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गाय संकट- 3, मेवात का कलंक

हरियाणा का पिछड़ा जिला गाय से जुड़े सख्त कानून की सजा पा रहा है। लोगों की छवि गोस्तकर के रूप में बनाई जा रही है

By Jitendra

On: Saturday 12 January 2019
 
Credit: Kumar Sambhav Shrivastava
Credit: Kumar Sambhav Shrivastava Credit: Kumar Sambhav Shrivastava

“छोटी-सी पिकअप वैन में पशु चिकित्सक, चारा और पानी की टंकी कैसे रख सकते हैं।” यह कहते ही चाय की दुकान पर बैठे नूरूद्दीन का दर्द छलक उठता है। 50 साल के नूरूद्दीन पहले बकरी पालन का काम करते थे लेकिन अब साप्ताहिक फिरोजपुर झिरका पशु बाजार में आने वाले भैंसों पर रंगीन पहचान चिह्न लगाते हैं। इसके बदले उन्हें सप्ताह में दो बार प्रतिदिन 200 रुपए मिलते हैं। इसके अलावा अतिरिक्त आय के लिए वह कसाई की दुकान पर भी काम करते हैं जिससे उनकी कुल मासिक आमदनी लगभग 3,000 रुपए हो जाती है। यह कमाई पिछले साल तक की उनकी कमाई का सिर्फ 20 प्रतिशत है।

इस पशु बाजार में 35 किलोमीटर दूर नूंह के रेहनटापर गांव से आने वाले नूरूद्दीन गुस्से में कहते हैं, “सरकार को गाय, बछड़ों और बैल से दिक्कत है, लेकिन हमारे काम का गला क्यों घोंट रही है?”

राज्यों में पशुओं से जुड़े सख्त कानूनों ने मवेशी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। इन कानूनों ने मवेशी पालकों और इन्हें रखने वालों की आजीविका का अपराधीकरण कर दिया है। मेवात का यह क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित है।

पिछले दो सालों में गोरक्षकों द्वारा हत्या के 20 मामलों में से 15 मवेशियों को ले जाने के दौरान घटित हुए। पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स के अनुसार, अभी अपराधियों को सजा नहीं मिली है। इस अवधि में मवेशियों की आवाजाही से संबंधित 53 मामले दर्ज किए गए हैं।

बेदम व्यापार

दो हेक्टेयर क्षेत्र में फैले साप्ताहिक मवेशी बाजार में प्रति सप्ताह 1,500 से अधिक मवेशियों और भैंसों को लाया जाता है। स्थानीय नगरपालिका ने बाजार के लिए अनुबंध जारी करके दो करोड़ रुपए से अधिक अर्जित किए थे। लेकिन पिछले एक साल से पशुओं का व्यापार, विशेषकर मवेशियों, भैंसों और बकरियों का काफी धीमा हो गया है। इसका कारण मवेशियों को ले जाने के दौरान होने वाले हमले हैं।

इसीलिए जिले के कृषि अधिकारियों ने ऐसे बाजारों में पशु व्यापार से संबंधित आंकड़े साझा नहीं किए। हालांकि एक अधिकारी नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि व्यापार में करीब 80 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

दरअसल मवेशी राज्य का विषय है। इस कारण कुछ राज्य बूचड़खानों को अनुमति देते हैं जबकि कुछ शर्तें लगा देते हैं, जैसे:

  • गाय के बूचड़खाने को केरल, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघायल और त्रिपुरा में स्वीकार्य है
  • असम फिट फॉर स्लॉटर प्रमाणपत्र के साथ इसे स्वीकृति देता है
  • ओडिशा, तमिलनाडु और कर्नाटक गाय को छोड़कर सभी गोवंश के बूचड़खानों को फिट फॉर स्लॉटर प्रमाणपत्र के साथ स्वीकार करता है
  • जम्मू एंव कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर सभी राज्यों में भैंसों के बूचड़खानों को स्वीकृति दी गई है।

गोरक्षक इन अंतरों को इस्तेमाल करके मवेशी पालकों पर हमले करते हैं जिससे ठेकेदारों में भय व्याप्त हो जाता है। ठेकेदार नूर शाह बताते हैं, “इस सप्ताह मुश्किल से 300 भैंसों का व्यापार किया गया।” यह स्थिति पिछले कुछ सालों से यथावत है। वह बताते हैं कि ग्रामीणों के पास भी मुश्किल से ही मवेशी मिलेंगे।

अन्य उत्तर भारतीय राज्यों से आने वाली रिपोर्ट्स से भी ऐसी स्थिति का इशारा मिलता है। पुश्कर के लोकप्रिय पशु मेले में मवेशियों की आवक कम हुई है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में लगने वाले नक्खास पशु बाजार में भी हाल में केवल 12 भैंस और 15 बकरियों बेची जा सकीं। बाजार में एक भी बैल नहीं बिका और कोई गाय बाजार नहीं पहुंची।

संकट कितना गंभीर  

19वीं पशुधन जनगणना के अनुसार, हरियाणा में 18 प्रतिशत मवेशी कम हुए हैं। मेवात में ही अकेले 33,000 से अधिक देसी नस्ल के मवेशी हैं। लेकिन ये बमुश्किल ही दिखाई देते हैं। पहले मवेशी व्यापार सर्कुलर अर्थव्यवस्था का हिस्सा था। किसान उत्पादक मवेशियों को खरीदने के लिए अनुत्पादक मवेशियों को बेचते थे। मवेशी अपना जीवनचक्र पूरा करते-करते पांच या छह घरों से गुजरता है। इससे मवेशी की नस्ल में सुधार होता है।

हरियाणा गोवंश संरक्षण और गोसंवर्धन अधिनियम, 2015 राज्य में गोहत्या, खपत, बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध लगाता है। इसने ग्रामीणों के बीच गाय को एक खारिज मवेशी बना दिया है। पहले ये ग्रामीण पशु व्यापार करते थे या डेरी का व्यवसाय संचालित करते थे।

कानून में 10 साल तक सश्रम कारावास और एक लाख रुपए तक दंड का प्रावधान है। इससे किसान अनुत्पादक पशुओं को अपने पास रखने को बाध्य हुए हैं। डाउन टू अर्थ की गणना के अनुसार, इन्हें रखने का खर्च करीब 72,000 रुपए है।

हरियाणा में देसी गाय राज्य के दूध उत्पादन में केवल छह प्रतिशत ही योगदान देती है। सख्त कानून ने उनके अस्तित्व पर ही संकट मंडरा सकता है।

अहमदबास गांव का ही उदाहरण लीजिए। चिंतित ग्रामीणों ने यहां अपने पशुओं को तब खुला छोड़ दिया जब उन्हें पता चला कि सरकारी अधिकारी उनकी गणना के लिए आ रहे हैं। ग्रामीण खालिद बताते हैं, “आसपास के गांवों में यह भी यह खबर तेजी से फैल गई और वहां भी मवेशियों को त्याग दिया गया।”

फिरोजपुर झिरका बाजार में लोग एक स्वर में कहते हैं, “यहां गाय का व्यापार नहीं होता। हम परंपरागत रूप से भैंसों और बकरियों का व्यापार कर रहे हैं।” एक शख्स धीमे स्वर में कहता है, “अगर हम गाय का व्यापार करते हैं तो वह दूध के लिए ही होता है।”

सबसे संवेदनशील

कानून और हिंसा का असर केवल गोवंश के व्यापार पर ही नहीं पड़ा है। नूरूद्दीन कहते हैं, “पुलिस ने हमारे बकरियों के व्यापार को भी बंद करा दिया है।” इस काम से जुड़े लोग अब गरीबी के दलदल में धंसते जा रहे हैं।  

सामाजिक-आर्थिक जाति सर्वेक्षण 2011 के अनुसार, नूंह जिला विकास के सभी संकेतकों पर सबसे निचले पायदान पर है। करीब 70 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 5,000 रुपए से कम है। करीब 50 प्रतिशत परिवार दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में जिले का प्रतिनिधित्व सबसे कम है।

बकरियों के व्यापार से कभी हर महीने 25,000 रुपए कमाने वाले नुरूद्दीन भी मुश्किल दिनों से गुजर रहे हैं। नूरूद्दीन बताते हैं, “ वह 2018 की ईद से एक दिन पहले का दिन था। मैं 30 बकरियों को एक पिकअप वैन में लेकर गुरूग्राम जा रहा था। सोहना रोड पर पुलिस ने उनकी वैन रोक ली और सभी बकरियों को पशु क्रूरता कानून का हवाला देकर जब्त कर लिया। निराश नूरूद्दीन कहते हैं, “मुझे कहा गया कि मैं केवल 17 बकरियां लेकर जा सकता हूं और टेंपो के साथ एक डॉक्टर, चारा और पानी भी होना चाहिए।”

पुलिस थाने से बकरियों को छुड़ाने में उन्हें 15 दिन लगे। इस प्रक्रिया में 19 बकरियां मर गईं, कुछ भाग गईं। उन्हें केवल छह बकरियों ही मिल पाईं। इस कारण उन पर दो लाख रुपए का कर्ज हो गया। आमतौर पर छोटी अवधि के व्यापार के लिए कर्ज ऊंची ब्याज दरों पर मिलते हैं।

ऐसी ही कहानी 19 साल के इमरान कुरैशी भी बताते हैं। वह इसी जिले के रेहनगंज गांव में रहते हैं। दिल्ली पुलिस ने उनकी 39 बकरियों को जब्त कर लिया था और उनके ससुर मोहम्मद इकबाल पर पिछले साल फरवरी में यही आरोप थे।

उनके ससुर फोन पर बताते हैं, “पिछले दो महीनों में देखभाल के अभाव में हमारी 20 बकरियां मर गईं। क्या आप उन्हें वापस दिला सकते हैं? हम भारी कर्ज में हैं। हमने कुछ गलत नहीं किया।” उन्हें उम्मीद है कि मीडिया में आने के बाद उनकी मदद हो सकेगी।

जमानत के लिए तीस हजारी पुलिस थाने में उन्हें 15,000 रुपए देने पड़े। इमरान बताते हैं कि पुलिस ने बकरियों को रखने के लिए 250 रुपए प्रतिदिन मांगे थे, इस कारण उन्होंने बकरियों को वहीं छोड़ दिया। हालांकि पुलिस ऐसे किसी भी घटना से इनकार करती है और दावा करती है कि बकरियां पहले ही छोड़ दी गई थीं।

हरे हैं जख्म

भैंसों के व्यापारियों को तो इससे भी ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। रावली गांव के तौफीक कुरैशी बताते हैं कि 2016 में मथुरा में ट्रक में 19 भैंसों को ले जाने के दौरान कैसे उन पर हमला हुआ था।

वह बताते हैं, “खैर में गोरक्षकों ने भैंस ले जा रहे 5 ट्रकों को पकड़ लिया और 50 हजार रुपए की मांग की। जब रुपए देने से मना कर दिया तो पुलिस ने सभी ट्रकों को जब्त कर लिया। पानी और भोजन के अभाव में 6 भैंसें एक दिन में ही मर गईं। हमें भैंसों को छुड़ाने के लिए एक लाख रुपए देने पड़े।”

जमील कुरैशी के माथे पर अब भी 36 टांके दिखाई देते हैं। अप्रैल 2016 में उत्तर प्रदेश पुलिस की पिटाई से उन्हें चोट लगी थी। मजदूरी करने वाले 21 साल के जमील बकरियों को वाहन में चढ़ाने और उतारने का काम करते हैं। उस दिन वह एक वैन में 36 बकरियों को लेकर जा रहे थे।

जमील बताते हैं, “गाजियाबाद के सेक्टर 62 में पुलिस ने उनकी पिटाई कर दी और पांच हजार रुपए छीन लिए और सभी बकरियां ले लीं। इसके बाद हम कभी गाजियाबाद नहीं गए।” 

मवेशी व्यापार से जुड़े लोगों पर हो रहे हमले गोरक्षकों और पुलिस को रिश्वत देने का बढ़ावा देते हैं। एक बार मथुरा में पुलिस के हाथों मार खा चुके ट्रक ड्राइवर रोशन खान बताते हैं, “हरियाणा के होडल और उत्तर प्रदेश के कोसी कला में हम गोरक्षकों को हर महीने पांच हजार रुपए देते हैं जबकि पुलिस को प्रति मवेशी 500 रुपए देते हैं।”

सामुदायिक अपमान   

इस तरह की प्रतिक्रिया देना आसान नहीं है। बाजार में आने वाले लोगों के चेहरों पर डर स्पष्ट देखा जा सकता है। नाम लेना को दूर, वे उस पुलिस थाने का नाम लेने से भी डरते हैं जहां उन्हें रखा गया था।

धीरे-धीरे एक पैटर्न उभरकर सामने आ रहा है। मुस्लिम और दलित आबादी वाले जिले को बदनाम किया जा रहा है। मांस का एक छोटा टुकड़ा मिलने पर भी बीफ का आरोप मढ़ा जा रहा है। इससे हमलों को बढ़ावा मिल रहा है।

फिरोजपुर झिरका के पास एक गांव अपनी बिरयानी के लिए लोकप्रिय है। ग्रामीणों का आरोप है कि बीफ बेचने का आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है जबकि हम बकरे और भैंस का मांस इस्तेमाल करते हैं। अगस्त 2016 में मुंडका गांव से बिरयानी के सैंपल लिए गए थे और सात लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

तीन साल पहले एक पिकअप वैन लेने वाले हारुन बताते हैं कि काम मंदा होने के कारण उन्हें वैन की किस्त देने में परेशानी हो रही है। उत्पीड़न के डर से वह जिले से बाहर जाने से बचते हैं। क्षेत्र के मजदूरी भी ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे हैं।

धाधुली की खुर्द गांव में रहने वाले मोहम्मद उमर काम की तलाश में फरीदाबाद गए तो यह अफवाह फैला दी गई कि वह गाय की तलाश में आए हैं। एक अन्य युवा इस्तियाक बताते हैं, “हम मेवात में ही काम करना पसंद करते हैं क्योंकि बाहर हमारी छवि गोतस्कर की बना दी गई है।”

("भारत का गाय संकट" सीरीज का यह तीसरा लेख है। इस सीरीज में पशु व्यापार पर लगे प्रतिबंध और गोरक्षा से पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाएगा)