Environment

8 लाख वर्षों में सबसे ऊपर पहुंचा कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर

मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के चलते, पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। 

 
By Lalit Maurya
Last Updated: Wednesday 15 May 2019

संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के वायुमंडल में अब तक के कार्बन डाइऑक्साइड के उच्चतम स्तर का पता लगाया है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में जिस तरह वृद्धि हो रही है, वो निश्चय ही मानव सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है। हवाई, अमेरिका स्थित मौना लोवा ऑब्जर्वेटरी 1950 के दशक से पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर पर नजर बनाये हुए है, उसके अनुसार जहां 1959 में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा का वार्षिक औसत 315.97 था, जो कि 2018 में 92.55 अंक बढ़कर 408.52 के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है । यदि इसका औसत देखा जाये तो हर 1959 से लेकर 2018 तक हर वर्ष वायुमंडल में विद्यमान कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में 1.57 पीपीएम की दर से वृद्धि हो रही है ।ऑब्जर्वेटरी के अनुसार गत शनिवार को कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर अपने उच्चतम बिंदु 415.26 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) पर पहुंच गया है। यह पहली बार है, जब ऑब्जर्वेटरी ने कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 415 पीपीएम से अधिक पाया है। गौरतलब है कि पिछली बार पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में इतनी वृद्धि 30 लाख वर्ष पहले हुई थी । जब समुद्र का जलस्तर कई मीटर ऊंचा था और अंटार्कटिका के कई हिस्सों में जंगल पसरा हुआ था।

पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (पीआईके) के वॉल्फगैंग लंच्ट के अनुसार "यह दर्शाता है कि हम जलवायु परिवर्तन को रोकने की दिशा में सही दिशा में काम नहीं कर रहे हैं। कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन लगातार बढ़ता जा रहा है और यह वर्ष दर वर्ष अधिक हो रहा है," । "इसकी मात्रा को स्थिर करने की आवश्यकता है।" लेकिन स्थिर होना तो दूर, जीवाश्म ईंधन के बेतहाशा बढ़ते उपयोग के चलते वायुमंडल में इसकी मात्रा दिनों दिन बढ़ती जा रही है। स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशिनोग्राफी में सीओ2 कार्यक्रम के निदेशक राल्फ कीलिंग ने बताया कि यह प्रवृत्ति संभवत: 2019 में भी जारी रहेगी, क्योंकिं 2019 के अल नीनो वर्ष होने की पूरी संभावना है। जिसके चलते गर्म समुद्री धाराओं के कारण तापमान में वृद्धि होगी। वहीं कार्बन डाइऑक्साइड की औसत विकास दर के उच्च रहने की आशंका जताई जा रही है। पिछले साल से इसके 3पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) अधिक रहने की सम्भावना है, जबकि हालिया औसत 2.5 पीपीएम है।" गौरतलब है कि वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर ने 9 मई, 2013 को पहली बार 400 पीपीएम के आंकड़े को छुआ था ।

तेजी से बढ़ रहा है वैश्विक तापमान

2015 के पेरिस समझौते के अनुसार यह जरुरी है कि तापमान में होने वाली वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पूर्व के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है और संभव हो तो 1.5 डिग्री सेल्सियस के लिए प्रयास करना है। रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले चार साल मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्ष थे । देशों के पेरिस समझौते के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने और समस्या के बारे में जागरूकता के बावजूद मनुष्य उत्सर्जन के अपने ही रिकॉर्ड को साल दर साल तोड़ रहा है । जहां मानव द्वारा किये जा रहे उत्सर्जन के चलते औद्योगिक क्रांति से लेकर अब तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान पहले ही 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों में हो रही बेतहाशा वृद्धि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को और अधिक खतरनाक बना रही है। जिस तेजी से हम अपने गृह को बर्बादी की और धकेल रहे हैं, उससे मुमकिन है कि हमें जल्द ही अपने लिए नए विकल्प तलाशने पड़ेंगे।

भारत पर भी पड़ेगा इसका दुष्प्रभाव

जहां भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है, वहीं दुनिया के 20  सर्वाधिक प्रदूषित नगर भी भारत में ही हैं । दुनिया भर में कार्बन डाई ऑक्साइड का बढ़ रहा स्तर भारत के लिए भी चिंता का विषय हैं । हालांकि सीधे तौर पर कार्बन डाईऑक्साइड के बढ़ते स्तर का भारत पर क्या असर होगा, इसका कोई आकलन मौजूद नहीं है। फिर भी सेंटर फॉर साइंस द्वारा किये गया अध्ययन दर्शाता है कि 20 वीं सदी की शुरुआत के बाद से भारत के वार्षिक औसत तापमान में लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है । जिसके परिणामस्वरूप मौसम की चरम घटनाओं जैसे बाढ़, सूखा, बेमौसम बारिश और उसमें आ रही अनिमियतता और ओलावृष्टि में हो रही वृद्धि साफ़ देखी जा सकती है, जिसका परिणाम न केवल हमारे दैनिक जीवन पर पड़ रहा है, वहीं दूसरी और इसके कारण हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है । यह सचमुच हमारी लिए बड़ी चिंता का विषय है, यदि हम आज नहीं चेते तो भविष्य में हमारी आने वाली नस्लों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, और जिसके सबसे बड़े जिम्मेदार हम होंगे ।

 

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