Agriculture

अब आएगा बौनी कतरनी चावल, किसान हर जगह करेंगे खेती

सरकार के प्रयास से अब जीआई टैग होने के कारण इसकी खेती की पहचान करने में आसानी हो रही है।

 
By DTE Staff
Last Updated: Wednesday 24 April 2019

विकास सिन्हा

भागलपुर अंग क्षेत्र की पहचान कतरनी, आम व लीची के साथ-साथ सिल्क के रूप में की जाती है। यहां पिछले कई सालों से ये चीजें इसकी पहचान को बनाए हुए है। भागलपुर ही नहीं, बल्कि पूरे देश-विदेश में कतरनी ने नई पहचान दी है। सरकार के प्रयास से अब जीआई टैग होने के कारण इसकी खेती की पहचान करने में आसानी हो रही है। भौगोलिक पहचान मिलने से कतरनी की खेती कहां-कहां और किस क्षेत्र में की जाती है, इसकी पहचान करना आसान हो गयी है।

कतरनी की खेती भागलपुर के जगदीशपुर, बांका के रजौन व मुंगेर के कुछ क्षेत्रों में की जाती है। कतरनी के विकास के लिये केंद्र व बिहार सरकार के साथ-साथ बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अहम भूमिका निभा रहे हैं। एक आंकड़े पर गौर करें, तो वर्ष 2013 में अंग व कोसी क्षेत्र के पूर्णिया के विक्रमगंज 3130 किलोग्राम, वर्ष 2014 में सबौर में 3075 किलोग्राम व वर्ष 2015 में 1832 किलोग्राम की उपज की गयी। इसी तरह कतरनी की नयी किस्म की खेती 2898, वर्ष 2014 में 3229 और वर्ष 2015 में 1362 किलोग्राम की खेती की गई।

इस संबंध में कृषि वैज्ञानिक  मयंक कुमार बताते हैं कि कतरनी के विकास के लिये सरकार के प्रयास से जीआइ टैग मिल चुका है। कतरनी के विकास के लिये जिला कृषि केंद्र में काम किया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। किसानों को ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिले और उन्नत किस्म की खेती की जाये, इस संबंध में बताया जा रहा है। मयंक कहते हैं कि किसानों को ज्यादा से ज्यादा और कम दिनों में कतरनी का उत्पादन हो सके, इसके लिए नए अनुसंधान किए जा रहे हैं। हमारा उद्देश्य किसानों को नयी तकनीक व शोध प्रदान करना है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने कतरनी के विकास में एक नया अध्याय शुरू किया है। इससे कतरनी के उत्पादन में चार चांद लग जाएंगे। कतरनी पर नये शोध वर्ष 2010 से शुरू हुए हैं। बीएयू बौनी कतरनी के शोध कार्य पर लगा है। अब तक के सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। अभी केवल बीएयू परिसर के शोध केंद्र व जिले में कृषि विकास केंद्र में इसका उत्पादन किया जा रहा है। इसके परिणाम का आकलन इससे पता लगाया जा सकता है कि अभी जो देहाती कतरनी की पैदावार की जा रही है, वह 160 सेमी तक इस पौधे के लंबाई होती है, जबकि इसे घटा कर 120 सेमी तक लाने की योजना है। इस पर शोध कार्य जारी है। वर्ष 2020 के अंत तक बौनी कतरनी किसानों के पास होंगे। मयंक बताते हैं कि पहले कतरनी का उतपादन 160 दिनों में होता था इसे घटा कर 130 से 140 दिनों में लाया जा रहा है। यानि कतरनी एक माह पूर्व ही तैयार हो जाएगा। मयंक और उनकी टीम दावा करती है कि अगर हमारा शोध सफल रहा, तो न केवल बांका, भागलपुर व मुंगेर बल्कि राज्य के कई हिस्सों में इसका उत्पादन किया जाएगा।

चानन नदी का है विशेष योगदान

कतरनी के उत्पादन में चानन नदी का विशेष योगदान है। जहां-जहां चानन का रिवर बेल्ट है, वहीं कतरनी का उत्पादन व सुंगध रहता है और जगहों पर कतरनी के उत्पादन व अन्य स्थलों पर उस तरह का कतरनी का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। यानि स्पष्ट है कि चानन के बालू में कुछ दूसरे तत्व हैं, जो कतरनी के उत्पादन में सहायक भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ ही मयंक कहते हैं कि आसपास का वातावरण भी कतरनी के उत्पादन में सहायक भूमिका निभाते हैं। यानि गंगा की तरहचानन नदी में भी कुछ खास है, जो कतरनी के उत्पादन में अपनी भूमिका निभा रहा है। 

इस संबंध में बीएयू के प्रसार निदेशक डॉ आरके सुहाने कहते हैं कि बीएयू का यह आशचर्यचकित करने वाला शोध कार्य होगा। अब तक केवीके और बीएयू परिसर मेंसफल हुए हैं. हमने कम दिनों में कतरनी का उत्पादन किया है। दो साल में शोध कार्य पूरे हो जायेंगे, तब किसानों के बीच बौनी कतरनी का उत्पादन किया जाएगा।

बीएयू के कुलपित डॉ एके सिंह कहते हैं कि हमारा लक्ष्य किसानों को कम से कम कीमत में और कम समय में अच्छे उत्पादन का है। इस कारण अंग की धरती जोकतरनी चावल के लिये जानी जाती है, इस पर पूरी टीम जोश के साथ काम कर रही है। हम अब तक सफल हुए हैं और आने वाले दिनों में आशा है कि शीघ्र ही यह किसानों के हाथों में होगा। हम कतरनी के उत्पादन में नये अध्याय लिखने वाले हैं।

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