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1993 से बड़ा है टिड्डी दल का हमला, एक दिन में खा जाती हैं 2500 लोगों के बराबर खाना

सर्दियों में टिड्डियां अपने आप ही खत्म हो जाती थी, लेकिन मौसम के बदलते पैटर्न की वजह से टिड्डियां अभी भी भारत में अपना कहर बरपा रही हैं। इस वजह से इसे 1993 से भी बड़ा हमला बताया जा रहा है

By Raju Sajwan

On: Saturday 28 December 2019
 
Photo credit: Creative commons
Photo credit: Creative commons Photo credit: Creative commons

 

राजस्थान के बाद अब गुजरात में टिड्डी दल ने हमला कर फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। टिड्डी दल का यह हमला इस बार ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले जब 1993 में टिड्डी दल ने फसलों को चौपट किया था तो उस समय अक्टूबर में ठंड की वजह से टिड्डियां मर गई थी, लेकिन इस बार सर्दी का मौसम चरम पर होने के बावजूद टिड्डी दल न केवल सक्रिय है, बल्कि उनका हमला और ज्यादा खतरनाक है।

गुजरात के जिन इलाकों में इन दिनों टिड्डी दल सक्रिय है, उनमें बनासकांठा, साबरकांठा, मेहसाणा, कच्छ और पाटन प्रमुख है। अनुमान है कि इस समय लगभग 5000 हेक्टेयर में बोई गई सरसों, अरंडी, सौंफ, जीरा, कपास, आलू, गेहूं और रतनजोत जैसी फसलों को टिड्डियां नष्ट कर रही हैं। हमले की गंभीरता को समझते हुए केंद्र सरकार ने 11 अधिकारियों का दल गुजरात भेजा है।

दरअसल, भारत के राजस्थान के कुछ शुष्क जिलों में जून 2019 में टिड्डी दल ने हमला किया था। यह टिड्डी दल पाकिस्तान से आया था।  शुरू में अधिकारियों को लगा कि यह सामान्य हमला है, जो दो तीन साल में होता रहता है, लेकिन कुछ समय बाद हमले की गंभीरता समझ में आई और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के अधीन काम कर रहे लोकोस्ट (टिड्डी) वार्निंग ऑर्गनाइजेशन (एलडब्ल्यूओ) को सक्रिय किया गया।

15 दिसंबर 2019 को एलडब्ल्यूओ द्वारा जारी बुलेटिन में दावा किया गया है कि 15 दिसंबर 2019 तक एलडब्ल्यूओ द्वारा 3,10,584 हेक्टेयर इलाके में दवा का छिड़काव किया जा चुका है। एलडब्ल्यूओ से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि 1993 में कितने इलाके में दवा का छिड़काव किया गया, इसका आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इस बार का टिड्डियों का हमला 1993 से अधिक बड़ा है। 

जलवायु परिवर्तन है वजह

सर्दी शुरू होने के बावजूद टिड्डियों का कहर क्यों बना हुआ है, इस बारे में भुज के स्थानीय नियंत्रण केंद्र के पौध संरक्षण अधिकारी एएम बारिया ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इसकी जांच की जा रही है कि आखिर टिड्डियां अभी सक्रिय क्यों हैं, लेकिन मोटे तौर पर माना जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जिस तरह मौसम का पैटर्न बदला है, उससे टिड्डियों को गुजरात में ठहरने का अधिक मौका मिल गया है। उन्होंने बताया कि इस बार गुजरात में बारिश की शुरुआत देरी से हुई है, जबकि राजस्थान में जहां टिड्डियां सक्रिय थी, वहां मौसम ठंडा हो गया, जबकि बारिश न होने के कारण गुजरात का मौसम गर्म था, इस कारण ये टिड्डियां गुजरात में प्रवेश कर गई।

उधर, एक अन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों में पाकिस्तान से टिड्डियां आई थी, लेकिन गुजरात के जिन इलाकों में अब टिड्डियों का हमला हुआ है, वे राजस्थान से आई हैं। ये टिड्डियां अपरिपक्व हैं, जो फसलों को ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं।

खाती है 2500 आदमी के बराबर खाना

एलडब्ल्यूओ द्वारा टिड्डी नियंत्रण एवं शोध विषय पर जारी एक डॉक्यूमेंट बताता है कि दुनिया में टिड्डियों की 10 प्रजातियां सक्रिय हैं, इनमें से चार प्रजातियां भारत में समय-समय पर देखी गई हैं। इनमें से सबसे खतरनाक रेगिस्तानी टिड्डी होती है। इसके अलावा प्रवासी टिड्डियां, बॉम्बे टिड्डी और ट्री (वृक्ष) टिड्डी भी भारत में देखी गई हैं। इस बार जो प्रजाति सक्रिय है, वह रेगिस्तानी टिड्डियां हैं। एक व्यस्क टिड्डी की रफ्तार 12 से 16 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है। ये टिड्डियां किस कदर नुकसानदायक हो सकती हैं, इसका अनुमान ऐसा लगाया जा सकता है कि इन टिड्डियों का एक छोटा दल एक दिन में 10 हाथी और 25 ऊंट या 2500 आदमियों के बराबर खाना खा सकता है।

भारत में कब-कब किया हमला

टिड्डी चेतावनी संगठन की स्थापना (एलडब्ल्यूओ) 1946 में की गई थी। संगठन का अनुमान है कि 1926 से 1931 के बीच टिड्डियों के हमले से लगभग 10 करोड़ का नुकसान हुआ, जो 100 साल के दौरान सबसे अधिक है।  इसी तरह 1940-46 और 1949-55 के दौरान दो बार टिड्डियों का हमला हुआ और दोनों बार लगभग दो-दो करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1959-62 के चक्र में केवल 50 लाख रुपए का नुकसान हुआ,इसके बाद 1978 और 1993 में टिड्डियों का हमला हुआ और 1993 में लगभग 75 लाख रुपए के नुकसान का आकलन किया गया।