बजट 2022-23: नहीं मानी आर्थिक सर्वेक्षण की सलाह, कृषि शिक्षा एवं शोध का बजट घटाया

आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 में कहा गया था कि कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान पर खर्च किए गए 1 रुपये के बदले 11.2 का फायदा होता है

By Raju Sajwan

On: Tuesday 01 February 2022
 
केंद्र सरकार कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के बजट में लगातार कमी कर रही है। फोटो: विकास चौधरी
केंद्र सरकार कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के बजट में लगातार कमी कर रही है। फोटो: विकास चौधरी केंद्र सरकार कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के बजट में लगातार कमी कर रही है। फोटो: विकास चौधरी

आम बजट 2022-23 में कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के बजट में कोई वृद्धि नहीं की गई है, बल्कि अगर भारतीय कृषि एवं अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) के वेतन-पेंशन के बजट को हटा दिया जाए तो बजट आवंटन घटा दिया गया है।

यह स्थिति तब है, जब कि बजट से एक दिन पहले 1 फरवरी 2022 को पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 में कहा गया था कि कृषि अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर खर्च किया गया एक रुपया उर्वरक सब्सिडी, बिजली सब्सडी, शिक्षा या सड़कों पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपये पर प्रतिफल की तुलना में बेहतर प्रतिफल (11.2) देता है।

 आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक कृषि पर अनुसंधान एवं विकास खर्च बढ़ाना न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

बावजूद इसके, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट के डाक्यूमेंट देखने से पता चलता है कि इस बजट में अच्छी खासी कटौती की गई है।

बजट 2022-23 में कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के लिए 8,513.62 करोड़ का प्रावधान किया गया है। जबकि साल 2021-22 का संशोधित अनुमान (आरई) में भी 8513.62 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया था। यानी कि इसमें कोई वृद्धि नहीं की गई है।

लेकिन इस अनुमानित राशि में सबसे बड़ी हिस्सेदारी आईसीएआर मुख्यालय की है। आईसीएआर यानी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के लिए 5,877.06 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि साल 2021-22 में यह राशि 5,561.48 करोड़ रुपए थी। यानी कि इस राशि में 315.58 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है। इस मद में वेतन, पेंशन, प्रशासनिक और लॉजिस्टिक खर्च शामिल हैं।

इसके अलावा एक और मद पर खर्च की राशि को बढ़ाया गया है। वह है, सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटीज पर वित्त वर्ष 2021-22 का संशोधित अनुमान 562.95 करोड़ रुपए था, उसे बढ़ा कर 599.45 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस मद पर होने वाले खर्च में क्षेत्रीय शिक्षा, अनुसंधान एवं विस्तार आदि पर होने वाला खर्च शामिल होता है। हालांकि इसमें केवल 6.5 प्रतिशत ही वृद्धि की गई है।

जबकि इसके अलावा सभी मदों में होने वाले खर्च को कम कर दिया गया है। इसमें कृषि शिक्षा, पशु विज्ञान, फसल विज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन शामिल हैं।

फसल विज्ञान पर 2022-23 के लिए 719.28 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि 2021-22 का संशोधित अनुमान 840 करोड़ रुपए का था, हालांकि इस साल का बजट अनुमान 968 करोड़ रुपए लगाया गया था। इतना ही नहीं, पिछले साल (2020-21) का वास्तविक खर्च 805.37 करोड़ रुपए का था। यानी कि फसल विज्ञान के बजट में 14.35 प्रतिशत की कटौती की गई है।

इस मद में फसल विज्ञान के अलावा बागवानी विज्ञान और नेशनल एग्रीकल्चरल साइंस फंड शामिल है। इस पैसे को फसलों की नई या हाइब्रिड प्रजातियों को विकसित करने पर खर्च किया जाता है, ताकि न केवल फसलों का उत्पादन बढ़े, बल्कि ऐसी प्रजातियां भी विकसित की जाएं, जिन पर कीटों और बीमारियों का कम कम असर हो।

साथ ही, क्षेत्रीय जलवायु के मद्देनजर ऐसी प्रजातियां भी विकसित की जाएं, जिन पर जलवायु का नुकसान कम से कम हो या फसलों से होने वाला फायदा बढ़ सके। लगभग यही काम बागवानी विज्ञान मद पर होने वाले खर्च के तहत किया जाता है।

आम बजट में कृषि शिक्षा के लिए 455.48 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जबकि 2021-22 का संशोधित अनुमान 553 करोड़ रुपए थे और 2020-21 का वास्तविक खर्च 526.14 करोड़ रुपए था।

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पशु विज्ञान पर अगले वित्त वर्ष में 343.30 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि साल 2021-22 का संशोधित अनुमान 400 करोड़ रुपए था और 2020-21 का वास्तविक खर्च 400.19 करोड़ रुपए था।

इसी तरह प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन पर 185.77 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान लगाया गया है, जबकि 2021-22 का संशोधित अनुमान 215 करोड़ रुपए था और 2020-21 का वास्तविक खर्च 220.26 करोड़ रुपए था। इसमें भी लगभग 17 प्रतिशत की कमी की गई है।

दिलचस्प बात यह है कि इसमें एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन का खर्च भी शामिल है। एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन का बजट भी कम कर दिया गया है, जबकि हर किसान तक पहुंचने के लिए हर जिले में कृषि विज्ञान केंद्रों का गठन किया गया है, जो किसानों को प्रशिक्षण के अलावा बीज देना, मिट्टी का परीक्षण करना, पानी के नमूने लेना जैसा काम करते हैं।

इस मद में भी कमी की गई है। एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन पर 243.72 करोड़ रुपए के खर्च का प्रावधान किया गया है, जबकि 2021-22 में संशोधित अनुमान 284 करोड़ रुपए किया गया है। यानी कि इसमें लगभग 14 फीसदी की कटौती कर दी गई है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि संसद के बीते शीतकालीन सत्र में कृषि, पशुपालन एवं खाद्य प्रसंस्करण की संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के बजट में लगातार कमी पर नाराजगी जताई थी। डाउन टू अर्थ की यह रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें तीन साल में कृषि शिक्षा और अनुसंधान के बजट में 57 प्रतिशत की कमी 

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