भारत में आधे से अधिक फसलों की किस्मों पर मंडराया विलुप्त होने का खतरा: अध्ययन

अध्ययन में पता चला है कि भारत के मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों में एक महत्वपूर्ण विविधता पाई जाती है, जिनमें से 50 फीसदी से अधिक किस्मों पर खतरा मंडरा रहा है।

By Dayanidhi

On: Monday 15 November 2021
 
भारत में आधे से अधिक फसलों की किस्मों पर मंडराया विलुप्त होने का खतरा: अध्ययन
फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स

दुनिया भर में खाद्य और पोषण सुरक्षा के साथ-साथ लाखों लोगों की आजीविका के लिए अलग-अलग तरह की फसलें बहुत महत्वपूर्ण हैं। फसलों की इस विविधता में कई अलग-अलग तरह की प्रजातियां और किसानों द्वारा उगाई जाने वाली किस्में शामिल हैं। जिनमें से कई किस्मों को किसानों और स्वदेशी लोगों द्वारा सालों से संरक्षित किया जा रहा है।

फसलों के हर किस्म में अनोखे आनुवंशिक लक्षण होते हैं। जो प्रजनकों और किसानों को जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और शमन जैसी तत्काल वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में मदद करते हैं। हमारी खाद्य प्रणालियों को बदलते जलवायु के अनुसार ढलने में मदद कर सकते हैं, वर्तमान और भविष्य में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि इस बात को स्वीकारा गया है कि इनमें से कई फसलें और किस्में गंभीर दर से नष्ट हो रही हैं। लेकिन जब यह पता चलता है कि हमने कितनी किस्मों को खो दिया है और यह कौन सी फसलें और उनकी किस्में हैं, यह जानने के लिए आंकड़ों का अभाव है। यह सब देश, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर कृषि जैव विविधता की निगरानी के लिए स्थापित अंतरराष्ट्रीय ढांचे के लिए एक चुनौती पेश करते हैं। जिसके कारण संरक्षण और जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों में रुकावट आती है।

अब एक ऐसी पद्धति विकसित की गई है जो इन आंकड़ों की कमी को पाटने में मदद कर सकती है। एलायंस ऑफ बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और सीआईएटी द्वारा विकसित, भागीदारों के साथ काम करते हुए, वैराइटल थ्रेट इंडेक्स - खेत पर, क्षेत्रों के बीच और समय के साथ विविधता में परिवर्तनों की निगरानी के लिए एक व्यवस्थित तरीका प्रस्तावित करता है।

जोकि स्थानीय कृषि जैव विविधता के बारे में किसानों से जानकारी को इकट्ठा करने के लिए एक त्वरित मूल्यांकन तकनीक का उपयोग करता है। जिसमें किसानों की जानकारी और उन्नत किस्मों दोनों के बारे में पता लगाए गए प्रत्येक फसल और किस्म के लिए खतरे के स्तर की पहचान और गणना करने के लिए चार-कोशिका मूल्यांकन पद्धति शामिल की गई हैं। 

अध्ययन में भारत के सात राज्यों के लगभग 600 किसानों ने पांच अलग-अलग कृषि क्षेत्रों से भाग लिया। लिंग, जातीयता और जाति के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करने वाले किसानों को 17 अध्ययन स्थलों में फसलों और किस्मों के बारे में उनके ज्ञान के आधार पर चुना गया था। उनमें से प्रत्येक ने अपने घर में उगाई जाने वाली फसलों और किस्मों को सूचीबद्ध किया, उनके उपयोगों को लिखा गया। जिसमें पिछले दस वर्षों के दौरान उगाई गई किस्मों की जानकारी भी शामिल थी जो अब उगाई नहीं जाती है।

परिणामों से पता चला कि अध्ययन स्थलों के अंदर विशेष रूप से मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों में एक महत्वपूर्ण विविधता पाई जाती है, जिनमें से 50 फीसदी से अधिक किस्मों पर खतरा मंडरा रहा है। रुझानों से पता चला है कि जिन फसलों और किस्मों का उपयोग ज्यादातर उपभोग के लिए किया जाता है, उन्हें अक्सर खतरे के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जबकि बिक्री और चारे के साथ-साथ घरेलू भोजन जैसे कई उपयोगों वाली किस्मों को कम खतरे के रूप में वर्गीकृत किए जाने की संभावना कम थी। कम से कम 76 फीसदी या उससे अधिक भू-प्रजातियों को असुरक्षित, निकट संकटग्रस्त, संकटग्रस्त, या उनके नुकसान होने की सूचना दी गई। जबकि कम से कम खतरे वाली किस्मों को मुख्य रूप से सुधार या जारी की गई किस्मों के रूप में दर्ज किया गया।

वैरायटी थ्रेट इंडेक्स कैसे उपयोगी हो सकता है?

चूंकि 2020 के बाद के वैश्विक जैव विविधता ढांचे के तहत प्रगति को मापने और संरक्षण रणनीतियों को आगे बढ़ाने के प्रयासों में तेजी आई है। इस तरह की जानकारी संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और जैव विविधता सम्मेलन के सचिवालय (सीबीडी) द्वारा वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है। खाद्य और कृषि के लिए वनस्पति आनुवंशिक संसाधनों की वैश्विक स्थिति की निगरानी के लिए लक्ष्य और संकेतक विकसित करना, जिसमें कृषि फसल और विविधता को मापने और निगरानी करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमती के सूचक शामिल हैं।

भारत के पांच अलग-अलग कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्रों में 50 फीसदी से अधिक भू-प्रजातियों को खतरे में माना जाता है। यह जानने के बाद कि कौन से सबसे अधिक खतरे में हैं, लोगों को खाद्य प्रणालियों को बदलने और जीवन में सुधार करने के लिए आवश्यक विकल्प देने हेतु तत्काल संरक्षण कार्यों को करने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन एमडीपीआई नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

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