Sign up for our weekly newsletter

2019 में टिड्डी दलों ने भारत पर 200 से अधिक बार किया हमला

आमतौर पर भारत में हर वर्ष टिड्डी दल के 10 से कम हमले होते हैं, लेकिन 2019 में टिड्डी दलों ने राजस्थान और गुजरात के कई जिलों में भारी नुकसान पहुंचाया

By DTE Staff

On: Tuesday 26 May 2020
 
मध्यप्रदेश के मंदसौर में छिड़काव के बाद मरी हुई टिड्डियां। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र
मध्यप्रदेश के मंदसौर में छिड़काव के बाद मरी हुई टिड्डियां। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र मध्यप्रदेश के मंदसौर में छिड़काव के बाद मरी हुई टिड्डियां। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र

"टिड्डियों ने डेढ़ लाख रुपए की जीरे की फसल बर्बाद कर दी। जीरे की फसल अरंडी के मुकाबले मुलायम होती है, शायद इसीलिए टिड्डियों ने उसे पहले चट किया। खेती से मुझे हर साल करीब 25-30 बोरी जीरा होता है, लेकिन बमुश्किल एक बोरी जीरा ही हो पाया।” यह दर्द बाड़मेर जिले की सेड़वा तहसील के बुरहान का तला गांव में रहने वाले हाकमराम बालाज का है। हाकमराम ने रबी के मौसम में 45 बीघा जमीन पर जीरे व अरंडी की फसल बोई थी। 2019 के अंत में मावठ (सर्दियों में होने वाली बारिश) हुई, इसलिए हाकमराम को अच्छी फसल की उम्मीद थी, लेकिन 40 साल के हाकमराम के इस अरमान पर टिड्डी दल ने पानी फेर दिया। टिड्डियों के दो हमलों से उनकी पूरी फसल नष्ट हो गई। 

हाकमराम बताते हैं, “जीरे की एक बीघा खेती में 1800-2000 रुपए खर्च होते हैं। मैंने 300 रुपए किलो के भाव से 30 किलो बीज खर्च किए थे। इसके अलावा यूरिया और ट्रैक्टर चलवाने का करीब 50-60 हजार रुपए खर्च हुआ। मेरे ऊपर सरकार का चार लाख रुपए का कर्जा पहले से ही है जो मैंने ट्यूबवेल खुदवाने के लिए लिया था।” सात बेटी और एक बेटे के पिता हाकमराम अब 300 रुपए रोजाना पर बेलदारी (दिहाड़ी मजदूरी) को मजबूर हैं। फसल खराब होने से कर्ज चुका पाना, अब उनके लिए बेहद मुश्किल है।

बाड़मेर के किसान जुगताराम भी टिड्डी दल के हमले के भुक्तभोगी हैं। 26 दिसंबर, 2019 को जुगताराम ने ऐसा कुछ देखा जिससे उनके होश फाख्ता हो गए। उन्होंने बताया, “मैंने देखा कि लाखों की संख्या में टिड्डियां उड़कर आ रही हैं। ऐसा लग रहा था मानो काले बादल तेजी से बड़े होते जा रहे हों और कई किलोमीटर के इलाके को ढंककर सूरज को जैसे ग्रहण लगा दिया हो। हमने पुराने तरीकों जैसे खाली बर्तन बजाकर और धुआं करके उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।”

इन कीटों ने तारदो का ताल गांव में स्थित जुगताराम की 12 हेक्टेयर कृषि भूमि पर हमला किया, जिससे उनकी जीरे और अरंडी की खड़ी फसल बर्बाद हो गई तथा उन्हें चार लाख का नुकसान झेलना पड़ा। जिले के 12 अन्य गांवों में भी एक ही दिन में सारी फसल बर्बाद हो गई। जुगताराम ने जो देखा वह रेगिस्तानी या पीली टिड्डियों (शिस्टोसरका ग्रेगेरिया ) का दल था। जुगताराम इन्हें पहचानते हैं। उन्होंने बताया, “मैंने पहली बार उन्हें नहीं देखा था लेकिन इस बार उनका आकार बहुत बड़ा था और उनके हमले का वक्त भी कुछ अटपटा था।”

हाकमराम और जुगताराम की तरह उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के 12 जिलों के अलावा गुजरात के चार जिले, पंजाब के तीन और हरियाणा के एक जिले के किसान इतिहास के सबसे भीषण टिड्डी हमले से गुजर रहे हैं। हजारों किसानों की जीरे, ईसबगोल, अरंडी, सरसों और गेहूं की फसलों को नुकसान पहुंचा है। बीकानेर, अनूपगढ़, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, नागौर, पाली, उदयपुर, सिरोही और डूंगरपुर जिलों में टिड्डियों का हमला हुआ है। हालात इतने गंभीर हैं कि फसल खराब होने के सदमे से बाड़मेर के 48 वर्षीय किसान निंबाराम जाट और 38 वर्षीय भागराम की मौत हो गई। 

पाकिस्तान से हर वर्ष टिड्डी दल राजस्थान और गुजरात पहुंचते हैं। इनका जीवनकाल 90 दिन का होता है। यह जुलाई में आते हैं, अंडे देते हैं और अक्टूबर तक इनकी नई पीढ़ी पाकिस्तान-ईरान रवाना हो जाती है। टिड्डी दल हरियाली का पीछा करते हैं और उन इलाकों पर हमला करते हैं जहां मॉनसून को गुजरे ज्यादा वक्त न हुआ हो क्योंकि यह उनके खाने और प्रजनन का सबसे सही वक्त होता है।

जोधपुर में केंद्र सरकार के लोकस्ट वॉच सेंटर (एलडब्ल्यूसी) के एक वैज्ञानिक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आमतौर पर भारत में हर वर्ष टिड्डी दल के 10 से कम हमले होते हैं लेकिन वर्ष 2019 में 200 से ज्यादा बार हमले हुए। अब तक इन हमलों की संख्या के बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। हमलों की संख्या में बढ़ोतरी के अलावा चश्मदीदों का कहना है कि टिड्डी दल का आकार भी सामान्य आकार के मुकाबले दोगुने से भी अधिक हो गया है।

वर्ष 2019 में भारत में जलवायु संबंधी दो अप्रत्याशित घटनाएं घटीं जो टिड्डी दल के हमले की असामान्य संख्या और आकार पर रोशनी डालती हैं। पहला, पश्चिमी राजस्थान में समय से पहले मॉनसून आया जो आमतौर पर 1 जुलाई को आता था अर्थात यह डेढ़ महीना पहले ही आ गया। इससे टिड्डियों के प्रजनन की परिस्थितियां तैयार हो गईं। दूसरा, नवंबर तक लगातार बारिश होती रही, जिससे टिड्डियों को खाना मिलता रहा और वे यहां जमी रहीं जबकि उन्हें आमतौर पर अक्टूबर में लौट जाना चाहिए था। इन सबमें खास बात यह हुई कि यहां ज्यादा देर तक रुकने के कारण उन्होंने जून, सितंबर और दिसंबर में तीन बार प्रजनन किया। इस तरह तेजी से अपनी संख्या बढ़ाई।

राजस्थान के 12 जिलों का 6,63,391 हेक्टेयर क्षेत्र टिड्डी दल से प्रभावित हुआ। खरीफ सीजन में 2,76,640 हेक्टेयर और रबी सीजन में 3,86,751 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। सबसे ज्यादा नुकसान वाले छह जिले बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर, जालौर और पाली थे। इन जिलों में कुल बुआई क्षेत्र में से 1,49,821 हेक्टेयर भूमि पर फसलों को नुकसान हुआ। जिलों में 54,261 किसानों की फसलों को नुकसान हुआ है। आपदा प्रबंधन सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग ने 90.20 करोड़ रुपए इन जिलों के प्रभावित किसानों के लिए जारी कर दिए हैं। इस राशि में से संबंधित जिलों ने 86.21 करोड़ रुपए का मुआवजा किसानों को वितरित कर दिया है। इसमें से 20.47 करोड़ रुपए बाड़मेर, 2.50 करोड़ बीकानेर, 29.20 करोड़ जैसलमेर, 82 लाख जोधपुर, 37.01 करोड़ रुपए जालौर और 20 लाख रुपए पाली जिले में मुआवजे के रूप में बांटे गए।

पूर्व पौधा संरक्षण अधिकारी और डेजर्ट लोकस्ट एक्सपर्ट अनिल शर्मा का कहना है कि 2019 में हुआ हमला काफी जबरदस्त था। इन टिड्डी दलों ने गुजरात और राजस्थान की 3,92,093 हेक्टेयर जमीन की हरियाली को चट कर दिया। और सरकार कुछ नहीं कर पाई।