डाउन टू अर्थ ग्राउंड रिपोर्ट: तिलहन की एक ऐसी फसल, जो हो रही है विलुप्त

सरकारों की उदासीनता की वजह से आदिवासियों की थाली से रामतिल गायब हो रहा है

By Raju Sajwan

On: Monday 10 October 2022
 
1985-86 में रामतिल की बुआई लगभग 6 लाख हेक्टेयर रकबे में हुई थी, जो 2020-21 में घटकर 1 लाख हेक्टेयर के आसपास रही

खरीफ विपणन सीजन के शुरू होने से पहले हर साल जिन प्रमुख 14 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जारी होता है, उसमें तिलहन की एक ऐसी फसल का नाम भी होता है, जिसके बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं। इसे रामतिल (नाइजर सीड) कहा जाता है। एमएसपी के मामले में रामतिल दूसरी सबसे महंगी फसल है। दिलचस्प बात यह है कि जहां एक ओर पिछले 12 साल में रामतिल की एमएसपी में लगभग तीन गुणा वृद्धि हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर इसके रकबे में तीन गुणा से अधिक कमी आई है। ऑल इंडिया कॉर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन सीसेम एंड नाइजर (एआईसीआरपी) जबलपुर की 2013 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 1985-86 में रामतिल की बुआई लगभग 6 लाख हेक्टेयर रकबे में हुई थी, जो 2020-21 में घटकर 1 लाख हेक्टेयर के आसपास रही (देखें, ऊंचा भाव, कम दिलचस्पी,)।

आखिर रामतिल एमएसपी की सूची में क्यों शामिल है, इसकी वजह एआईसीआरपी की रिपोर्ट में बताई गई है। इसमें कहा गया है कि देश के कई राज्यों में रामतिल आदिवासियों के खानपान और अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा का काम करता है। आदिवासी आबादी रामतिल के तेल का प्रयोग खाने बनाने के लिए करती है। रामतिल में लगभग 40 प्रतिशत तेल होता है। इसे जैतून के तेल का अच्छा विकल्प माना जाता है। आदिवासी भुने तिल को नाश्ते में खाना पसंद करते हैं। रामतिल के लड्डू भी बनाए जाते हैं। तेल निकालने के बाद बचने वाली खल का इस्तेमाल मवेशियों को चारे के रूप में किया जाता है। इसमें 31 से 40 प्रतिशत प्रोटीन होता है। रामतिल के तेल के औषधीय गुण हैं। इसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक्स, परफ्यूम और अन्य उद्योगों में किया जाता है।

रामतिल की खेती की खास बात यह है कि यह फसल लगभग बंजर जैसी जमीन पर भी हो जाती है। माॅनसून की पहली हल्की बारिश के बाद मिट्टी नम होने पर दो बार हल चलाकर अल्टा-पल्टी करके रामतिल के बीज खेतों में बिखेर दिए जाते हैं। उसके बाद बीच में दो बारिश पड़ने के बाद रामतिल के पौधे उग आते हैं। इसमें खाद या कीटनाशक नहीं डालने पड़ते और तीन महीने में फसल तैयार हो जाती है। खरीफ सीजन की इस फसल की बुआई का समय देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। तो फिर ऐसा क्या है कि इस फसल का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। अभी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा और आंध्रप्रदेश में भी रामतिल की खेती हो रही है। रामतिल के अलावा हिंदी में इसे जगनी या जटांगी, गुजराती में रामतल, मराठी में कराले या खुरसनी, कन्नड़ में उचेलू, ओडिया में अलाशी, बंगाली में सारगुजा और असमी में सोरगुजा कहा जाता है। लेकिन आदिवािसयों के इस खास उत्पाद को अब किसी की नजर लग गई है।

खात्मे की ओर

“हमारी पुश्तें रामतिल की खेती कर रही हैं। हमारे हर घर में रामतिल या रामतिल का तेल मिल जाएगा। जब पैसे की जरूरत पड़ती है तो पास के बाजार में रामतिल बेच आते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसकी खेती कम हो रही है।” …यह कहना है, याज्ञेश उरेती का। वह मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पहाड़ी रेंज में बसे मंडला जिले के गांव खमरिया रैयत में रहते हैं। उनकी पत्नी हाल ही में सरपंच का चुनाव जीती हैं। 62 परिवारों के इस गांव में गौंड जनजाति के लोग रहते हैं। ज्यादातर परिवार पठार की ऊपरी जमीन पर रामतिल की खेती करते हैं। जहां पानी ठहरता नहीं है। दरअसल यहां तीन तरह की जमीन है। सबसे ऊपर पठारी वाली जमीन को स्थानीय भाषा में बर्रा जमीन कहा जाता है। इसके बाद बीच की जमीन होती है। इसे मध्यभूमि कहा जाता है और सबसे नीचे की जमीन को झीला (झील जैसी) कहा जाता है। बर्रा जमीन पर बरसाती पानी नहीं रुकता। मध्यम जमीन में थोड़ा बहुत पानी रुकता है, जबकि झीला में पानी खड़ा हो जाता है। इसलिए खरीफ के मौसम में बर्रा जमीन पर रामतिल या कोदो कुटकी लगाया जाता है। मध्य जमीन पर दालें, कम अवधि की धान और सब्जियां उगाई जाती हैं, जबकि झीला में लंबे समय में तैयार होने वाली धान की किस्म बुवाई की जाती है।

पिछले कुछ सालों से रामतिल के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है। गांव की लगभग साठ वर्षीय सेवावाई मारकाम बताती हैं कि उन्हें ठीक से तो याद नहीं, लेकिन 10-12 साल से अमरबेल लगनी शुरू हुई। पहले अमरबेल कम लगती थी, इसलिए नुकसान नहीं होता था, लेकिन अब तो कई बार पूरी फसल चौपट हो जाती है। वह लगभग तीन एकड़ के खेतों में रामतिल उगाती हैं। परंतु हालात ऐसे ही रहे तो वह रामतिल उगाना बंद कर देंगी। याज्ञेश भी कहते हैं कि रामतिल में अमरबेल की समस्या बहुत बड़ी हो गई है, जिससे हारकर किसान रामतिल की खेती बंद कर रहे हैं। अमरबेल परजीवी पौधा है, जिसका वैज्ञानिक नाम कुस्कुटा सिनासिस है। लगभग 200 से अधिक परजीवी प्रजातियों में एक अमरबेल ऐसी खर-पतवार है, जो रामतिल की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हो रही है। वर्ष 2003 में नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर वीड साइंस, जबलपुर द्वारा प्रकाशित अध्ययन में भी कहा गया है कि रामतिल पर अमरबेल का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते रामतिल की पैदावार में 52 से 99.2 प्रतिशत की गिरावट आई है।

अमरबेल की वजह से बड़ी तादाद में किसानों ने रामतिल की बुवाई बंद कर दी है और अपने-अपने खेतों के चारों ओर मेढ़ लगाकर बारिश का पानी रोकते हैं और वहां धान लगाने लगे हैं। मंडला जिले के ही मवई ब्लॉक में रामतिल को जगनी के नाम से जाना जाता है। इस ब्लॉक के गांव आरा गुगरा के प्रेम सिंह अमठुरिया युवा किसान हैं। वह कहते हैं कि उनकी पुश्तें रामतिल लगाती थी, लेकिन जब उन्होंने खेती संभाली तो अमरबेल के कारण उनकी सारी फसल खराब हो गई। एक दो बार कोशिश करने के बाद उन्होंने रामतिल की खेती बंद कर दी और अपने खेतों में मेढ़ लगाकर धान की बुआई शुरू कर दी। वह कहते हैं कि धान की फसल पर अमरबेल नहीं लगती।

गांववासी बताते हैं कि उनके पुश्तैनी बीजों में अमरबेल नहीं लगता था, लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान बाजार में भी जगनी का बीज मिलने लगा है और जिस भी किसान बाजार से जगनी का बीज लेकर अपने खेतों में लगाया, उन फसलों पर अमरबेल की बीमारी लगने लगी। अब हालात यह हैं कि आसपास के गांवों के कई किसानों ने रामतिल की बुआई बंद कर दी है। दरअसल अमरबेल के फैलने का कारण बीज ही हैं, जो किसान या तो अनौपचारिक तरीके से खरीदते हैं और फिर आपस में एक-दूसरे को बांटते हैं। अमरबेल एक बार यदि बीजों में संक्रमित हो जाता है तो यह फैलता चला जाता है। 2013 में प्रकाशित एआईसीआरपी की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि इस तरह के बीज अमरबेल खरपतवार के प्रसार में सहायता करते हैं, क्योंकि ऐसे बीजों की आनुवांशिक और शुद्धता की पहचान करना मुश्किल होता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी रिसर्च संस्थानों ने बीजों की ऐसी वैरायटी भी िवकसित कर ली हैं, जिससे रामतिल की पैदावार भी बढ़ती है और अमरबेल से भी बचाव होता है। खमरिया रैयत ऐसा ही एक गांव है, जहां नई वैरायटी के बीज पिछले साल िवतरित किए गए थे। गांव के रामप्यारे परास्ते बताते हैं कि पिछले साल उन्हें नया बीज दिया गया था, जिसकी वजह से पैदावार में लगभग डेढ़ गुणा बढ़ोत्तरी हुई और अमरबेल भी नहीं लगी। लेकिन इस साल यह बीज अब तक नहीं बांटा गया है। एआईसीआरपी की रिपोर्ट में भी इस बात पर ध्यान दिलाया गया था कि बीजों की जितनी जरूरत है, उसके हिसाब से बीजों का उत्पादन काफी कम है। बीज एजेंसियां भी रामतिल जैसे कम उपज वाली फसलों के बीजों की ओर ध्यान नहीं दे रही हैं। इस रिपोर्ट में रामतिल का उत्पादन बढ़ाने के लिए बीज गांव िवकसित करने की सिफारिश की गई थी।

दुर्भाग्य से सरकार ने इन सिफारिशों की ओर ध्यान नहीं दिया। कृषि विज्ञान केंद्र, मंडला के प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक विशाल मेश्राम कहते हैं कि रामतिल की नई वैरायटी जेएनएस–28 और जेएनएस– 30 विकसित की गई, जिससे न केवल पैदावार बढ़ेगी, बल्कि अमरबेल की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा, लेकिन नए बीजों की मात्रा बहुत सीमित है। और अब तक कुछ ही किसानों को यह बीज उपलब्ध कराया गया है। एआईसीआरपी के कार्यक्रम समन्वयक रह चुके बीबी सिंह कहते हैं कि एआाईसीआरपी ने जितनी भी सिफारिश की थी, उस ओर सरकार ने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि यह फसल पूरी तरह से आदिवासियों की फसल है और आदिवािसयों का खानपान सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं लगता। वह कहते हैं कि रामतिल के बीज उत्पादन की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए और बीज ग्राम पर भी काम नहीं किया गया।

गैर लाभकारी संगठन फाउंडेशन ऑफ इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (एफईएस) क्षेत्र के आदिवासियों के बीच काम कर रही है। इस संस्था के मंडला जिले के निवास तहसील के परियोजना प्रबंधक आलोक विश्नोई कहते हैं कि खमरिया जैसे कुछ गांवों में कृषि विभाग की ओर से बीज उपलब्ध कराए गए, जिसका अच्छा परिणाम सामने आया है। इसलिए सरकार यदि अधिक से अधिक आदिवासियों तक नए बीज पहुंचाए तो रामतिल का उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे न केवल आदिवासियों के खानपान में सुधार होगा, वहीं आदिवासियों की आमदनी भी बढ़ सकती है। रामतिल की खेती मध्य प्रदेश, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में की जा रही है।

हालांकि रामतिल के प्रति सरकार की उदासीनता को लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (जिसे दलहन विकास निदेशालय के तौर पर भी जाना जाता है) के अपने तर्क हैं। निदेशालय की िनदेशक एम. सुजाता ने डाउन टू अर्थ द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में बताया कि रामतिल की पैदावार बढ़ाने के लिए कई कृषि-तकनीक विकसित की गई। कई उन्नत बीज विकसित किए गए हैं। भूमि एवं मिट्टी प्रबंधन, बुआई की लाइन तकनीक विकसित की गई है। लेकिन यह सब तब ही संभव है, जब इनका पालन सही तरीके से हो। पिछले चार साल से सरकार के सीड हब प्रोग्राम के तहत पुराने बीजों के बजाय नए बीज दिए जा रहे हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय अपने पुराने बीजों को बदलना ही नहीं चाहते। सुजाता कहती हैं कि रामतिल के उत्पादन और रकबे में कमी की एक वजह यह है कि अब खाद्य तेलों के कई ब्रांड आसानी से घर-घर तक उपलब्ध हैं, जो सस्ते भी हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन और अमरबेल की वजह से रामतिल की खेती कम हो रही है।

नहीं जानते एमएसपी

सरकार की उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार हर साल रामतिल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा तो कर देती है, लेकिन एमएसपी इन आदिवासी किसानों के लिए दूर की कौड़ी है। बल्कि ज्यादातर किसान जानते भी नहीं हैं कि एमएसपी क्या होता है? डाउन टू अर्थ ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के दो अलग-अलग जिलों में आदिवासी किसानों से बात की। सभी किसानों का कहना था कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि सरकार की ओर से रामतिल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। छत्तीसगढ़ के जिला कबीरधाम के ब्लॉक बाडला के गांव बनगौरा के बुजुर्ग चैनू सिंह धनरसीया कहते हैं कि उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही 40 रुपए किलो की दर से लगभग 100 किलो रामतिल बेचा है। सरकार ने इस साल रामतिल की एमएसपी 7,287 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की है, लेकिन चैनू सिंह को केवल 4,000 रुपए ही मिले हैं। वह कहते हैं कि उनके गांव में ही व्यापारी आते हैं और रामतिल सहित सारी फसलें ले जाते हैं। मध्य प्रदेश के जिला मंडला के निवास ब्लॉक के गांव खमरिया रैयत के किसान भी एमएसपी के बारे में नहीं जानते।

मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र मंडला के गांव खमरिया रैयत में किसान रामप्यारे परास्ते रामतिल का पौधा दिखाते हुएउनके पास मंडी ले जाने का विकल्प भी नहीं है। उनके गांव से मंडला मंडी लगभग 65 किलोमीटर दूर है और शेहपुरा की मंडी 56 किलोमीटर दूर है। रामप्यारे परस्ते कहते हैं कि उनके यहां ज्यादातर छोटे किसान हैं। मंडियों तक फसल ले जाना उनके लिए संभव ही नहीं है। इसलिए चाहे रामतिल हो, कोदो कुटकी हो, दाल हो, धान हो, यहां के किसान अपने लिए ही उपज उपजाते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर एक हिस्सा बेच देते हैं। इस गांव से लगभग 100 किलोमीटर दूर मवई ब्लॉक के किसान भी एमएसपी के बारे में नहीं जानते। वे भी स्थानीय व्यापारी को 40 से 60 रुपए के बीच अपनी फसल बेचते हैं। लगभग 75 वर्षीय शुद्धु सिंह मरावी नुनसरी गांव के हैं। वह कहते हैं कि उन्होंने अब रामतिल की खेती करना कम कर दिया है। उनके पिता के समय तक उनके घर में 200 क्विंटल तक रामतिल पैदा होता था और रामतिल बेचकर ही उनका पूरा परिवार पल रहा था, लेकिन अब रामतिल की खेती काफी कम हो गई है। उनके समय में अब बमुश्किल 3 से 4 क्विंटल ही रामतिल हो रहा है। इसी तरह शेखलाल ने भी रामतिल की खेती करना कम कर दिया है। वह कहते हैं कि रामतिल का दाम अच्छा मिले तो अपने लिए साल भर का तिल बचाकर बाकी बेच सकते हैं, जिससे उनका परिवार पल सकता है।

विशाल मेश्राम भी मानते हैं कि मार्केट एक्सेस न होने के कारण रामतिल के उत्पादक किसान निराश हैं और यही वजह है कि वे निर्धारित मात्रा में ही रामतिल उगाते हैं। लेकिन यदि उन्हें सही दाम दिया जाए तो वे रामतिल का उत्पादन बढ़ा सकते हैं, जिससे उनकी आर्थिक दशा सुधरेगी और भारत रामतिल का निर्यात बढ़ा सकता है। आदिवासियों के लिए काम कर रहे संगठन ‘विकल्प’ से जुड़े विवेक पवार का कहना है कि सरकार आदिवासियों की आर्थिकी की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। रामतिल जैसे वन उत्पाद आदिवासियों की आर्थिकी सुधार सकते हैं, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। आदिवासियों को अपनी यह उपज बेचने के लिए आसापास कोई मार्केट नहीं है। स्थानीय व्यापारी उनसे मनमानी कीमत पर रामतिल खरीदते हैं।

एक ओर जहां केंद्र सरकार भारत को दलहन और तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाना का सपना देख रही है, वहीं एक ऐसी फसल जिसमें भारत पूरी दुनिया में अव्वल स्थान पर है, लगातार उपेक्षित है। रामतिल के प्रमुख िनर्यातक प्रेम ग्रोवर सात-आठ साल पहले तक सालाना 9 हजार मीट्रिक टन रामतिल का निर्यात करते थे। इस साल 2021-22 में उन्होंने केवल 3,000 मीट्रिक टन रामतिल निर्यात किया है। वह कहते हैं कि वह यूएसडीए से मान्यता प्राप्त निर्यातक हैं। विदेशों में रामतिल की मांग बहुत है। वहां बर्ड फीड के लिए रामतिल का इस्तेमाल किया जाता है। वह चाहते हैं कि भारत के इस अादिवासी उत्पाद की डिमांड बनी रहे, इसलिए उन्होंने चार राज्यों में स्थानीय संग्रहण केंद्र खोले हुए हैं, जहां वह सीधे किसानों से रामतिल खरीदते हैं और उसे साफ करके निर्यात करते हैं। उनका कहना है कि शेलक एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल एक समय में रामतिल को काफी प्रमोट करती थी और निर्यातकों को भी पूरा सहयोग देती थी, लेकिन पांच साल पहले काउंसिल ने रामतिल को सहयोग देना बंद कर दिया, जिसकी वजह से निर्यात में कमी आई है।

उम्मीद बाकी

ऐसे समय में जब लोगों में जैविक और प्राकृतिक उत्पादों के प्रति आकर्षण बढ़ा है, तब क्या रामतिल के प्रति लोगों का रुझान बढ़ेगा। मेश्राम तो पूरी तरह से आशांवित हैं। वह कहते हैं कि कोविड-19 महामारी के बाद लोगों में देशज खानपान के प्रति रुझान बढ़ा है। फिर रामतिल तो 100 प्रतिशत प्राकृतिक उत्पाद है। फिर इसमें स्वाद के साथ- साथ औषधीय गुण भी हैं। वह बताते हैं कि रामतिल की मांग का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेजन जैसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर रामतिल 300 से 400 रुपए किलो बिक रहा है। परंतु जरूरत इस बात की है कि इसकी खेती कर रहे आदिवासी किसानों तक इस कीमत का हिस्सा पहुंचे।

सुजाता भी उम्मीद जताती है कि थोड़े से प्रयासों से रामतिल के प्रति किसानों का रुझान बढ़ सकता है। वह बताती हैं कि रामतिल की खेती के साथ-साथ यदि मधुमक्खी पालन को भी जोड़ा जाए तो इससे जहां रामतिल की पैदावार बढ़ेगी, वहीं आदिवासी किसानों को शहद का भी फायदा मिलेगा। रामतिल की फसल जब तैयार होती है तो उस पर पीले रंग के फूल खिलते हैं। ये पीले रंग के फूल बेहद खूबसूरत दिखते हैं। सुजाता के मुताबिक आंध्र प्रदेश के अराकू घाटी में रामतिल की फसल जब तैयार हो जाती है तो वहां नवंबर-दिसंबर में पर्यटक जुटते हैं। बकायदा कुछ लोग अपने खेतों में फोटो खिंचवाने के लिए पैसा लेते हैं। यहां तक कि सरकार भी इस दौरान अराकू घाटी में बैलून फ्लाइंग टूरिज्म को बढ़ावा देती है। वह सरकारी खरीद को औपचारिक बनाने का सुझाव देते हुए कहती हैं कि अभी कुछ बड़े व्यापारी छोटे व्यापारियों के माध्यम से रामतिल खरीदकर अमेरिका और यूरोप में पक्षियों के चार के रूप में निर्यात कर रहे हैं, लेकिन सरकार यदि औपचारिक तरीके से खरीदारी करे तो इससे आदिवासी किसानों का शोषण थम सकता है।

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