Waste

हवा में जहर घोल रहा है फर्नेस ऑयल से भी सस्ता टायर का ईंधन

स्वच्छ हवा के लिए खतरनाक और सस्ता टायर ईंधन हवा में जहर घोल रहा है। एनजीटी ने इस ईंधन के इस्तेमाल पर रोक को लेकर सीपीसीबी से रिपोर्ट तलब की है।

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Wednesday 08 May 2019

Photo : Pixbay

बचपन में स्वच्छ पर्यावरण और परिवेश में डंडे के सहारे बेकार और खराब हो चुके टायरों को गोल-गोल घुमाने का खेल खूब प्रचलित था। अब इस खेल का चलन भले ही कम है लेकिन बेकार और खराब टायरों का इस्तेमाल गैर-कानूनी तरीके से सस्ता ईंधन तैयार करने और मुनाफा कमाने के लिए खूब बढ़ चला है। सस्ते ईंधन पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन पूरी तरह नहीं किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने फर्नेस ऑयल और पेटकोक जैसे सस्ते ईंधन पर दिल्ली-एनसीआर में पूरी तरह से रोक लगा दिया था। हालांकि, इस प्रतिबंध का पालन पूरी तरह नहीं हो रहा है। इसका नतीजा यह है कि लाखों की संख्या में खराब और बेकार टायरों को गलत तरीके से जलाकर उसका सस्ता ईंधन तैयार किया जा रहा है। देशभर में प्राधिकरणों के जरिए न तो इन टायरों के निपटारे को लेकर संजीदगी है और न ही कोई मुकम्मल व्यवस्था की गई है। यहां तक कि टायर से बनने वाले सस्ते ईंधन को लेकर कोई मानक भी नहीं बनाया गया है।  

हाल ही में खराब और बेकार कचरा टायरों से हो रहे वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाया गया है। गैर सरकारी संस्था सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट एंड एनवॉयरमेंट (सेफ) ने एनजीटी से मांग की है कि न सिर्फ खत्म हो चुके टायरों का प्रबंधन होना चाहिए बल्कि नियमों और मानकों के तहत इनका निपटारा किया जाना चाहिए। सेफ ने अपनी दलील में कहा है कि वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या के कारण भविष्य में खराब और बेकार होकर कचरा बन जाने वाले टायरों की संख्या में और वृद्धि हो सकती है। 

एनजीटी ने 25 अप्रैल को याचिका पर गौर करने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से इस मसले पर तीन महीनों में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। संस्था की ओर से याची व पर्यावरणविद विक्रांत तोंगड़ ने बताया कि पाइरोलाइसिस इंडस्ट्री (टायर या प्लास्टिक से ईंधन और गैस बनाने वाले उद्योग) के जरिए व्यापक स्तर पर प्रदूषण फैलाया जा रहा है। टायरों से तैयार होने वाला ईंधन बेहद सस्ता होता है। यह ईंट-भट्ठों और अन्य उद्योगों में इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे उद्योगों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।

सेफ की याचिका के मुताबिक, ऐसे वाहन जिनकी उम्र खत्म होने को हैं उनके प्रबंधन को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 2016 में दिशा-निर्देश जारी किया था। इन दिशा-निर्देशों को अभी तक प्रभावी तौर पर लागू नहीं किया गया है। सीपीसीबी की ओर से 2016 में जारी गाइडलाइन और रिपोर्ट के हवाले से याचिका में कहा गया है कि 2015 में करीब 86 लाख वाहन इस्तेमाल लायक नहीं बचे। यह सभी वाहन कबाड़ बन गए और इनका टायर भी कचरे की भेंट चढ़ गया। अनुमान है कि देश में 2025 तक 2.19 करोड़ वाहनों की जिंदगी खत्म हो जाएगी। इसका सीधा सा अर्थ है कि इतनी बड़ी संख्या में वाहन कबाड़ बन जाएंगे। गैर सरकारी संस्था चिंतन की एक अन्य रिपोर्ट- सर्कुलेटिंग टायर्स इन द इकोनॉमी में भी कहा गया है कि भारत में सालाना नए वाहनों के पंजीकरण का दर 125 फीसदी बढ़ गया है। वहीं, 2035 तक वाहनों की संख्या में बड़ी वृद्धि का अनुमान है।

इस अनुमान के मुताबिक 2035 तक देश में 8.01 करोड़ यात्री वाहनों के साथ 23.64 करोड़ नए दोपहिया वाहन सड़कों पर जुड़ जाएंगे। ऐसे में यह डर भी लाजिमी है कि वाहनों की इतनी बड़ी संख्या से हमें टायर का कचरा भी बड़ा मिलेगा। टायरों के कचरे का बोझ वो वाहन भी बढ़ाएंगे जिन पर प्रतिबंध लगाया गया है। चिंतन संस्था के मुताबिक 2016-17 में वाहनों के लिए टायरों का अनुमानित उत्पादन 12.734 करोड़ रहा। वहीं, टायरों के उत्पादन में वित्त वर्ष 2015-16 की तुलना में 12 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।

याचिका ने चिंतन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि 60 फीसदी ऐसे टायर जिनकी जिंदगी पूरी तरह खत्म हो चुकी है, इन्हें या तो लैंडफिल साइट में फेक दिया जाता है या फिर जला दिया जाता है। इससे खतरनाक वायु प्रदूषण हो रहा है। भारत में प्रतिदिन करीब 6.5 लाख टायर बनाए जाते हैं। वहीं 2.75 लाख टायर बेकार हो जाते हैं। इन बेकार टायरों का एक बेहद छोटा हिस्सा ही वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाता है।

खतरनाक और अन्य कचरा (प्रबंधन व सीमा परिवहन) कानून, 2016 के नियम 3(23) में कचरा हो चुके पूरी तरह बेकार टायरों को अन्य कचरा श्रेणी की परिभाषा में रखा गया है। इनकें रख-रखाव, भंडारण, निस्तारण, परिवहन, दोबारा इस्तेमाल, रिसाइकल, निर्यात और आयात आदि के नियम बनाए गए हैं जिन्हें प्रभावी तरह से लागू नहीं किया जा सका है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की कार्यकारी निदेशक और वायु प्रदूषण कार्यक्रम अधिकारी अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि जिस वक्त उनके जरिए औद्योगिक क्षेत्रों में फर्नेस ऑयल और पेटकोक पर प्रतिबंध को लेकर दौरा किया जा रहा था उस वक्त टैंकर्स में खुलेआम टायर का ईंधन औद्योगिक ईकाइयों को पहुंचाया जा रहा था। दिल्ली-एनसीआर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फर्नेस ऑयल और पेटकोक ही नहीं बल्कि सभी तरह के सस्ते ईंधन के इस्तेमाल पर रोक है। 

दिल्ली और एनसीआर के यूपी, हरियाणा, राजस्थान  को आदेश दिया गया था कि वह ईंधनों की सूची जारी करें ताकि जिन सस्ते ईंधन का इस्तेमाल प्रतिबंधित है उस पर पूरी तरह रोक लग सके। दिल्ली ने यह सूची जारी की है। हरियाणा में तैयारी चल रही है लेकिन यूपी और राजस्थान में इस पर अभी तक कुछ नहीं हुआ है। टायर का तेल एक ऐसा ईंधन है जिसके लिए कोई मानक नहीं है। इसका किसी तरह से इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। रबर से बनाए जाने वाले टायर पर्यावरण के लिए काफी जहरीले हैं।

फर्नेस ऑयल की जांच में सल्फर तत्व होने की पुष्टि हुई थी। टायर के ईंधन की अभी तक जांच नहीं हुई है। हालांकि, यह बेहद खतरनाक है। इसे कचरे के तौर पर कैसे निपटाया जाना है इस पर भी सोचने की जरूरत है। पूरे देश में टायर के अवैध और गैरकानूनी निस्तारण के साथ सस्ता ईंधन बनाने का काम किया जा रहा है। स्वच्छ हवा के लिए जरूरी है कि इस पर भी तत्काल रोक लगाई जाए।

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