Pollution

कितना सही है जल शक्ति मंत्री का दावा, गंगा में नहीं डाला जा रहा गंदे नाले का पानी

एनजीटी में हाल ही में पोल खुलने के बावजूद जलमंत्री ने दावा किया कि उत्तराखंड और झारखंड में गंदे नाले का पानी गिरना पूरी तरह रोक दिया गया है

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Saturday 29 June 2019
File Photo: Avikal Somvansi
File Photo: Avikal Somvansi File Photo: Avikal Somvansi

केन्‍द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्‍द्र सिंह शेखावत ने कहा है कि 2022 तक गंगा में गंदे नालों का गिरना पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। यह दिसंबर तक धार्मिक अनुष्ठानों के अनुकूल हो जाएगी। इतना ही नहीं, उन्होंने यह दावा भी किया कि उत्तराखंड और झारखंड में गंगा में गंदे नालों का गिरना पूरी तरह रोक दिया गया है। इन दावों के उलट सच्चाई यह है कि 29 मई को ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल प्रत्येक राज्य को गंगा को क्षति पहुंचाने के लिए एक महीने के भीतर 25 लाख रुपये अंतरिम जुर्माना भरने का आदेश दिया है।

इसके अलावा हाल ही में प्रयागराज में गंगा में सीवर की निकासी और कूड़े-कचरे की तस्वीर भी सामने आई थी। संगम घाट की जांच में जो तथ्य मिले थे वह राज्य और केंद्र सरकार के सफाई के दावे के बिल्कुल उलट थे। सीपीसीबी की गाइडलाइन के मुताबिक मानव मल से पानी में पहुंचने वाले फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा प्रति 100 मिलीलीटर में 2500 मिलियन होना चाहिए। यदि इससे अधिक है तो पानी नहाने लायक नहीं है। संगम घाट पर प्रति 100 मिलीलीटर में फीकल कोलीफॉर्म 12,500 मिलियन पाया गया था। इसी तरह से आंकड़ा शास्त्री घाट पर भी मिला था।

 पर्यावरणविद लगातार गंगा की निर्बाध धारा और सफाई की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार गंगा को धार्मिक अनुष्ठानों के नजरिए से देख रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के दो वर्ष पूर्व फैसले पर नमामि गंगे, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश सरकार आदेशों का पालन नहीं कर पाई हैं। 22 अप्रैल को भी एनजीटी ने सभी को फटकार लगाते हुए जवाब दाखिल करने का आदेश दिया था।

एनजीटी ने 10 दिसंबर, 2015 और 13 जुलाई, 2017 को गंगा मामले पर विस्तृत फैसला सुनाया था लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है। 29 मई, 2019 के ही एनजीटी के आदेश में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि गंगा सफाई से जुड़ा एक भी प्रोजेक्ट अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। इसके इतर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शुक्रवार को कहा कि सरकार इस लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए मिशन मोड पर काम कर रही है। वे राष्ट्रीय राजधानी में एक राष्ट्रीय सम्‍मेलन एवं प्रदर्शनी को संबोधित कर रहे थे।

जल संकट के मसले पर केन्‍द्रीय मंत्री ने कहा कि देश साफ पीने के पानी की कमी और 25 लीटर पानी नहाने में व्‍यर्थ करने के चलन की दोहरी समस्‍या से एक साथ नहीं निपट सकता। इसके लिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति और बड़ी कंपनियों को मिलकर प्रयास करने होगे। उन्‍होंने कहा कि औद्योगिक इकाइयों में पानी के इस्‍तेमाल तथा ऐसी इकाइयों से  निकलने वाले प्रदूषित जल और अन्‍य रसायनों को नदियों में छोड़े जाने के मामलों पर प्रभावी नीति तय करने के बारे में वे उद्योगों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं। उन्‍होंने उद्योग संगठन एसोचैम से यह पता लगाने के लिए कहा कि सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व के तहत बड़ी कंपनियां पानी से जुड़े मुद्दों पर कितना धन खर्च कर रही हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक राशि महज 3 प्रतिशत है।

यह बताने के बजाए कि भारत दुनिया में जल प्रदूषण के मामले में 122वें स्थान पर क्यों है? उन्होंने लोगों से ही यह पूछा है कि आखिर ऐसा क्यों है? केंद्रीय जलशक्ति मंत्री ने कहा कि भारत में दुनिया की कुल आबादी का 18 प्रतिशत तथा इतनी ही संख्‍या में पशुधन मौजूद होने के बावजूद वैश्विक अनुपात के हिसाब से पानी के मामले में हमारी हिस्‍सेदारी 4 प्रतिशत से भी कम है और उसका भी बड़ा हिस्‍सा प्रदूषित है। उन्‍होंने कहा कि हम सभी को यह आत्‍म निरीक्षण करना चाहिए कि आखिर जल प्रदूषण के मामले में भारत दुनिया में 122वें स्‍थान पर क्‍यों है?

जल शक्ति मंत्री ने 2024 तक हर घर में पाइप के जरिये पीने का साफ पानी पहुंचाने के काम को नदियों को साफ करने जैसा बेहद चुनौतीपूर्ण काम करार दिया है। साथ ही यह भी जोड़ा है कि इसे केवल सरकार की जिम्‍मेदारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि पूरे समाज को इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी रोजमर्रा की आदतों का आकलन कर जिम्मेदार तरीके से काम करना चाहिए।

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