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इलाहाबाद में महामारी का भय, कुंभ के बाद स्वच्छता से मोहभंग

कुल 60 से 70 हजार टन कूड़ा-कचरा प्लांट बंद होने के कारण सड़ रहा है। एनजीटी ने इसे खतरे की घंटी बताया है। 

 
By DTE Staff
Last Updated: Monday 29 April 2019
Photo : Meeta Ahlawat
Photo : Meeta Ahlawat Photo : Meeta Ahlawat

बनजोत कौर/विवेक मिश्रा 

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में कुंभ की चमक-दमक खत्म होते ही स्वच्छ कुंभ के लिए कामकाज में लगी मशीनरी का स्वच्छता से मोहभंग हो गया है। वहीं, इलाहाबाद में कुंभ के बाद सड़ रहे कूड़े-कचरे के कारण महामारी फैलने का भय पैदा हो गया है। पर्यावरण मामलों की अदालत राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 22 अप्रैल को अपने एक आदेश में कहा है कि कुंभ के बाद कूड़ा-कचरा समेत सीवेज के उपचार को लेकर तत्काल आपात कदम उठाए जाने की जरूरत है। अन्यथा, न सिर्फ गंगा-यमुना नदी में गंभीर प्रदूषण होगा बल्कि शहर में महामारी भी फैल सकती है।

प्रयाग नगरी में गंगा किनारे महीनों तक चले कुंभ मेले के दौरान ठोस कचरे के प्रबंधन की खराब व्यवस्था पर एनजीटी की पीठ ने नाराजगी जाहिर करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को 26 अप्रैल तक ट्रिब्यूनल में पेश होकर स्थितियों से अवगत कराने का आदेश दिया है। 

कुंभ के बाद गंगा प्रदूषण को लेकर पयार्वरणविद और अधिवक्ता एमसी मेहता ने एनजीटी से आदेशों के उल्लंघन और प्रदूषण से बचाव के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की मांग की थी।

वहीं, एनजीटी के अध्यक्ष और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कुंभ मेले के दौरान और उसके बाद की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक समिति का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता जस्टिस अरुण टंडन कर रहे थे। इस समिति ने 10 अप्रैल को अपनी अंतरिम रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी। इस रिपोर्ट ने कुंभ के बाद उसकी स्वच्छता के दावों पर कई सवाल उठाए हैं। वहीं, कड़ी कार्रवाई की सिफारिश भी की है। रिपोर्ट पर गौर करने के बाद एनजीटी ने कुंभ के बाद फैली अव्यवस्था को आपात स्थिति माना है।

समिति ने अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट में कहा है कि करीब 2000 टन कचरा बिना छंटाई के खुले में ही बस्वर प्लांट पर लाया गया। जबकि, यह प्लांट सितंबर, 2018 से बंद है। समिति ने कहा कि प्लांट पर बिना छांटे और बिना ढ़के रखा गया है। यह न सिर्फ ठोस कचरा प्रबंधन अधिनियम, 2016 के नियमों का उल्लंघन है बल्कि एनजीटी के पूर्व आदेशों की भी अव्हेलना है।

समिति ने बताया कि शौचालयों की पाइप लाइन और कैंप नदी से महज 10 मीटर की दूरी पर बनाए गए थे। नदी किनारे ही बनाए गए 36 अल्प अवधि वाले गड्ढ़ों की जांच में पाया गया कि कई गड्ढ़ों में गंदा पानी मौजूद था। जहां पर सीवेज निकासी रोक के लिए जियो ट्यूब तकनीकी का इस्तेमाल किया गया था वहां, सीधे गंगा नदी में सीवेज और अन्य गंदे पानी की निकासी हो रही थी। समिति ने कहा है कि यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सूरत में गंदा पानी नदियों में न जाने पाए। जियो ट्यूब हटाये जाने के साथ ही सभी अल्पअवधि वाले जलाशयों की सफाई भी की जानी चाहिए।

वहीं, मेले के दौरान बनाए गए कच्चे गड्ढों में ही सीवेज और गंदा पानी स्टोरेज करने के मामले पर मेला अधिकारियों ने नोटिस के बाद भी जवाब नहीं दिया। समिति ने मेलाअधिकारी से प्रत्येक दिन की देरी के हिसाब से जुर्माना वसूलने की सिफारिश की है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कुंभ मेला क्षेत्र में 1,22500 शौचालय बनाए गए थे। इन शौचालयों और कच्चे गड्ढ़ों को तैयार करने के लिए मेला प्रशासन ने गंगा के मामलों को लेकर बनाई गई समितियों में किसी से भी सलाह-मशविरा नहीं किया।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यमुना किनारे बनाए गए पक्के निर्माण पर भी सवाल उठाया है। समिति ने कहा है बिना किसी अनुमति, नक्शे और आदेश के नदी किनारे पक्का निर्माण किया गया। यह न सिर्फ अवैध है बल्कि एनजीटी के आदेशों का उल्लंघन है।

एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव के हवाले से कहा कि करीब 60 हजार टन कचरा बस्वर ठोस कचरा प्रबंधन प्लांट पर एकत्र किया गया है। इसका उपचार अभी तक नहीं हो पाया है। कुंभ के दौरान मेला क्षेत्र और शहर से करीब 600 से 700 टन कचरा इस प्लांट पर हर रोज भेजा जा रहा था। वहीं, एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक क्षेत्रीय अधिकारी के हवाले से कहा कि बस्वर प्लांट पर बिना किसी छंटाई के करीब 65 से 70 हजार टन कचरा लाया गया। इसमें कुंभ क्षेत्र का 18000 टन कूड़ा-कचरा शामिल था।

पीठ ने 2016 और 2017 के बीच अतिसार, बुखार, हेपेटाइटिस, कालरा जैसी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या में बढ़ती संख्या पर गौर करने के बाद कहा कि महामारी को नियंत्रित करने के लिए किसी की जिम्मेदारी सुनिश्चत कर तत्काल उपाय किए जाने चाहिए।

यमुना जिए अभियान के संयोजक और पर्यावरणविद मनोज मिश्रा ने समिति की रिपोर्ट पर कहा कि यह हाल ही में संपन्न हुए अर्धकुंभ के सिक्के के दूसरे पहलू की झलक भर है। कुंभ में जबरदस्त उदासीनता बरती गई। लगातार निगरानी करने और आदेशों को लागू करने का आदेश स्वागत योग्य है। उम्मीद है कि मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई की जाएगी।

कुंभ मेला क्षेत्र में अरैल की तरफ सबसे ज्यादा कैंप और शौचालय नदी किनारे निर्मित किए गए थे। वहीं, राजापुर सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) अपनी क्षमता से अधिक सीवेज हासिल कर रहा था। जियो ट्यूब के जरिए राजापुर नाले का सिर्फ 50 फीसदी सीवेज शोधित किया जा रहा था। वहीं, 50 फीसदी बिना शोधन सीधे गंगा में ही गिराया जा रहा था। वहीं, सलोरी स्थित एक अन्य एसटीपी भी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर रहा था।

पीठ ने जियोट्यूब तकनीकी की अक्षमता पर सवाल उठाए और प्रशासन को फटकार भी लगाई। पीठ ने गौर किया कि गंगा में सीवेज की निकासी रोकने के लिए मवैया नाला में जियोट्यूब तकनीकी का इस्तेमाल किया गया था हालांकि बिना शोधित सीवेज नाले से सीधे गंगा में गिर रहा था। समिति ने अरैल में परमार्थ निकेतन के पास एक गंदा जलाशय भी पाया। इसमें मानव मल भी तैरते हुए देखा गया। इसी तरह मनसुथिया नाले का भी हाल रहा। 

यह कुंभ के बाद बनने वाली स्थिति हर वर्ष का दोहराव है। सीएजी रिपोर्ट में भी इससे पहले कुंभ के बाद पयार्वरण और प्रदूषण बचाव के लिए किसी तरह की रणनीति और योजना न होने की बात लिखी गई है। बीते वर्ष भी कुंभ के दौरान 25 हजार टन से ज्यादा ठोस कचरा निकला था जिसकी वजह से इलाहाबाद के नदी-नाले जाम हो गए थे।

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