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कई बीमारियों में काम आता है जिमीकंद, ऐसे बनाएं भाजी

किसी जमाने में विदेश से आया जिमीकंद या सूरन गोवा के ग्रामीण इलाकों में लोगों को बहुत पसंद है। हर साल मॉनसून आने से कुछ दिन पहले इसके फूल से बनी सब्जी लोग बड़े चाव से खाते हैं

 
By Arti Das
Last Updated: Thursday 29 August 2019
चखकर देखिए जिमीकंद फूल
आरती दास आरती दास

पिछले 5 साल से नियमित रूप से मैं अपने साप्ताहांत माशेम नाम के एक गांव में बिताती रही हूं। गोवा में कैनकोना के दक्षिणी तालुका में स्थित इस जगह की स्थलाकृति पर्यटकों के लिए वाकई दिलचस्प है। जहां एक ओर नीली चमक में चमचमाता अरब सागर बह रहा है, तो दूसरी तरफ पश्चिमी घाट के सुंदर नजारे भी दिखाई पड़ते हैं। इससे मुझे इस जगह की समृद्ध जैवविविधता, खासकर भोजन के बारे में जानकारियां जुटाने का पर्याप्त अवसर मिला।

मई की चिलचिलाती गर्मियों में ऐसे ही एक सप्ताहांत मुझे जिमीकंद का फूल मिला। यह बहुत आकर्षक दिख रहा था, लाल धरती से एकदम ताजा निकलते, चटख गुलाबी, मोटी पंखुड़ियों वाले इस फूल ने तुरंत मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। हालांकि, गोवा के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर जिमीकंद खाया जाता है, लेकिन इससे पहले मैंने कभी इसका फूल नहीं देखा था। यह मॉनसून आने से कुछ दिन पहले ही खिलता है।

मखमली कीप के आकार का यह फूल 45-50 सेंटीमीटर तक का होता है, जो अपनी सड़े मांस जैसी दुर्गंध के कारण जाना जाता है। यह सड़े हुए मांस को खाने वाले कीटों और मक्खियों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जिनके जरिए परागण में मदद मिलती है। इसके पूरी तरह से खिलने से कुछ दिन पहले ही लोग इसे तोड़ लेते हैं, ताकि इससे विशिष्ट मौसमी सब्जी बना सकें। इस चरण पर फूल में दुर्गंध नहीं रह जाती है। गोवा के कृषि विशेषज्ञ मिगुएल ब्रैगेंजा कहते हैं कि जिमीकंद के फूल से तैयार सब्जी को सुरणाची भाजी के नाम से पुकारा जाता है, जो चबाकर खाए जाने वाले मांस जैसी दिखाई देती है। इसमें सूखे हुए कोकम (गार्सीनिया इंडिका) के सूखे छिलके डालने का चलन भी खूब है। इस फूल में क्षारीय गुण होते हैं, इसलिए गले और जीभ की जलन से बचने के लिए खट्टी चीजें मिलाई जाती हैं। गांवों के लोग इस विशेष सब्जी का लुत्फ उठाने के लिए बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं।

ब्रैगेंजा बताते हैं कि फूल के खूबसूरत बैंगनी या गुलाबी रंग के दिखने का राज इसमें मौजूद एंथोसाइनिन है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट होते हैं और बवासीर के इलाज में भी यह फायदेमंद है। लेकिन, इसकी सबसे ज्यादा मांग सुरणाची भाजी के लिए होती है, जो गोवा के दुर्लभ व्यंजनों में तेजी से लोकप्रिय हुई है। हकीकत में यह फूल और उसकी सब्जी गोवा की खाद्य विविधता का प्रतिनिधित्व करती है।

जिमीकंद या सूरन के साथ गोवा का संबंध बस उसके फूल के साथ ही समाप्त नहीं होता है। इसका कंद जमीन के अंदर ही बढ़ता रहता है और 8 से 10 किलो या फिर उससे भी काफी ज्यादा वजन का हो जाता है। इससे गोवा के एक और शाकाहारी व्यंजन खटखटे भी बनाया जाता है। स्थानीय इलाकों में सूरन या सन्न के नाम से जाना जाने वाला जिमीकंद पौष्टिक तत्वों से भरपूर माना जाता है और मांस एक बेहतर विकल्प है। लेकिन, जिमीकंद में मौजूद ऑक्सालेट तत्वों की मौजूदगी को लेकर 2018 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के मुताबिक इसमें कैल्शियम ऑक्सालेट के बारीक कण होते हैं, जो अंगुलियों में खुजली और गले व जीभ में चुभन की वजह बन जाते हैं। इसलिए, इस्तेमाल से पहले कंद को उबाल लेना चाहिए। यह कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत है और विटमिन बी6, बी1, राइबोफ्लेविन, फोलिक एसिड व नियासिन भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही नहीं, इसमें बीटा-कैरोटीन भी होता है।

जिमीकंद की पैदावार के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त है। ऐसे में भारत के कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे गर्म राज्यो में यह प्रमुख रूप से पाया जाता है। आमतौर पर जिमीकंद की दो किस्में आती हैं- पहली जंगली और दूसरी जिसकी खेती की जाती है। जंगली किस्म खाने लायक नहीं होती है और गोवा में इसे लुटी के नाम से जानते हैं। कोई भी व्यक्ति इनके तने के रंग के आधार पर इन दोनों में अंतर पहचान सकता है। खाने के लायक जिमीकंद का तना दो मीटर तक ऊंचा और हरे रंग वाला होता है, जबकि इसकी जंगली प्रजाति के तने का रंग गहरा हरा होता है। यह कंद एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में भी पाया जाता है।

सेहत के लिहाज से जिमीकंद बहुत फायदेमंद है और आयुर्वेद चिकित्सकों में इसकी भारी मांग है। यह पेट दर्द, पेचिश और तिल्ली (स्प्लीन) में वृद्धि के इलाज के काम में आता है। संभवत: इसके ऐसे ही विभिन्न लाभों की वजह से भारतीय संस्कृति से यह काफी गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि जिमीकंद में देवी लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए दीपावली के दिन इसे पकाने की परंपरा है। यहां तक कि कुछ अफ्रीकी देशों में भी कई परंपराएं जिमीकंद से जुड़ी हुई हैं। कुछ जनजातियों में सबसे बड़ा जिमीकंद आदिवासियों के सरदारों को दिया जाता है।

नवंबर से फरवरी तक जिमीकंद की खेती करना आसान है। पैदावार के बाद गाय के गोबर या मिट्टी की लिपाई कर इसे कई महीनों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके ऐसे गुणों के कारण इसे अकाल का आहार भी कहा जाता है। इसकी खेती करना काफी आसान है। कंद को कई हिस्सों में काटकर उसे मिट्टी में गाड़ दिया जाता है। हालांकि, स्वादिष्ट और पौष्टिक होने के बावजूद यह लोगों में लोकप्रिय नहीं है। समय आ गया है कि अब जिमीकंद का प्रचार किया जाए।

(लेखिका गोवा में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

सुरणाची भाजी की रेसिपी

सामग्री
  • जिमीकंद के 1 या 2 फूल (जो पूरी तरह से खिले न हों, क्योंकि उनसे दुर्गंध आती है)
  • 1 प्याज
  • 1 टमाटर
  • 4-5 कोकम के सूखे छिलके
  • एक चुटकी हल्दी पाउडर
  • नमक स्वाद के अनुसार
  • 2 चम्मच वनस्पति तेल
  • आधा कप पानी

विधि: एक पैन गर्म करें और उसमें वनस्पति तेल डालें। कटे प्याज, टमाटर डालकर अच्छी तरह से उसमें मिला लें। फिर जिमीकंद डालकर उसे नरम होने तक पकाएं। सूखे कोकम का छिलका और पानी डालें। अब पैन को ढंक दें और उबाल आने दें। जब यह तैयार हो जाए, तो गर्मागरम रोटियों और चावल के साथ परोसें।

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