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मौसमी बदलाव से 25 से 40 फीसदी तक गिरा बिहार में शहद का उत्पादन

सरसों के मौसम में हर साल जिन शहद के बक्सों में 10 किलो तक शहद मिलता था, वह अब दो से छह किलो तक ही मिल रहा है

By Pushya Mitra

On: Friday 13 March 2020
 
File Photo: CSE
File Photo: CSE File Photo: CSE

इस साल बिहार में शहद के उत्पादन में 25 से 40 फीसदी तक की कमी हो सकती है। सरसों के मौसम में हर साल जिन शहद के बक्सों में 10 किलो तक शहद मिलता था, वह अब दो से छह किलो तक ही मिल रहा है। अमूमन पूरे बिहार में शहद उत्पादकों की यह शिकायत है। बिहार के दोनों कृषि विश्वविद्यालयों के शहद उत्पादन विभाग ने इसकी पुष्टि की है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है, इस बार सर्दी के मौसम में अनियमित तापमान रहने की वजह से ऐसा हो रहा है। सरसों के फूलों में परागकण की मात्रा भी कम है और मधुमक्खियों को भी काम करने का समुचित वक्त नहीं मिल रहा है। इन दोनों वजहों से शहद के उत्पादन में यह भारी गिरावट देखी जा रही है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर की शहद उत्पादन इकाई के प्रभारी रामानुज विश्वकर्मा ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि हमलोग अपने विश्वविद्यालय में भी शहद का उत्पादन करते हैं। हमने सरसों के मौसम में पाया कि जिन बक्सों में 21 दिनों में 10 किलो शहद भर जाता था, उनमें दो से चार किलो शहद ही मिल रहा है। ऐसी शिकायतें हमें अपने क्षेत्र के शहद उत्पादकों से भी मिल रही है। मैं आठ साल से विश्वविद्यालय में यह काम कर रहा हूं, मगर पहले कभी इतनी बुरी स्थिति नहीं देखी। रामानुज विश्वकर्मा के मुताबिक उनके क्षेत्र में शहद उत्पादक उत्पादन में 40 फीसदी कमी की बात कह रहे हैं। वे कहते हैं कि इस साल फरवरी महीने में दिन और रात के तापमान में अमूमन दस से बारह डिग्री का फर्क रहा, जो इस संकट की वजह लगता है।

डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के एपीकल्चर के व्याख्याता डॉ नीरज कुमार भी इस बात से सहमति जताते हैं कि इस साल उत्पादन में अमूमन 25 फीसदी की गिरावट देखी जा रही है। वे कहते हैं कि सरसों के पौधे में इस साल नेक्टर का निर्माण कम हुआ है और कई जगह सूख भी गया है। इसके अलावा मधुमक्खियों की भी सक्रियता कम रही है। इसकी वजह प्रथम दृष्टया मौसमी बदलाव ही लगती है। इस साल ठंड के मौसम में तापमान काफी अनियमित रहा। फरवरी महीने में बारिश और ओलावृष्टि की घटना भी हुई।

बिहार में अमूमन पांच हजार किसान शहद का उत्पादन करते हैं और वे 40 हजार के करीब मधुमक्खियों के बक्से लगाते हैं। वे किसान बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में भी शहद के उत्पादन के लिये जाते हैं। बिहार में शहद का उत्पादन मुख्यतः सरसों और लीची के मौसम में होता है। सरसों के फूल खिलने के बाद जनवरी माह के आखिर से बक्से लगाये जाने लगते हैं, जो मार्च के पहले हफ्ते तक चलते हैं। वहीं लीची के मौसम में भी मार्च के पहले हफ्ते से मधुमक्खियों के बॉक्स का लगना शुरू हो जाता है। रामानुज विश्वकर्मा कहते हैं कि इस साल लीची वाले बक्से में भी शहद कम ही मिल रहा है।

बिहार में शहद के बड़े कारोबारी गिरिराज किशोर कहते हैं कि निश्चित तौर पर इस साल शहद के उत्पादन में गिरावट आयी है। मगर वे इसे बहुत गंभीर बात नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि वैसे भी बिहार के उत्पादक कई राज्यों में जाकर शहद का उत्पादन करते हैं, ऑवरऑल उत्पाद के ठीक ही रहने की उम्मीद है। वे कहते हैं कि वैसे भी शहद का बाजार इन दिनों मंदा है। उत्पादन अधिक होने का भी कोई लाभ किसानों को नहीं मिलने जा रहा।

हालांकि सवाल किसानों के लाभ और हानि का ही नहीं है। सवाल यह है कि अब बिहार का शहद उत्पादन भी मौसमी बदलाव की चपेट में आने लगा है।