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क्या जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को हल करने में मददगार हो सकते हैं मोटा अनाज

औषधीय गुणों से भरपूर यह अनाज, बदलती जलवायु और विषम परिस्थितियों में भी उग सकते हैं

By Lalit Maurya

On: Monday 31 May 2021
 
फोटो: इक्रीसेट/ एएस राव
फोटो: इक्रीसेट/ एएस राव फोटो: इक्रीसेट/ एएस राव

सोरगम, बाजरा, ज्वार, रागी, फोनियो, कोदो, कुटकी जैसे मोटे अनाज जिन्हें कदन्न भी कहते हैं, अपने अनेकों गुणों के बावजूद वर्षों से उपेक्षित रहे हैं| इनमें मौजूद पोषक तत्वों की भरमार के कारण इन्हें 'पोषक-अनाज' भी कहा जाता है| यह मुख्य रूप से एशिया और अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली छोटी-बीज वाली घास का एक समूह है।

हालांकि देखा जाए तो यह उन प्रारंभिक फसलों में से एक है जिनकी खेती भारत, चीन और नाइजीरिया जैसे देशों में शुरू की गई थी| जहां लाखों किसान पारम्परिक रूप से इसकी खेती करते थे, पर जैसे-जैसे गेंहू, धान और मक्का की तरफ झुकाव बढ़ा, यह अनाज खेतों और थालियों से गायब होते गए|

ऐसा ही कुछ भारत में आई हरित क्रांति के बाद भी हुआ, जिसके चलते अधिक पैदावार वाली गेहूं और धान की फसलों पर जोर दिया गया| धीरे-धीरे नीतियों में भी इन मोटे अनाजों की महत्ता घटती गई, जिनपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया| तब पहला मकसद सिर्फ पैदावार को बढ़ाना था ऐसे में यह पारम्परिक फसलें धीरे-धीरे खेतों से गायब होने लगी|

लोगों में भी गेहूं और चावल का चाव बढ़ा तो इन मोटे अनाजों की मांग भी घटती गई नतीजन कीमतें घटी तो किसानों ने भी इन्हें उगाना कम कर दिया| इन सभी का परिणाम है जो आज स्वास्थ्य और पर्यावरण के दृष्टिकोण से फायदेमंद यह फसलें काफी हद तक हमारी थाली और खेतों से गायब हो चुकी हैं|

पर अब फिर से इन फसलों की मांग बढ़ रही है ऐसा इनके उन अनेकों गुणों के कारण है जो इन्हें स्वास्थ्य और जलवायु के दृष्टिकोण से फायदेमंद बनाते हैं|

अनुमान है कि एशिया और अफ्रीका में 9 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी खाद्य सम्बन्धी जरूरतों के लिए इन मिलेट पर निर्भर हैं| वहीं इसके उत्पादन की बात करें तो इसका करीब 55 फीसदी हिस्सा अफ्रीका में और 40 फीसदी हिस्सा एशिया में पैदा किया जाता है|

विषम जलवायु में भी उग सकते हैं यह अनाज

वैश्विक स्तर पर देखें तो तेजी से बढ़ती आबादी की खाद्य सम्बन्धी जरूरतें भी तेजी से बढ़ रही हैं| अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक आबादी 850 करोड़ और 2050 तक 970 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी| जिसका असर खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ेगा| वहीं दूसरी तरफ जलवायु में आ रहे बदलावों से कृषि उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है| सूखे का प्रभाव बढ़ रहा है और पानी की उपलब्धता घट रही है|

ऐसे में इन कदन्न फसलों के प्रति झुकाव भी बढ़ रहा है, यह फसलें कम पानी में भी उग सकती है, साथ ही मौसम में आ रहे बदलावों की मार भी झेल सकती हैं और विषम परिस्थितियों में भी उग सकती हैं| इस बारे में खाद्य और कृषि संगठन की उप निदेशक डॉ नैन्सी एबर्टो के अनुसार गेहूं, चावल या मक्का जैसे प्रमुख अनाजों की तुलना में यह कदन्न सूखे की स्थिति का सामना करने में कहीं ज्यादा सक्षम हैं साथ ही इन्हें उन क्षेत्रों में भी लगाया जा सकता है, जहां बारिश कम होती है|

एफएओ के अनुसार भूमि पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना बढ़ती आबादी के लिए अधिक और पौष्टिक भोजन का उत्पादन करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है| ऐसे में जलवायु अनुकूल समाधानों की तलाश में मिलेट सस्टेनेबल फूड सप्लाई चेन की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है|

औषधीय गुणों से भी होते हैं भरपूर

वहीं यदि इनके स्वास्थ्य से जुड़े फायदों की बात करें तो यह मिलेट फसलें पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं| यह आयरन और कैल्शियम सहित विटामिन और खनिजों तत्वों से भरपूर होते हैं| इनमें प्रोटीन, फाइबर, स्टार्च प्रतिरोधी बड़ी उच्च मात्रा में होते हैं| साथ ही इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम होता है जिस वजह से यह मधुमेह जैसे रोगों को रोकने में मदद कर सकते हैं|

सल्हार, कांग, ज्वार, मक्का, मडिया, कुटकी, सांवा, कोदो आदि में प्रोटीन, वसा, खनिज तत्त्व, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, ऊर्जा कैलोरी, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, कैरोटीन, फोलिक ऐसिड, जिंक तथा एमिनो एसिड की मात्रा गेंहू और चावल जैसे अनाज की तुलना में काफी अधिक होती है। बाजरा में विटामिन बी और आयरन, जिंक, पोटैशियम, फॉसफोरस, मैग्नीशियम, कॉपर और मैंगनीज जैसे आहारीय खनिजों की उच्च मात्रा होती है। इसी तरह ज्वार भी पौष्टिक गुणों से भरा होता है।

वहीं यदि कोदो की बात करें तो इसमें मधुमेह विरोधी कंपाउंड क्वेरसेटिन, फेरुलिक एसिड, पी-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक एसिड, वैनिलिक एसिड और सीरिंजिक एसिड पाए जाते हैं। इसमें पॉलीफेनोल और एंटीऑक्सिडेंट गुण भी होते हैं, जो शरीर में मौजूद बैक्टेरिया से लड़ने में मदद करते हैं। साथ ही इसमें उच्च मात्रा में मौजूद फाइबर होता है जो वजन बढ़ने से रोकता है|

संयुक्त राष्ट्र ने भी इनके महत्त्व को देखते हुए 2023 को अंतर्राष्ट्रीय कदन्न वर्ष (इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स-2023) घोषित किया है| जिसका मकसद इन उपेक्षित फसलों को बढ़ावा देना है| जिससे लोगों में इसकी दिलचस्पी बढे और वो इनके पोषण से भरपूर गुणों को जान पाएं| साथ ही इनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए नीतिगत तौर पर इनको समर्थन मिल सके|

इक्रीसेट की सहायक महानिदेशक, जोआना केन-पोटाका ने भी मिलेट को एक स्मार्ट फ़ूड कहा है जो किसानों इसके उपभोक्ताओं और पृथ्वी के लिए फायदेमंद है| उनके अनुसार मिलेट पोषण, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, गरीबी जैसी दुनिया की कुछ प्रमुख चुनौतियों को हल करने में मदद कर सकता है| यह उन क्षेत्रों में भी जहां जोत छोटी हैं, किसान गरीब और हाशिए पर हैं साथ ही जलवायु की मार झेल रहे हैं, जहां सतत विकास के लक्ष्यों को पहुंचने में भी समय लगेगा वहां भी मददगार साबित हो सकता है|

उनके अनुसार इस अनाज की वापसी में मदद करना न केवल एक उपेक्षित फसल को लोकप्रिय बनाना है बल्कि इसकी मदद से सतत विकास के लक्ष्यों जैसे एसडीजी-2 (सबके लिए भोजन), एसडीजी-12 (खपत और पैदावार को शाश्वत बनाना) और एसडीजी-13 (जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाही) को भी हासिल करना है|

इसके लिए न केवल उत्पादन बल्कि इसकी मांग को बढ़ाना भी जरुरी है जिसके लिए लोगों की इसकी प्रति बन चुकी धारणा को भी बदलना होगा| जिसमें सरकारी नीतियां मदद कर सकती है| जिनकी मदद से इनमें मौजूद पोषण और इसके स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ के बारे में लोगों को जागरूक किया जा सकता है| साथ ही इसपर अनुसंधान और विकास के लिए निवेश को बढ़ाना भी जरुरी है| ऐसे अवसर पैदा करने होंगें जिससे किसानों को भी इनका बेहतर मूल्य मिल सके और उनके और बाजार के बीच की दूरी को मिटाना होगा साथ ही विकास के नए अवसर पैदा करने होंगें|