किसान अब किसानी ही करेगा।”

खेतों में किसानों की आखिरी पीढ़ी!

खेती कर गुजर-बसर करने वाले पौड़ी के कल्जीखाल ब्लॉक के सूला गांव के किसान गणेश सिंह अपने परिवार की आखिरी पीढ़ी के किसान हैं जो अब तक खेत से जुड़े हुए हैं। उन्हें विरासत में करीब पांच एकड़ की पुश्तैनी जमीन मिली। लेकिन ज्यादातर जमीन बिखरी हुई थी। इसका बड़ा हिस्सा अब बंजर हो चुका है। एक एकड़ से भी कुछ कम क्षेत्र में गणेश मौसमी सब्जियां उगाते हैं जो परिवार के ही काम आती हैं। इससे आमदनी नहीं होती। उनके दो बेटे हैं और दोनों गांव-खेत छोड़ देहरादून में कुछ हजार रुपए की नौकरी करते हैं। गणेश ने बताया कि छोटे बेटे को मात्र 4-5 हजार रुपए मासिक वेतन मिलता है। वह कहते हैं कि खेती में आमदनी नहीं है, इसलिए नौजवान गांव में नहीं टिक रहे। गणेश के पास कभी माल्टा, खुबानी, नाशपाती, सेब के बगीचे भी हुआ करते थे। वह बताते हैं कि उसकी जगह सरकार की ओर से बांटी गई जंगली फलों की पौधे ने उन बगीचों को भी खत्म कर दिया। किसी तरह गुजर-बसर करने वाले गणेश कहते हैं कि जब तक पहाड़ में भूमि प्रबंधन नहीं होगा, चकबंदी नहीं होगी, खेती नहीं होगी।

टिहरी के सकलाना पट्टी के भागचंद रमोला 100 नाली क्षेत्र में खेती करते हैं। उनकी जोत भी बिखरी हुई है। सौंग नदी के नजदीक होने की वजह से उनकी जोत का आधा हिस्सा सिंचित है। भागचंद जापानी तकनीक पर आधारित 8-10 उत्पाद भी तैयार करते हैं जिसमें चावल, मूली, प्याज, सोयाबीन और अन्य सब्जियां शामिल हैं। वह बताते हैं कि उनके चावल बाजार में 150 रुपए प्रति किलो तक बिक जाते हैं। कृषि से उनकी सालाना आमदनी 2-3 लाख रुपए तक है। वह राज्य के प्रगतिशील किसानों में गिने जाते हैं। अपने गांव में अन्य लोगों को भी उन्होंने सामूहिक खेती के जरिए जापानी पैदावार सिखाई है। इस आमदनी के बावजूद रमोला निराश होकर कहते हैं कि खेती में अब चारों ओर से नुकसान ही नुकसान हो रहा है। उनके दो बेटे शायद ही खेती को आजीविका के तौर पर अपनाएं। भागचंद कहते हैं कि चालीस वर्ष से अधिक उम्र के किसान ही इस समय खेती कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ी इन सूरतों में बिलकुल खेती नहीं करेगी। उनका कहना है कि सरकार की नीतियां किसानों तक नहीं पहुंचतीं। खेती के जरिये अपनी आजीविका चलाने वाला उनका गांव धीरे-धीरे खेती छोड़ रहा है। उनके मुताबिक आमदनी दोगुनी होने की तो कोई सूरत नजर नहीं आती।



देहरादून के शिव प्रसाद खेत मजदूर के रूप में काम करते हैं। उनके पास अपनी जमीन नहीं है। वह दूसरों के खेत में सब्जियां उगाते हैं और कम पैसों में परिवार चलाने की पूरी जुगत लगाते हैं। कुछ दिन पहले उनकी छह साल की बेटी बीमार हुई, तो उसके इलाज में अच्छा खासा खर्च आ गया, जिसके लिए शिव प्रसाद को उधार लेना पड़ा। बेटी की बीमारी के चलते कुछ दिन काम नहीं कर सके, तो उतने दिन की मजदूरी भी हाथ से गई। शिव प्रसाद के दो बच्चे हैं और उनकी पूरी कोशिश है कि उन्हें अच्छी शिक्षा दे सकें, ताकि वे नौकरी हासिल करने योग्य बन सकें।

राज्य योजना आयोग के सलाहकार एचपी उनियाल कहते हैं कि खेती में उत्पादकता बहुत कम रह गई है। सिर्फ खेती के जरिए किसान का वर्ष में तीन-चार महीने से ज्यादा गुजारा नहीं होता। फिर सरकार की तरफ से भी हाई वैल्यू क्रॉप की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई। हॉर्टीकल्चर, फ्लोरा कल्चर की बात तो की जाती है लेकिन वास्तविकता में किसानों तक कोई प्रशिक्षण, कोई नीति नहीं पहुंच पाती। जबकि पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में इसी भौगोलिक परिस्थिति में किसान अच्छी कृषि कर रहे हैं। जंगली जानवरों से निपटने के लिए वहां सोलर फेंसिंग की व्यवस्था की गई है। मिट्टी के परीक्षण और जलवायु के लिहाज से किसानों को बीज दिए जाते हैं। उत्तराखंड में सरकार की ओर से ऐसा कुछ नहीं किया जाता। न ही हम किसानों को प्रोत्साहित कर पा रहे हैं।

उनियाल कहते हैं कि हालांकि पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय ने कुमाऊं में तराई के क्षेत्र में किसानों के लिए काफी कार्य किया है। चंबा-मसूरी फल पट्टी को विकसित करने में पंतनगर विश्वविद्यालय के रानीचौरी हिल कैंपस का काफी योगदान है। उनके मुताबिक, कुछ गिनी चुनी फल-सब्जी पट्टियों को छोड़ दें तो राज्य के ज्यादातर किसान खेती से दूर हो रहे हैं।

पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग के प्रोफेसर एएस जीना यह नहीं मानते कि किसान खेती से दूर हो रहे हैं। हालांकि वह यह जरूर कहते हैं कि राज्य के ज्यादातर किसान मौजूदा समय में अपनी पैदावार से सालभर गुजारा नहीं कर पा रहे। उनके मुताबिक, इसकी वजह परिवार का बढ़ना और जमीन का कम होना है। जीना कहते हैं कि जिन हालातों की बात कहकर किसान खेती से दूर हो रहे हैं, उन्हीं हालात में ऐसे किसानों के उदाहरण भी मिल जाएंगे, जो कृषि से अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं। प्रोफेसर जीना कहते हैं कि आरामदेह जिंदगी और नौकरी की वजह से किसान खेती से दूर हो रहे हैं।

अल्मोड़ा में जीबी पंत हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के पुष्कर बिष्ट कहते हैं कि किसान अपनी जमीन का मजदूर सरीखा हो गया है। वह कहते हैं कि सरकारी महकमे के कृषि विभाग, हॉर्टीकल्चर विभाग नाम भर के ही रह गए हैं। वे किसान मेला आयोजित करके अपनी खानापूर्ति कर लेते हैं लेकिन किसानों तक उनकी पहुंच नहीं है। इसलिए किसान खुद को अकेला महसूस कर रहा है। कृषि संस्थानों सवाल उठाते हुए वह कहते हैं कि संस्थानों के रिसर्च पेपर तो खूब होते हैं लेकिन उन शोध का फायदा खेत में मौजूद किसान तक नहीं पहुंचता। लैब में विकसित किए गए उनके बीज किसानों तक नहीं पहुंचते।



किसानों का खेती से हो रहे मोहभंग को गोविंद बल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के कुलपति तेज प्रताप समझाते हैं। उनका कहना है कि उत्तराखंड में कुमाऊं के तराई क्षेत्र के ऐसे कई किसान हैं जो पंतनगर यूनिवर्सिटी से 32 सालों से बीज ले रहे हैं। उनकी पैदावार बहुत बढ़िया है। उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं। उनकी समस्या यह है कि बच्चे विदेशों से लौटकर खेती नहीं कर सकते। गढ़वाल क्षेत्र में तो खेती की खराब स्थिति है। उनकी समस्याएं भी बेहद अलग हैं। यहां के लोग पूरी तरह से पलायन करना चाहते हैं और कृषि को बिलकुल ही छोड़ने को तैयार हैं। इसे रोकने के लिए क्या किया जाए ये समझ नहीं आ रहा। गढ़वाल के गांवों में मौजूद लोग बाहर जाने का इंतजार कर रहे हैं। जो लोग खेती कर भी रहे हैं, वे बहुत ही पारंपरिक तरीके ही आजमा रहे हैं। उनके पास जमीन भी ज्यादा नहीं हैं। जो जमीन है वह बिखरी हुई हैं। वहां का हश्र देखकर दुख होता है।

किसानों के लिए केंद्र सरकार जो नीतियां बना रही है, क्या उससे किसानों को फायदा मिल रहा है? इस सवाल पर तेज प्रताप कहते हैं कि सरकारें जो नीतियां बनाती हैं यदि वो जमीनी परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं। अलग-अलग जगह किसानों की अलग समस्याएं हैं, हमें नीतियां उनकी समस्याओं के लिहाज से बनानी होंगी। वह बताते हैं कि पहाड़ों पर जलवायु परिवर्तन का असर तो है लेकिन मौजूदा स्थिति में तकनीक की सहायता से उसे मैनेज किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन से फसल प्रभावित होगी। मैंने पहाड़ों में सेब की कुछ प्रजातियों पर अध्ययन किया था। वर्ष 2000 में मैंने देखा था कि सेब की कुछ प्रजातियां 100 किलोमीटर ऊपर की ओर खिसक रही थीं। वर्ष 2009 में देखा कि सेब की पैदावार ऊपर की ओर भी बढ़ी और वही सेब नीचे भी उगाए जा रहे थे। ये तकनीक एडवांसमेंट की वजह से ही संभव हो सका। वैज्ञानिक समुदाय के पास बहुत ज्ञान और क्षमता है। इसके इस्तेमाल से हम कृषि का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि मुझे लगता है कि भारतीय कृषि बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही है। भविष्य में ऐसा हो सकता है कि कम लोग खेती कर रहे होंगे लेकिन बेहतर तरीके से खेती कर रहे होंगे। प्रगतिशील किसानों को देखें तो वहां बदलाव के वाहक दिख रहे हैं। थोड़े ही किसान ऐसी खेती कर रहे हैं लेकिन भविष्य उनका ही है। प्रगतिशील किसान मानते हैं कि कृषि में अच्छे बदलाव संभव हैं। हम उन किसानों की मदद के लिए योजनाएं बना रहे हैं जो खेती छोड़ने के लिए तत्पर हैं। मुझे लगता है कि अगले 15-20 सालों में हम कृषि के क्षेत्र में अच्छे बदलाव देखेंगे जिसमें तकनीक का इस्तेमाल करने वाले नई पीढ़ी के किसान शामिल होंगे और बाजार में भी उनकी अच्छी पकड़ होगी। तब हर कोई खेती करेगा, ऐसा नहीं होगा। कम लोग खेती करेंगे और जीडीपी में अधिक योगदान देंगे।

यह भी ध्यान रखना होगा कि परंपरागत खेती से तो हमारा भला नहीं होगा। यदि हम सोचें कि हर किसी को अपने हिस्से की सब्जियां उगानी चाहिए तो ये भविष्य नहीं है। हम इसे नॉलेज-इकॉनमी बेस्ड खेती के रूप में देखते हैं। इसमें ये देखा जाए कि देश को किस तरह के कृषि उत्पाद चाहिए और अर्थव्यवस्था को कैसे आगे बढ़ाना है। इससे हमारी उत्पादकता बढ़ेगी, उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और कृषि में पैसा बढ़ेगा। तब ऐसे लोग भी खेती की ओर आएंगे जिनके पास पैसा होगा। खेती पैसों के लिए की जाएगी और उसका उपभोग करने वाले बहुत से लोग होंगे।

अगर हम सोचें कि हर कोई अपने हिस्से का अन्न और सब्जियां उगाए और खाए तो ये संभव नहीं है। खेती को हम “वे ऑफ लाइफ” की तरह नहीं अपना सकते। ऐसे किसान अपना गुजारा नहीं कर पाएंगे। खेती में अभी हम जो डिप्रेशन देख रहे हैं वो पुराने विचार और नए विचारों का भेद है। आंध्र प्रदेश के वैज्ञानिक जीवी रामानजेयुलू बताते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन रोकने की ओर कदम बढ़ाना चािहए। खेती-किसानी में एक प्रबल सामाजिक समस्या जो पैदा हुई है वह है पानी की। यह बड़ी चुनौती बन चुकी है। पानी के कारण भी आज एक सामाजिक समस्या बनी हुई है। पानी की अधिकता वाली फसलों के बढ़ने के कारण हर कोई अधिक पानी चाहता है।

पहले गांव और गांव के बीच, फिर जिलों के बीच, इसके बाद राज्यों के बीच और अब तो देशों के बीच पानी को लेकर आपसी झगड़ा बन रहा है। सरकार को सबसे पहले वास्तविक खेती करने वालों की पहचान कर उनके लिए सपोर्ट सिस्टम तैयार करना चाहिए।

यदि कोई खेती नहीं कर रहा है तो उसे खेती-किसानी के नाम पर मिलने वाली सुविधाएं या फायदे नहीं मिलने चाहिए। इस पर एक कानून बनना चाहिए। वहीं, किसान कर्ज भी उसे मिल रहा है, जिसकी जमीन है। जबकि खेती कोई और कर रहा है। उसे पैसों की जरूरत है और उसके पास कर्ज हासिल करने के लिए कोई साधन नहीं है। इसलिए अभी वर्षा जल संचयन के प्रयासों को न सिर्फ तेज करना होगा बल्कि जमीन पर इन कामों के उतारना होगा।

अनाज उत्पादन की अंधाधुंध दौड़ को खत्म कर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को ध्यान में रखकर खेती-किसानी की तरफ देखना होगा। यदि देखा जाए तो हर एक व्यक्ति की थाली में अनाज उत्पादन के मौजूदा ढर्रे के कारण सिर्फ कार्बोहाइड्रेट है। ऐसे में बागबानी व पशु पालन के विकास की तरह शिफ्ट होने की जरूरत है।

प्रोफेसर तेलंगाना जयशंकर स्टेट एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रवीण राव चेल्वला ने कहा कि पहले खाद्य सुरक्षा को लेकर हमारा ध्यान हरित क्रांति पर था लेकिन फिर ध्यान टिकाऊ खेती पर गया अब ध्यान किसानों की आय पर है। इसी बीच उपभोक्ता भी जागरुक है और वह गुणवत्ता युक्त खाद्य सामग्री मांग रहा है। ऐसे में अब खेती तकनीकी हुनर और पर्यावरणीय पहलू पर निर्भर होगी। तभी हम खेती के लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे।

(साथ में उत्तराखंड से वर्षा सिंह, बिहार से उमेश कुमार राय, मध्य प्रदेश से मनीष चंद्र मिश्रा, छत्तीसगढ़ से अवधेश मलिक, उत्तर प्रदेश से महेंद्र सिंह)