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जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक 20 करोड़ लोगों को छोड़ना पड़ सकता है घर

जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला पलायन और विस्थापन भविष्य में और प्रबल होगा

By DTE Staff

On: Tuesday 04 August 2020
 
जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला पलायन और विस्थापन भविष्य में और प्रबल होगा
विकास चौधरी / सीएसई विकास चौधरी / सीएसई

इंटरगवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 1990 में पाया था कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव पलायन के रूप में दिखेगा। जानकार मानते हैं कि 2050 तक 20 करोड़ लोग अपना घर छोड़ने को विवश होंगे। ऐसे लोगों को जलवायु प्रवासी अथवा जलवायु शरणार्थी कहा जाता है। दिसंबर 2019 जारी वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2020 बताती है कि हर साल हिंसा और संघर्ष के तुलना में प्राकृतिक आपदाओं से लोग अधिक विस्थापित हो रहे हैं। इसके साथ ही अधिक से अधिक देश प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो रहे हैं। इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर (आईडीएमसी) 2018 से प्राकृतिक आपदाओं से विस्थापित हुए लोगों का आंकड़ा जुटा रहा है। उसने पाया है कि विस्थापित होने वाली लगातार आबादी बढ़ रही है। आईडीएमसी के अनुसार, 2018 के अंत तक 16 लाख लोग प्राकृतिक आपदाओं के चलते विस्थापित हुए। ये लोग अब भी अपने घर से बाहर शिविरों में रह रहे हैं। इस साल भारत में सर्वाधिक लोग विस्थापित हुए।

नवंबर 2017 में ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट और यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम द्वारा प्रकाशित क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट कहती है कि लोग सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारणों से अपना मूलस्थान छोड़ने को मजबूर होते हैं। ये सभी कारण एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें कहा गया है कि 2016 में 2.4 करोड़ लोग बाढ़ और चक्रवात के कारण अचानक विस्थापित हुए। हालांकि इस बात के बहुत कम प्रमाण हैं कि धीरे-धीरे पड़ने वाले सूखे और मरुस्थलीकरण के कारण कितने लोगों ने घर छोड़ा।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से होने वाले पलायन के अब प्रमाण मिल रहे हैं। जनवरी 2019 में जर्नल ग्लोबल एनवायरमेंट चेंज में प्रकाशित शोधपत्र के मुताबिक, 2011-15 के दौरान पड़े भीषण सूखे ने सशस्त्र संघर्ष के हालात पैदा कर दिए। इस कारण लोगों को दूसरी जगह शरण लेनी पड़ी। शोधपत्र कहता है कि 2010-12 के बीच पश्चिम एशियाई देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण संघर्ष की स्थितियां बनीं। इस समय ये देश सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजर रहे थे। आपदाओं के कारण होने वाले विस्थापन और पलायन ने मानव तस्करी की घटनाओं में भी वृद्धि कर दी है। भारत में इसके प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं। यूएन एनवायरमेंट प्रोग्राम का अनुमान है कि आपदाओं के दौरान मानव तस्करी 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2030 तक 49 देशों के 32.5 करोड़ लोग जलवायु आपदाओं के प्रति संवेदनशील होंगे।