उत्तर प्रदेश में लगभग 40 हजार हेक्टेयर में खड़े गन्ने को हुआ कैंसर

रेड रॉट (लाल सड़न) रोग के कारण उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में गन्ने की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है

By Raju Sajwan

On: Tuesday 24 November 2020
 
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के गांव लोनी में रेड रॉट बीमारी के कारण गन्ने की फसल सूख गई है। फोटो: राजू सजवान
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के गांव लोनी में रेड रॉट बीमारी के कारण गन्ने की फसल सूख गई है। फोटो: राजू सजवान उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के गांव लोनी में रेड रॉट बीमारी के कारण गन्ने की फसल सूख गई है। फोटो: राजू सजवान

मुन्ने खान हर साल अपने दो बीघा खेतों में गन्ना लगाते हैं। दो साल पहले उनके खेत में 120 क्विंटल गन्ना हुआ था, लेकिन पिछले साल 80 क्विंटल गन्ना निकल पाया और इस बार केवल 40 क्विंटल गन्ना ही बच पाया, बाकी सब सड़ गया। मुन्ने खान उन गन्ना किसानों में शामिल हैं, जो गन्ने में लगे रोग रेड रॉट (लाल सड़न) के शिकार हुए हैं।

मुन्ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे जिले हरदोई के गांव लोनी के हैं। लोनी उन प्रमुख गांवों में शामिल हैं, जिनकी जमीन पर चीनी मिल लगी हैं और इस वजह से गांव के सभी लोग गन्ने की खेती कर रहे हैं। वह अपने खेतों में कई साल से 0238 वैरायटी का गन्ना लगा रहे हैं। इस वैरायटी की वजह से दो साल पहले तक उनकी आमदनी भी बढ़ गई थी, क्योंकि पिछली वैरायटी के मुकाबले इस वैरायटी का गन्ना लगभग दोगुना होता था, लेकिन इस बार इस वैरायटी पर रेड रॉट बीमारी लग गई है।

नगला भगवान गांव के किसान सुधीर पाठक 40 बीघा खेतों पर गन्ना लगाते हैं। वह बताते हैं कि 0238 वैरायटी ने गन्ना किसानों की तकदीर बदल दी, लेकिन अब यही वैरायटी मुसीबत बन गई है। जिन खेतों में 70 क्विंटल प्रति बीघा गन्ना होता था, इस साल केवल 20 क्विंटल प्रति बीघा गन्ना निकला है।

डाउन टू अर्थ ने पिछले दिनों हरदोई जिले के गांव लोनी, नगला भगवान, हरियावां, अहमदी और मुंढ़ेर गांव का दौरा किया। इन सभी  गांवों के पास चीनी मिल लगी हुई है। इस कारण लगभग सभी किसान गन्ने की फसल लगाते हैं, लेकिन सभी गांवों में किसानों ने रेड रॉट बीमारी से हुए नुकसान की जानकारी दी।

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के वैज्ञानिक अधिकारी सुजीत प्रताप सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि रेड रॉट गन्ने की पुरानी बीमारी है, लेकिन इस बार प्रकोप अधिक दिख रहा है। उन्होंने बताया कि उनका अनुमान है कि इस साल पूरे उत्तर प्रदेश में 30 से 40 हजार हेक्टेयर में लगी गन्ने की फसल को रेड रॉट से नुकसान पहुंचा है। राज्य के गन्ना एवं विकास विभाग ने पिछले साल रेड रॉट से 24 हजार हेक्टेयर में गन्ने की फसल का नुकसान का आकलन किया था।

शोध परिषद के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में लगभग 42 लाख किसान 23 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती करते हैं। किसानों की औसत उपज 79 टन है। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में गन्ने का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और इसका श्रेय गन्ने की वैरायटी सीओ 0238 को दिया जाता है।

सुजीत प्रताप सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में इस सीजन में गन्ने के कुल क्षेत्रफल में से 86 फीसदी हिस्से में सीओ 0238 वैरायटी की फसल लगाई गई और इसी वैरायटी पर रेड रॉट बीमारी लगी है। वह कहते हैं कि इस वैरायटी से किसान और चीनी मिल दोनों का फायदा होता है। जहां किसान को अधिक गन्ना मिलता है, वहीं इस वैरायटी की शुगर रिकवरी अच्छी होने के कारण चीनी मिलों को भी फायदा होता है।

क्या हैं रेड रॉट के कारण ?

सिंह कहते हैं कि कई सालों तक लगातार एक ही वैरायटी लगाने के कारण रेड रॉट का प्रकोप होता है। खेत की मिट्टी में फंफूदी बनने के कारण अगर वही वैरायटी दोबारा लगा दी जाती है तो गन्ना रेड रॉट का शिकार हो जाता है। इसलिए गन्ना किसानों को हर साल वैरायटी बदलने की सलाह दी जाती है, लेकिन किसान अधिक गन्ना हासिल करने के लिए वैरायटी नहीं बदलते। वह बताते हैं कि मिट्टी को उपचारित करके रेड रॉट का प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन एक बार गन्ने को यह रोग लग जाए तो इसका कोई इलाज नहीं है। इसलिए इसे गन्ने का कैंसर भी कहा जाता है।

कैसे बढ़ा 0238 वैरायटी का चलन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अनुसार सीओ 0238 को सीओ एलके 8102 और सीओ 775 के क्रॉस से साल 2009 में उत्पन्न किया गया था। सुजीत प्रताप सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2013-14 में इस वैरायटी का चलन शुरू हुआ। उस साल गन्ने के कुल पैदावार क्षेत्रफल में से 3.4 प्रतिशत इलाके में यह वैरायटी लगाई गई। इसके बाद 2014-15 में 8.44 प्रतिशत, 2015-16 में 19.8 प्रतिशत, 2016-17 में 35.47 प्रतिशत, 2017-18 में 52.55 प्रतिशत, 2018-19 में 67.64 प्रतिशत, 2019-20 में 69.02 प्रतिशत और 2020-21 में 86.70 प्रतिशत हिस्से में 0238 वैरायटी का गन्ना लगाया गया।  

ऐसे बढ़ा रेड रॉट का प्रकोप

सिंह कहते हैं कि सीओ 0238 वैरायटी में रेड रॉट बीमारी पहली बार 2015-16 में लगी थी, लेकिन तब इसने केवल 5 प्रतिशत फसल को चपेट में लिया था। लेकिन 2016-17 में 40 फीसदी फसल को प्रभावित किया और पिछले साल से 100 फीसदी को अपनी चपेट में ले रहा है। उन्होंने बताया कि इस आशय यह है कि यदि किसी खेत में रेड रॉट का असर है तो उस खेत में खड़े गन्ने की पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है।

एक साल के लिए छोड़ना होगा गन्ना

सिंह ने कहा कि एक बार यदि गन्ने पर रेड रॉट बीमारी लग जाती है तो उस फसल को नष्ट करना होगा और उस साल वहां गन्ने की बुआई नहीं करनी होगी, बल्कि कम से कम एक सीजन तक वहां गेहूं या धान की बुआई करनी होगी। इसके बाद अगली बार गन्ने की दूसरी वैरायटी लगानी होगी। किसान को उस खेत पर 0238 की बुआई बंद करनी होगी। उन्होंने बताया कि रेड रॉट की वजह से पहले भी कई वैरायटियां खत्म हो चुकी है। इसलिए किसान को यह मान लेना होगा कि एक बार रेड रॉट का शिकार होने के बाद इस वैरायटी को भी छोड़ना होगा।