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मोटे अनाज से दूर भाग रहा किसान, आधी रह गई बुआई

मोटे अनाज की बुआई के लक्ष्य अब तक आधा ही हासिल किया जा सका है। किसान अलग-अलग कारणों से इससे दूर हो रहा है 

By Manish Chandra Mishra

On: Wednesday 31 July 2019
 
Photo: Creative commons
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मध्यप्रदेश में मानसून के उतार चढ़ाव के बीच खरीफ की फसलों की बुआई जारी है। प्रदेश में अबतक 76 लाख 55 हजार हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई का कार्य हो चुका है। अभी बुआई जारी है। लक्ष्य एक करोड़ 37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई का है। बुआई को लेकर जारी आंकड़ों की तरफ देखे तो एक ट्रेंड नजर आता है, और वह है अनाजों के प्रति किसान का मोहभंग। अनाज में मोटे अनाज का रकवा लगातार कम होता जा रहा है।

इस बार प्रदेश में 43 लाख 99 हजार हेक्टेयर अनाज बोने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक महज 21 लाख 80 हजार हेक्टेयर में अनाज लगाए गए हैं। इन अनाजों में धान, ज्वार, मक्का, बाजरा, कोदो आदि शामिल हैं। इस आंकड़े में अकेले धान और मक्का का रकवा अधिक है। मोटे अनाज न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं बल्कि इन्हें उपजाने में पानी की कम मात्रा लगती है। ये फसल कम कम पानी और बंजर भूमि तथा विपरीत मौसम में भी ये अनाज उगाए जा सकते हैं।

सल्हार, कांग, ज्वार, मक्का, मडिया, कुटकी, सांवा, कोदो आदि में अगर प्रोटीन, वसा, खनिज तत्त्व, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, ऊर्जा कैलोरी, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, कैरोटीन, फोलिक ऐसिड, जिंक तथा एमिनो एसिड की मात्रा गेंहू और चावल जैसे अनाज की तुलना में काफी अधिक होती है। बाजरा में विटामिन बी और आयरन, जिंक, पोटैशियम, फॉसफोरस, मैग्नीशियम, कॉपर और मैंगनीज जैसे आहारीय खनिजों की उच्च मात्रा होती है। इसी तरह ज्वार भी पौष्टिक गुणों से भरा होता है।

हालांकि, तुअर, उड़द, मूंग, कुलथी आदि दलहन फसलों की 10 लाख 40 हजार हेक्टेयर में बुआई की गई है। लक्ष्य 23 लाख 15 हजार का है। कपास 6 लाख 19 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य के विरुद्ध 5 लाख 73 हजार हेक्टेयर में लगाया गया है। प्रदेश में 48 प्रतिशत खाद्यान्न और 60 प्रतिशत तिलहन फसलों की बुआई हो चुकी है। सामान्य तौर पर प्रदेश में एक करोड़ 18 लाख 50 हजार हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई होती है।

क्या एमएसपी बढ़ने से बढ़ेगा रकवा

केंद्र सरकार ने वर्ष 2018-19 के लिए खरीफ फसलों में एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की है। हाईब्रिड ज्वार को 1700 से बढ़कर 2430 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है, वही मालदांडी ज्वार का समर्थन मूल्य 1725 से बढ़ाकर 2450 कर दिया गया है। बाजरा के मूल्य में भी 525 रुपए की बढ़ोतरी की गई है। यह अब 1950 रुपए प्रति क्विंटल बिकेगा। रागी का समर्थन मूल्य 1900 से बढ़कर 2897 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। किसानों का मानना है कि इसका असर धीरे-धीरे दिखेगा। होशंगाबाद जिले के किसान प्रतीक शर्मा बताते हैं कि मक्का का समर्थन मूल्य बढ़ने के बाद किसानों का रुझान उस तरफ बढ़ा है। हालांकि, किसान इस बात से भी सशंकित रहते हैं कि कहीं केंद्र सरकार मूंग की फसल की तरह ही खरीफ खरीदने में आनाकानी की तो बाजार में उस फसल की कीमत नहीं मिल पाएगी। 

मोटे अनाज का दायरा सिमटता गया

वर्ष          ज्वार        बाजरा       मक्का        कोदो-कुटकी   रागी   

2011-12     3,61,000    2,01,000    8,60,000    2,47,000    262

2017-18     2,05,000    2,36,249    10,58,853   1,52,183    444

*क्षेत्रफल हेक्टेयर में

 

किसानों के घर इतिहास बना मोटा अनाज

सतना जिले के मझगवां तहसील निवासी शिवकैलाश मवासी कहते हैं कि महज 20 साल पहले तक रागी, कोदो-कुटकी और ज्वार-बाजरा का खूब चलन था, लेकिन अब किसी के घर खोजने से भी ये अन्न नहीं मिलेंगे। छिंदवाड़ा के युवा किसान राजेंद्र पटेल बताते हैं कि बाजार में मोटे अनाज को बेचना आसान नहीं है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के एग्रेनॉमी के प्रोफेसर डॉ. एमएल केवट बताते हैं कि मोटे अनाज से दूरी की बड़ी वजह इसका बाजार खराब होना है। मक्का पशु के चारे के लिए बिक जाता है लेकिन बाजरा, ज्वार और कोदो को आसानी से बाजार नहीं मिल पाता। हालांकि, कोदो, बाजरा जब आम आदमी बाजार खरीदने जाता है तो उसे काफी अच्छी कीमत चुकानी होती है, लेकिन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता। इसकी दूसरी वजह तिलहन फसल विशेषकर सोयाबीन का बढ़ता बाजार है। यहां सोयाबीन की मांग इतनी अधिक है कि किसान का फसल काफी आसानी से बिक जाता है।

कम बारिश की वजह से धान की बुआई प्रभावित

मध्यप्रदेश में गुना,  विदिशा,  होशंगाबाद,  छतरपुर,  छिंदवाड़ा,  सिवनी,  बालाघाट, अनुपपुर, शहडोल, पन्ना और सीधी जिले में 20 से 40 प्रतिशत कम बारिश हुई है। अन्य जगहों पर जहां पर्याप्त बारिश हुई वहां भी लगातार बारिश न होने की वजह से धान के खेतों में बुआई लायक पानी नहीं बचा। मौसम की इस मार की वजह से भी मध्यप्रदेश में खरीफ और विशेषकर धान की फसल प्रभावित हुई है।