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चावल में बढ़ सकता है कैंसरकारी आर्सेनिक, घट जाएगा 40% उत्पादन: स्टडी

एक नए अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते चावल का उत्पादन घट जाएगा, जबकि मिट्टी में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ने से चावल खाना शरीर के लिए नुकसानदायक साबित होगा

By Lalit Maurya

On: Wednesday 20 November 2019
 
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

यदि आप को खाने में चावल या चावल से बने व्यंजन पसंद हैं, तो तैयार रहिये जल्द ही आपको आपकी खाने की आदत बदलनी पड़ सकती है। क्योंकि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किये गए नए अध्ययन से पता चला है कि जलवायु में आ रहे बदलावों और मिट्टी में बढ़ते आर्सेनिक के कारण दुनिया भर में चावल की पैदावार तेजी से गिर सकती है। जिससे दुनिया के करोड़ों लोगों पर खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ सकता है। वैश्विक स्तर पर चावल एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है। जिसका उपभोग दुनिया की करीब आधी से अधिक आबादी द्वारा किया जाता है। यह अध्ययन अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में छपा है। अध्ययन के अनुसार भविष्य में जिस तरह जलवायु में बदलाव आ रहा है उसके चलते इस सदी के अंत तक चावल की पैदावार लगभग 40 फीसदी कम हो जाएगी ।

दुनिया के कई हिस्सों में चावल एक प्रमुख खाद्य फसल है, जिसके कारण उनपर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने का आसार है। वैश्विक स्तर पर तापमान में हो रही बढ़ोतरी के चलते मृदा पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और उसमें आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है। अनुमान है कि इसके कारण आज की तुलना में इस सदी के अंत तक चावल में मौजूद आर्सेनिक में दोगुना वृद्धि हो जाएगी । गौरतलब है कि आर्सेनिक मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक होता है। इस अध्ययन के सह-लेखक और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ अर्थ, एनर्जी एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज में अर्थ सिस्टम साइंस के प्रोफेसर स्कॉट फेनडोर्फ के अनुसार “इस सदी के अंत तक दुनिया की आबादी करीब 1,000 करोड़ हो जाएगी, जिसका मतलब होगा की उस समय करीब 500 करोड़ लोग अपने भोजन के लिए चावल पर निर्भर होंगे और यदि ऐसे में यदि पैदावार 40 फीसदी गिरती है तो करीब 200 करोड़ लोगों को उनके लिए जरुरी कैलोरी नहीं मिल पाएंगी । और यदि हमें इन चुनौतियों के बारे में पहले से पता है हो हमें इनसे निपटने के लिए अभी से तैयार हो जाना चाहिए ।"

 

क्यों बढ़ रहा है पौधों में आर्सेनिक का स्तर  

शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए विशेष रूप से चावल को ही चुना क्योंकि यह विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में लगाया जाता हैं जहां पानी भरा होता है, जिसके कारण मिट्टी से आर्सेनिक आसानी से पौधों में चला जाता है, साथ ही यह आर्सेनिक के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। आज कई खाद्य फसलों में थोड़ी बहुत मात्रा में आर्सेनिक पाया जाता है। जबकि विकसित हो रहे कुछ क्षेत्र दूसरों की तुलना में इसके प्रति कहीं अधिक संवेदनशील होते हैं। जैसे जैसे तापमान में वृद्धि हो रही है उसके चलते मिटटी में भी बदलाव आ रहा है । ऐसे में बाढ़ के पानी और मिट्टी के संयोजन से चावल के पौधों में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है। और चूंकि बाढ़ के पानी में प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक की उच्च मात्रा होती है, तो उससे सिंचाई करने से यह समस्या और गंभीर हो रही है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि हालांकि यह जरुरी नहीं है कि इन कारकों का असर सभी फसलों और पौधों पर एक जैसा हो। गौरतलब है कि आर्सेनिक एक प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाला सेमी-मेटालिक केमिकल है। जोकि अधिकांश मिट्टी और अवसादों में पाया जाता है। लेकिन आमतौर पर यह जिस रूप में पाया जाता है, वो पौधों द्वारा अवशोषित नहीं किया जाता। यदि मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव की बात करें तो इसके लगातार संपर्क में रहने से त्वचा पर घाव, कैंसर और फेफड़ों की बीमारी बढ़ जाती है, जिससे अंतत: मृत्यु भी हो सकती है। दुनिया भर में अक्सर शिशुओं को जल्द ही चावल का आहार दिया जाता है क्योंकि एक तो यह वैश्विक रूप से आसानी से मिलने वाली महत्वपूर्ण फसल है, साथ ही इससे एलर्जी के होने की सम्भावना भी बहुत कम होती है। ऐसे में इसमें आर्सेनिक के बढ़ने के खतरनाक प्रभाव हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन से कैसे प्रभावित हो सकती है उपज

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का निर्माण किया है। जैसा कि आईपीसीसी द्वारा अनुमानित किया गया है, इस सदी के अंत तक तापमान में 5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी । जबकि वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी हो जाएगी। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कैलिफोर्निया के प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्र की मिटटी में एक मध्यम किस्म के चावल की फसल उगाई। जिसके लिए उन्होंने भविष्य के आधार पर तापमान, कार्बन डाइऑक्साइड और मिट्टी में मौजूद आर्सेनिक के स्तर को नियंत्रित किया था। जैसा कि भविष्य में बाढ के पानी से सिंचाई करने और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण होने की सम्भावना है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि बढ़े हुए तापमान में सूक्ष्मजीवों ने मिट्टी में मौजूद आर्सेनिक को अधिक अस्थिर कर दिया । जिसके कारण मिट्टी मिले पानी में अधिक मात्रा में टॉक्सिन जमा हो गए जिन्हें चावल आसानी से अवशोषित कर सकते थे । एक बार अवशोषित किये जाने के बाद, आर्सेनिक अन्य पोषक तत्वों के अवशोषण को रोक देता है। जिससे पौधों की वृद्धि और विकास रुक जाता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके चलते उपज में 40 फीसदी की कमी आ गयी थी।

 हालांकि वैश्विक उत्पादन में आने वाली यह कमी चिंता का एक बड़ा विषय है, पर वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से इससे निपटने में मदद मिलेगी। इसके विषय में प्रोफेसर फेनडोर्फ का कहना है कि "अच्छी खबर यह है कि वैश्विक समुदाय पहले ही चावल की ऐसी किस्मों को उगाने में सक्षम है जो बदलते परिवेश में उग सकती हैं । सिर्फ इसके लिए मृदा के उचित प्रबंधन करने की जरुरत है। साथ ही मुझे पूरी उम्मीद है कि हम इस अध्ययन में सामने आयी समस्याओं से निपटने में सक्षम हैं। साथ ही आशा करता हूं कि वैश्विक समाज पहले ही उन उपचारों को अपना लेगा, जिससे हम कभी भी 5 डिग्री सेल्सियस वार्मिंग तक नहीं पहुंचेंगे।