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तीन मिनट, एक मौत: बच्चों के लिए सबसे ज्यादा घातक है वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण रोकने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनमें बच्चों और वयस्कों को एक साथ नहीं रखा जा सकता। बच्चों के लिए अधिक इंतजाम करने होंगे, क्योंकि उन पर वायु प्रदूषण का ज्यादा असर होता है

 
Last Updated: Friday 01 November 2019
Photo: Vikas Choudhary
Photo: Vikas Choudhary Photo: Vikas Choudhary

तीन मिनट, एक मौत से आशय है कि देश में वायु प्रदूषण की वजह से भारत में औसतन तीन मिनट में एक बच्चे की मौत हो जाती है। डाउन टू अर्थ ने इसकी व्यापक पड़ताल की है। इसे एक सीरीज के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक आप पढ़ चुके हैं कि वायु प्रदूषण से बच्चों की मौत के मामले सबसे अधिक राजस्थान में हुए हैं। इसके बाद जहरीली हवा की वजह से बच्चों की सांस लेना हुआ मुश्किल में हमने बताया कि अनस जैसे कई बच्चे लगभग हर माह अस्पताल में भर्ती होना पड़ रहा है। तीसरी कड़ी में    बताया गया कि तीन दशक के आंकड़ों के मुताबिक बच्चों की मौत की दूसरी बड़ी वजह निचले फेफड़े के संक्रमण होना रहा है। चौथी कड़ी में बताया गया कि वायु प्रदूषण के कारण बच्चे अस्थमा का शिकार हो रहे हैं। पांचवी कड़ी में अपना पढ़ा कि बच्चे कैसे घर के भीतर हो रहे प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। छठी कड़ी में आपने पढ़ा, वायु प्रदूषण से फेफड़े ही नहीं, दूसरे अंगों पर भी हो रहा असर । इससे अगली कड़ी में हमने बताया कि राज्य कोई भी हो, लेकिन ठंड का मौसम होने के बाद बच्चों की दिक्कतें बढ़ जाती हैं। इसके बाद सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी के लेख में वायु प्रदूषण को टाइम बम जैसी स्थिति बताया गया। आज प्रस्तुत है कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में ग्लोबल एनवायरमेंटल हेल्थ व स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर व नई दिल्ली स्थित कोलैबोरेटिव क्लीन एअर पॉलिसी सेंटर में निदेशक किर्क आर स्मिथ का लेख-  

वायु प्रदूषण व अन्य पर्यावरणीय प्रदूषणों के खतरों के संदर्भ में बच्चों की स्थितियां बिल्कुल अलग हैं। पहली बात यह कि बच्चे आकार में छोटे होते हैं। उनका बॉडी सरफेस एरिया अधिक होता है, अतः गर्मी का खतरा उन पर अधिक होता है। दूसरा, बच्चे ज्यादा और तेजी से सांस लेते हैं। वे प्रति यूनिट वजन के हिसाब से ज्यादा हवा खींचते हैं, इसलिए वयस्कों की तुलना में उन पर वायु प्रदूषण का खतरा अधिक होता है। तीसरा, उनके बुनियादी मानसिक कार्यकलाप भी अलग होते हैं। मसलन वे वयस्कों की अपेक्षा अलग तरह से प्रदूषण खींचते हैं।

चौथी बात यह कि उनका शारीरिक विकास स्थिर नहीं होता, बल्कि उनके अंगों में लगातार नये कार्यकलाप विकसित होते रहते हैं। ऐसे में वयस्कों को लेकर किए गए शोध के आधार पर निकले मायने प्रायः बच्चों के काम के नहीं होते हैं। पांचवी बात यह कि उनके प्रतिरक्षी तंत्र व सुरक्षात्मक सिस्टम वयस्कों की तरह विकसित नहीं होते। छठा, बच्चों को लंबा जीना होता है, इसलिए बच्चों की कोशिकाओं के मामूली असर के कैंसर में तब्दील होने के लिए काफी वक्त मिल जाता है। सातवां, अन्य आयु वर्ग के विपरीत बच्चे किसी दूसरे यानी मां के स्तन के माध्यम से दूषण की चपेट में आ सकते हैं।

आठवां, वे अलग तरह से व्यवहार करते हैं, अतः ज्यादा असुरक्षित होते हैं। मसलन हाथ में लगे प्रदूषक और जमीन पर फैला प्रदूषण। नौवां व अहम कि बच्चे अपनी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह से वयस्कों पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि उनके पास खुद की सुरक्षा की क्षमता नहीं होती। सामान्य वायु प्रदूषण से बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रभाव प्रदूषक तत्वों के जलाने या प्रदूषित ईंधन के कारण पड़ता है। बच्चों पर इसके प्रभाव को चार वर्गों में विभाजित किया गया है।

किसी नवजात के जन्म के वक्त उसमें जो दिक्कतें होती हैं और उस पर जो प्रभाव पड़ते हैं, वो मुख्य तौर पर गर्भवती मां के जोखिमों पर निर्भर करता है। इसमें कम वजन, बौनापन और समय से पूर्व जन्म लेना आदि शामिल हैं। ये स्थापित हो चुका है कि बच्चों में इस तरह की बीमारियां हर प्रकार के वायु प्रदूषण के चलते होती हैं। ये शिशु मृत्यु दर और बच्चों के स्वास्थ्य को भी प्रभवित करता है। खास कर बौनापन भारत की बड़ी समस्या है और इसके आंकड़े गरीब अफ्रीकी देशों के समकक्ष हैं। बौनापन के पीछे पौष्टिक आहार की कमी अहम कारण है, जबकि पोषक आहार के मामले में भारत की स्थिति उतनी खराब नहीं है।

भारत समेत दुनियाभर में अधिकांश छोटे बच्चों की मौत की मुख्य वजह निमोनिया है। हालांकि, प्रदूषण में संक्रामक जीवाणु नहीं होते हैं लेकिन ये माना जाता है कि बच्चों में विकसित रोग प्रतिरोधक सिस्टम को बुरी तरह से दबाता है। इससे प्राकृतिक रूप से तैयार हुए जीवाणुओं को विकसित होने में मदद मिलती है। भारतीय बच्चों में दमा काफी सामान्य रोग है, जो हो सकता है कि बढ़ रहा है।

हालांकि, ये अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि सामान्य वायु प्रदूषण दमा का प्रमुख कारण है, मगर ये जरूर साफ है कि वायु प्रदूषण से दमा के अटैक आ सकते हैं, जो बहुत गंभीर होता है और जानलेवा भी हो सकता है। अतः ये जरूरी है कि आबादी को इस अटैक से बचाया जाए। हाल के शोध संकेत दे रहे हैं कि वायु प्रदूषण और खास कर ओजोन भी इसका एक कारण हो सकता है। मानसिक दक्षता यानी आईक्यू का क्षरण अधिकांशतः बचपन में लेड व कीटनाशक जैसे प्रदूषणों के असर से जुड़ा हुआ है।

बहुत सारे शोधों में पता चला है कि प्रदूषण के कारण बच्चों की मानसिक दक्षता पर असर पड़ता है। लेकिन, वायु प्रदूषण से होने वाली अन्य बीमारियों के आकलन को बोझ के चलते लेड की तरह इन शोधों के परिणामों को स्वीकार्यता नहीं मिली नहीं है। फिर भी, अब तक कुछ अच्छे शोध हुए हैं और अगले कुछ वर्षों में कुछ और शोध सामने आएंगे, जिससे नजरिया बदलेगा।

ज्यादातर शोध कथित “लाइफ कोर्स” एप्रोच के जरिए किए गए हैं। इससे पता चलता है कि जीवनकाल और वयस्क उम्र के कई रोग शुरुआती जीवन की घटनाओं मसलन जन्म के समय वजन और प्रदूषण से प्रभावित होते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है और इसके जोखिमों का हिसाब अभी तक नहीं किया जा सका है। लेकिन, शोध में जो तथ्य सामने आए हैं, वे हैरान करने वाले हैं।

हम यह सुनते हैं कि हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे हमारे बच्चों की बुनियादी मानसिक क्षमता प्रभावित हो रही है और बहुत किफायती तरीके से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है, लेकिन इसको लेकर हमारी प्रतिक्रिया आदिमकालीन है। 

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