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कम नहीं हुआ है बीज के अधिकार पर मंडराता खतरा

अमेरिकी कंपनी पेप्सिको और गुजरात के आलू उत्पादकों के बीच विवाद, भारत में किसानों के बीज पर स्वामित्व के अधिकारों पर मंडराते खतरों को रेखांकित करता है

By Latha Jishnu

On: Thursday 11 July 2019
 

पेप्सिको ने गुजरात के किसानों पर बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन करने के आरोप में मुकदमा दायर किया। यह मुकदमा 2016 में कंपनी द्वारा पंजीकृत दो आलू किस्मों में से एक “एफएल-2027” की खेती को लेकर किया गया (रॉयटर्स)

एक खास किस्म के आलू पर अपना अधिकार जताते हुए स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने किसानों पर मुकदमा दायर कर दिया, जिसके बाद इस आलू की खेती को लेकर शुरू हुई कानूनी जंग ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। अमेरिकी कंपनी लेज ब्रैंड के चिप्स बनाने के लिए इसी विशेष आलू का इस्तेमाल करती है।

इस लड़ाई में बाइबल में वर्णित डेविड और गोलियथ के बीच हुए युद्ध के सारे तत्व मौजूद हैं। 64 बिलियन डॉलर के राजस्व वाली विशालकाय अमेरिकी कंपनी के खिलाफ खड़े देश के ये चार छोटे-से आलू उत्पादक, जो बहुत ही छोटे-छोटे खेतों के मालिक हैं, आज गहरा चुके कृषि संकट का पर्याय बन चुके हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए पेप्सिको किसानों को अदालत लेकर गई। पेप्सिको ने किसानों पर यह आरोप उसके द्वारा 2016 में पंजीकृत कराई गई दो आलू की किस्मों में से एक एफएल-2027 उगाने पर लगाया। हालांकि, इस किस्म के आलू का व्यावसायिक उत्पादन 2009 से ही जारी था। पंजीकरण से किसी खास किस्म को तैयार करने वाले प्रजनक (ब्रीडर) को उस किस्म के उत्पादन, बिक्री, मार्केटिंग, वितरण, आयात और निर्यात के लिए विशेष अधिकार हासिल हो जाते हैं।

भारत में पहली बार प्रजनकों और किसानों के अधिकारों को नियंत्रित करने वाले कानून के तहत बौद्धिक संपदा अधिकार को लागू किया गया है। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक हो जाता है कि किस फसल को कौन उगाएगा? पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम-2001 अपने आप में एक अनूठा कानून है, जिसे विश्व व्यापार संगठन की मांग के अनुरूप प्रजनकों के हितों की रक्षा के लिए लागू किया गया है। भारत का कानून इस मायने में अनूठा है, क्योंकि यह प्रजनकों के साथ ही किसानों के अधिकारों की रक्षा भी करता है। इसमें एक विशेष अध्याय है, जो किसानों की बीज तक पहुंच की सुरक्षा करता है। यही नहीं, यह दुनिया भर में एकमात्र कानून है, जो वैश्विक स्तर पर किसानों के अधिकारों की गारंटी देता है। अन्य देशों में यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज (यूपीओवी) के नाम से एक उपाय अपनाया जाता है। यह कई संस्करणों वाला एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो किसानों को सीमित अधिकार ही देता है। अमेरिका की तरफ से भारत पर लगातार दबाव बनाया जाता रहा है कि वह जिनेवा स्थित अंत: शासकीय संगठन यूपीओवी का सदस्य बन जाए। यूपीओवी में शामिल होने के खिलाफ कई अंतरराष्ट्रीय निकाय भारत को चेतावनी दे चुके हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे सिर्फ व्यावसायिक हितों को बढ़ावा मिलता है।

इससे पहले आनुवांशिक रूप से संवर्धित बीजों के बौद्धिक संपदा अधिकार को लेकर मोनसैंटो और घरेलू बीज कंपनियों के बीच विवाद हो चुका है। कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाली दिग्गज कंपनी मोनसैंटो अब बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर का हिस्सा है। पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम-2001 को पेप्सिको की चुनौती, मोनेसैंटो व घरेलू बीज कंपनियों के बीच हुए विवाद का परिणाम मानी जा रही है। हालांकि, पेप्सिको ने कृषक संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया को देखते हुए दो किसान भाइयों के खिलाफ मुकदमा वापस ले लिया है, लेकिन अदालत का फैसला इस मामले में मिसाल कायम करेगा। जिन किसानों पर मुकदमा दायर किया गया, उनका दावा है कि उन्होंने स्थानीय बाजार में उपलब्ध आलू के बीज खरीदे हैं। उन पर दायर किए गए मुकदमे से वे स्तब्ध हैं। उत्पादकों का मानना है कि देश में बिना किसी बाधा के उन्हें किसी भी किस्म की पैदावार करने और उसे बेचने का हक है। इन रिपोर्टों के बीच कि कम से कम एक किसान, जो व्यापारी भी है और प्रतिद्वंद्वी चिप्स निर्माताओं को आलू सप्लाई करता है, इनमें से अधिकतर बौद्धिक संपदा अधिकार के मुद्दे से अनजान हैं। इन चार किसानों से मुआवजे की मांग वापस लेने की पेप्सिको की पेशकश तभी प्रासंगिक होगी, जब वे कंपनी के विशाल अनुबंध कृषि कार्यक्रम में शामिल हों, जिससे कथित तौर पर 12,000 किसान जुड़े हुए हैं। चिप्स निर्माता इसे सहयोगी परियोजना कहते हैं, या फिर वे इस अनुबंध पर हस्ताक्षर करें कि फिर कभी एफएल-2027, जिसे व्यापारिक तौर पर एफसी-5 भी कहा जाता है, की खेती फिर नहीं करेंगे। हालांकि यह समझौता कृषक समुदाय के लिए एक खराब मिसाल कायम करेगा और पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम-2001 में मिले किसानों के अधिकारों की गारंटी को कमजोर करेगा।

भारत में अधिकारियों के साथ ही कृषि सहायता समूहों को पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम-2001 से भारी उम्मीदें रही हैं और आमतौर पर इसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, जो किसानों की कीमत पर प्रजनकों को अनुचित लाभ नहीं देता। लेकिन, आलू विवाद के बाद इस धारणा को जोरदार झटका लगा है। पेप्सिको की भारतीय सहायक कंपनी पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स, भारत के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में से एक गुजरात के किसानों और कोल्ड स्टोरेज पर 2018 से मुकदमे दायर कर रही है। मगर इस साल अप्रैल में यह मुद्दा तब गंभीर हो गया, जब चार किसानों से पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स ने भारी मुआवजा मांगा और किसानों के समूहों व कृषि क्षेत्र में काम कर रहे गैर-लाभकारी संगठनों का ध्यान इस तरफ गया। बताया जा रहा है कि किसानों और कोल्ड स्टोरेज मालिकों के खिलाफ कुल 9 मामले दायर किए गए हैं। पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स ने चारों किसानों पर बौद्धिक संपदा के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए प्रत्येक से 1.05 करोड़ रुपए का भारी मुआवजा मांगा। हालांकि मई में कंपनी ने दायर मुकदमों को वापस ले लिया।

कानून विशेषज्ञ और किसान सहायता समूह इसको लेकर दृढ़ हैं कि अधिनियम की धारा अधिनियम की धारा 39(1) (iv) के तहत कानून किसानों को स्पष्ट बढ़त देता है, जो उनको मन मुताबिक बीजों के इस्तेमाल की गारंटी देने वाले अन्य प्रावधानों को निरस्त करता है। बौद्धिक संपदा अधिकार के मुद्दों पर काम करने वाली स्वतंत्र कानून शोधार्थी और नीति विश्लेषक शालिनी भूटानी इस खंड के अत्यधिक महत्वपूर्ण हिस्से की तरफ ध्यान दिलाती हैं, जो यह कहता है कि, “इस अधिनियम में किसान को अपने खेत की उपज को बचाने, उपयोग करने, बोने, पुनर्वसन, विनिमय, साझा करने या बेचने का हक है। अधिनियम में संरक्षित सभी किस्म का बीजों पर भी उसका अधिकार है, ठीक वैसे ही जैसे अधिनियम के लागू होने से पहले हक था। हालांकि किसान को इस अधिनियम के तहत संरक्षित किसी खास किस्म के ब्रैंडेड बीज को बेचने का अधिकार नहीं होगा।” सबसे बड़ी चिंता का विषय पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण के द्वारा पादप किस्मों के संरक्षण के लिए लागू किए जाने वाले तौर-तरीकों को लेकर है। उदाहरण के लिए प्राधिकरण द्वारा आलू की कुल 25 किस्मों को पंजीकृत किया गया है, जिनमें से 15 किस्मों के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को मिले हैं और बाकी 10 के लिए निजी कंपनियों को। तीन श्रेणियों में किस्मों को पंजीकृत करने वाले कानून के तहत किसानों की किस्म को भी पंजीकृत करना होगा।

अब तक किसानों की एक भी किस्म को पंजीकृत नहीं किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि पेप्सिको की तरफ से पंजीकृत कराई गईं दो किस्में “सामान्य जानकारी वाली किस्मों” की श्रेणी में आती हैं। इससे भी अधिक दिलचस्प यह है कि एफएल-2027 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक किस्म के समान है। एनएस गोपाकृष्णन कहते हैं कि बौद्धिक संपदा अधिकार की व्यवस्था-प्रणाली गंभीर संरचनात्मक समस्याओं से ग्रस्त है। वह कहते हैं कि पंजीकरण का डेटा गंभीर और चिंताजनक प्रवृत्तियों को दर्शाता है। यूपीओवी के विपरीत भारतीय कानून भारतीय कृषक समुदायों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध किस्मों का इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। कॉरपोरेट हितों के साथ ही सरकारी संस्थानों की तरफ से भी लगातार घेराबंदी जारी है, जो अपने बौद्धिक संपदा अधिकारों को पैसा कमाने के जरिए की तरह देखते हैं। गोपालकृष्णन भारत के प्रसिद्ध बौद्धिक संपदा अधिकार शिक्षाविदों में से एक हैं। वह करीब दो दशक से इस कानून का अध्ययन कर रहे हैं। वह कहते हैं कि समस्या पादप विविधता एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण के साथ है। इसने संसद के स्पष्ट आदेश को फिर से लिखने के लिए कानून की कमियों का प्रभावी रूप से लाभ उठाया है, ताकि आधुनिक प्रजनक व बीज उद्योग सार्वजनिक रूप से उपलब्ध किस्मों को शामिल करने के लिए सक्षम हो सकें।

इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर आईपीआर स्टडीज, कोच्चि के मानद प्रोफेसर चेतावनी देते हैं कि कृषक समुदाय के हित के इरादे से उठाए गए इन कदमों का निजी बीज उद्योग अधिकतम लाभ उठाने के गंभीर प्रयास कर रहा है। उनके अनुसार, “सामान्य जानकारी वाली किस्मों” की प्रकृति पर नजर रखना व जांच करना बहुत जरूरी है, जिन्हें बीज कंपनियां निजी संपत्ति में परिवर्तित करती जा रही हैं, क्योंकि अब तक किसानों के लिए स्वतंत्र तौर पर उपलब्ध रहे बीज तक उनकी पहुंच के गंभीर निहितार्थ हैं। यह प्राथमिक चिंता का विषय है। गोपालकृष्णन द्वारा संकलित किए गए आंकड़े वाकई परेशान करने वाले हैं। फरवरी 2018 तक पंजीकृत की गईं सभी “सामान्य जानकारी वाली किस्मों” में से सब की सब (कुल 320) बीज कंपनियों के नाम रहीं। इस श्रेणी में एक भी किस्म किसानों के नाम पर नहीं पंजीकृत हो सकी है, जबकि मौजूदा किस्मों के तहत किसानों की किस्मों को शामिल करने के लिए 2009 में विशेष नियम बनाए गए थे। गोपालकृष्णन कहते हैं कि भारतीय कृषि और गरीब किसानों के भविष्य की रक्षा के लिए न्यायिक हस्तक्षेप या फिर संसद के जरिए इस प्रवृत्ति पर लगाम लगानी होगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पौधों की किस्मों की व्यवस्था प्रक्रिया में सुधार करने की जरूरत है, ताकि कहीं बहुत देर न हो जाए।