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क्यों डूबा केरल?

केरल में आई बाढ़ बताती है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने और आपदा से बचने की तैयारी न होने से जलवायु परिवर्तन किस हद तक कहर बरपा सकता है

By Shreeshan Venkatesh

On: Wednesday 04 December 2019
 
अलेप्पी
अलेप्पी जिले के कुट्टानाड में 24 अगस्त को बाढ़ प्रभावित एक घर से नाव को धक्का देते लोग (रॉयटर्स) अलेप्पी जिले के कुट्टानाड में 24 अगस्त को बाढ़ प्रभावित एक घर से नाव को धक्का देते लोग (रॉयटर्स)

“हमें समझ ही नहीं आ रहा कि सड़क कहां और नदी कहां।” केरल के चेंगानूर नगर में रहने वाले राजेश एस राज्य की जमीनी हालात को कुछ इस तरह बयान करते हैं। उफान मारती पंबा नदी ने चेंगानूर को जलमग्न कर दिया है। वह बताते हैं, “हम सबको पता था कि ऐसा दिन देखने को मिलेगा।” राजेश बताते हैं कि जिस दिन राज्य सरकार ने सभी बांधों को खोलने का फैसला किया तभी इस अनहोनी की पटकथा लिख गई थी। केरल में 8 से 18 अगस्त तक बाढ़ ने सभी 14 जिलों को आगोश में ले लिया। बारिश से मलबे की तरह पहाड़ ढहने लगे, तेज धार में लोग बह गए, बांध पानी से लबालब हो गए और अधिकांश नगर व गांव विस्थापित लोगों से भर गए।

19 अगस्त को 11 दिनों में पहली बार उपग्रह से प्राप्त चित्रों में आसमान कुछ साफ दिखा। इसके बाद राज्य सरकार ने रेड अलर्ट हटा लिया। अब सबके जेहन में एक ही सवाल है कि केरल में जो हुआ क्या वह सामान्य है? भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) में जलवायु सेवा डिवीजन के प्रमुख डीएस पई कहते हैं, “यह असामान्य है लेकिन विचित्र नहीं।” आधिकारिक प्रतिक्रिया हमेशा शब्दजालों में प्रस्तुत की जाती है। केरल में लगातार 11 दिन प्रचंड बारिश हुई और करीब 25 ट्रिलियन लीटर पानी राज्य में बरसा। 38,800 वर्ग किलोमीटर में फैले इस राज्य में पर्वत श्रृंखलाएं हैं। आबादी के घनत्व में इसका देश में तीसरा स्थान है। यहां 44 नदियां और 61 बांध हैं जो बारिश के वक्त कहर बरपा रहे थे।

बर्बादी के निशान

खबर के लिखने तक 445 लोगों की मौत हो चुकी थी। राज्य सरकार ने नुकसान का प्रारंभिक आकलन 20,000 करोड़ रुपए लगाया है जो साल 2018-19 में राज्य की जीडीपी आकलन का करीब 15 प्रतिशत है। आपदा प्रबंधन एजेंसी केयर रेटिंग्स के अनुसार, बाढ़ ने 40 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित किया है। इनमें मजदूरों की अच्छी खासी संख्या है। अगस्त में ही लोग 4,000 करोड़ रुपए की मजदूरी खो देंगे। करीब 10 लाख लोग राहत शिविरों में हैं, इनमें एक महीने में करीब 300 करोड़ रुपए खर्च होंगे। 12,000 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं जो तत्काल राहत पहुंचाने और पुनर्निर्माण में बाधक हैं। कुल मिलाकर राज्य की विकास दर एक प्रतिशत नीचे पहुंच जाएगी।

केरल साल में औसतन 3,000 एमएम बारिश प्राप्त करता है। इसमें से 2,000 एमएम बारिश मॉनसून से होती है लेकिन इस साल यह सीमा पार हो गई है और अब भी एक तिहाई मॉनसून का मौसम शेष है। 19 अगस्त तक राज्य करीब 2,350 एमएम बारिश प्राप्त कर चुका है। आईएमडी के अनुसार, केरल ने जून की शुरुआत से सामान्य मॉनसून 1649.5 एमएम के मुकाबले 2346.6 एमएम बारिश प्राप्त की है। यह 42 प्रतिशत अधिक बारिश है।

आमतौर पर केरल में जून और जुलाई में दक्षिण पश्चिम मॉनसून की मजबूती के साथ ही मॉनसून की तेज बारिश होती है। इसके बाद के महीनों में मॉनसून की तीव्रता कम हो जाती है। इस साल शुरुआत के दो महीनों में सामान्य बारिश से कुछ अधिक बारिश हुई लेकिन अगस्त में यह बरकरार नहीं रह पाई। महीने के शुरुआती तीन सप्ताह में राज्य में करीब 500 एमएम बारिश हुई जो सामान्य बारिश अर्थात 290 एमएम से बहुत अधिक है। महीने की शुरुआत से 760 एमएम की करीब आधी बारिश राज्य को हासिल हुई है। इसकी 75 प्रतिशत बारिश 9 से 17 अगस्त के बीच हुई। यह इस अवधि में होने वाली सामान्य बारिश का करीब 300 प्रतिशत है।

भारतीय मॉनसून का वितरण कम दबाव की पट्टी जिसे ट्रफ भी कहा जाता है, की स्थिति से निर्देशित होता है। ट्रफ सूर्य की गर्मी से तय होता है। इसका आवागमन हिमालय के निचले हिस्से और मध्य भारत के बीच होता है। सामान्य स्थिति में ट्रफ उत्तर पश्चिम भारत से ओडिशा और पश्चिम बंगाल के पास पूर्वी तट की ओर बढ़ता है। इस स्थिति में मध्य भारत और पश्चिमी तट पर अच्छी बारिश होती है। जब ट्रफ उत्तर की ओर बढ़ता है तो इसे मॉनसून का “ब्रेक फेज” कहा जाता है और इस दौरान हिमालयी राज्यों को छोड़कर अधिकांश उपमहादीप में कम या नगण्य बारिश होती है। मॉनसून का सक्रिय चरण तब होता है जब ट्रफ सामान्य स्थिति में दक्षिण की ओर जाता है।

पहली तस्वीर में दिख रही हरे रंग की पट्टी दूसरी तस्वीर में नीले रंग में परिवर्तित हो गई जो बाढ़ की विभीषिका बताती है (सौजन्य: नासा)

इससे दक्षिण में तेज बारिश होती है। 8 से 16 अगस्त के बीच केरल ने व्यापक बारिश के दो चरण देखे। 10 अगस्त से पहले भारी बारिश का पहला चरण इसी तंत्र की वजह से था और मॉनसून पर नजर रखने वालों के लिए यह प्रत्याशित था। लेकिन 14 अगस्त के बाद दूसरे चरण में हुई बारिश अचरज का विषय थी। दरअसल पश्चिमी सीमा पर ट्रफ स्थिर नहीं था। इस वजह से अरब सागर में भी पश्चिमी तट के पास एक ऑफशोर ट्रफ (समुद्र के पास बना दम दबाव का क्षेत्र) बन गया जो पश्चिमी तट पर अधिकांश मॉनसूनी बारिश के लिए जिम्मेदार है। मॉनसून के ट्रफ की अस्थिरता का नतीजा था कि यह उत्तर की तरफ नहीं बढ़ पाया। 13 अगस्त के बाद दूसरे चरण की यह असामान्य बारिश राज्य के उस क्षेत्र में बहुत तेज थी जहां जलाशयों की संख्या सर्वाधिक है।

8 से 15 अगस्त के बीच राज्य के सभी 14 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। सर्वाधिक प्रभावित जिलों में इडुकी (679 एमएम), वायनाड (536.8 एमएम), मणाप्पुरम (44.7 एमएम), कोझिकोड (375.4 एमएम) और पलक्कड़ (350 एमएम) शामिल थे। इन सभी जिलों में सामान्य से कई गुणा अधिक बारिश हुई। कोझिकोड और पलक्कड़ में हालात तब और बुरे हो गए जब 18 अगस्त तक भारी बारिश होती रही। पई का कहना है, “इस साल मॉनसूनी बारिश और ट्रफ के बीच संबंध उतना मजबूत नहीं रहा जितना अधिकांश वर्षों में होता है।” स्वतंत्र भविष्यवक्ता अक्षय देवरा कहते हैं, “पश्चिमी तट पर ऑफशोर ट्रफ कमजोर होने के कारण केरल में लगातार और भारी बारिश हुई। केरल में हुई हालिया बारिश बताती है कि ऑफशोर ट्रफ गतिहीन था। हवाएं उत्तर में गोवा और महाराष्ट्र की ओर नहीं बढ़ पाईं। मजबूत मॉनसूनी हवाएं केवल एक क्षेत्र के ऊपर थी, इसीलिए केरल में बारिश इतनी हुई।”

ऑफशोर ट्रफ बारिश के लिए जिम्मेदार है लेकिन यह बारिश के वितरण को निर्धारित करने वाला एकमात्र कारक नहीं है। मॉनसूनी हवाओं की गति बंगाल की खाड़ी के ऊपर बनते कम दबाव के तंत्र और उसके मुख्य भूभाग की ओर प्रस्थान पर निर्भर करती है। आमतौर पर कम दबाव का तंत्र पश्चिमी बंगाल के तट के पास उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर विकसित होता है और पश्चिम उत्तर पश्चिम की ओर बढ़ता है। केरल में अगस्त के मध्य में बारिश के वक्त भारी बारिश से संबंधित कम दबाव का तंत्र ओडिशा के तट के पास विकसित हुआ। तत्पश्चात यह महाराष्ट्र की तरफ पश्चिम-दक्षिण पश्चिम की ओर बढ़ा। यह सामान्य मार्ग नहीं था जिसके कारण मध्य भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में बारिश होती है।

पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी में मॉनसून रिसर्चर रॉक्सी मैथ्यू कोल के अनुसार, “आमतौर पर ऐसे दबाव के चलते बंगाल की खाड़ी के उत्तर में बाढ़ आती है। लेकिन इस बार यह बंगाल की खाड़ी के दक्षिणी हिस्से में आई। शुरुआती विश्लेषण बताते हैं कि पश्चिमी हवाएं केरल में सक्रिय हुईं। सामान्य स्थिति में उत्तरी बंगाल की खाड़ी में दबाव के चलते पश्चिमी हवाएं पश्चिमी घाट के उत्तर की ओर प्रस्थान करनी चाहिए।”

इस बार कम दबाव के तंत्र के कारण मॉनसूनी बारिश का वितरण औसत से कम रहा। दबाव की कम संख्या के चलते उपमहाद्वीप में बारिश का वितरण बाधित हुआ और मॉनसून की पूर्व संख्या तक मुख्य रूप से यह पश्चिमी तट पर सक्रिय रहा। अब तक देश के बाकी हिस्सों में उम्मीदों के अनुरूप बारिश नहीं हुई है जबकि केवल एक चौथाई मॉनसून ही शेष है। नौ राज्यों में बाढ़ के बावजूद भारत के 41 प्रतिशत जिलों में कम बारिश हुई है।

आपदा प्रबंधन में खामियां

मौसम की इस असामान्य परिघटना को जानलेवा बनाने में राज्य की दोषपूर्ण लघु और दीर्घकालीन प्रतिक्रिया रही। चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने वाली एकमात्र एजेंसी केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के पास केरल में बाढ़ पूर्वानुमान तंत्र नहीं है। इससे स्थानीय लोग बाढ़ से बचाव करने की तैयारी में असमर्थ रहते हैं।

केरल का भूगोल और भौगोलिक स्थिति पारिस्थितिक रूप से संवदेनशील है। पूरे राज्य के पानी की निकासी पश्चिमी घाट से अरब सागर की ओर होती है। राज्य में पहाड़ों को समुद्र से जोड़ने वाली नदियों का अच्छा खासा घना नेटवर्क है। मॉनसून के हालिया आंकड़े बताते हैं कि तटीय क्षेत्र खासकर उत्तर केरल में पश्चिमी घाट के मुकाबले अधिक बारिश हो रही है। पहले पानी बह जाने की वजह से केरल की नदियों बाढ़ से बची हुई थीं। इस साल केरल के घाट पर कम दबाव का क्षेत्र बेहद नम था और इसी वजह से राज्य डूब गया। एक से 15 अगस्त के बीच पश्चिमी घाट पर स्थित सर्वाधिक 17 जलाशयों वाले इडुकी जिले में 800 एमएम बारिश हुई। इसी तरह पलक्कड़ (सर्वाधिक जलाशयों के मामले में दूसरे नंबर पर) में 1 अगस्त से 18 अगस्त के बीच करीब 700 एमएम बारिश दर्ज की गई। इन दोनों स्थानों पर सामान्य से 200 प्रतिशत अधिक बारिश हुई और कम से कम 29 बांधों के फाटक खोलने पड़े। इससे बाढ़ और निचले इलाकों में भूस्खलन की विभीषिका बढ़ गई।

पुणे विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के पूर्व प्रमुख और जलविज्ञान के विशेषज्ञ विश्वास काले के अनुसार, “आधारभूत संरचना ने बाढ़ का दंश बढ़ाया।” उन्होंने बताया, “वर्तमान स्थिति की तुलना 1924 की बाढ़ से नहीं की जा सकती क्योंकि तब आधारभूत संरचनाओं की स्थिति आज जैसी नहीं थी।” समय के साथ यह स्पष्ट हो चुका है कि भारी बारिश से जूझ रहे राज्य में बांधों के फाटक खोलने से पहले से नियंत्रण से बाहर हालात और बिगड़ गए। जुलाई के अंत तक 39 बांध 85-100 प्रतिशत क्षमता पर भर चुके थे। अगस्त में बाढ़ की उम्मीद नहीं थी इसलिए बांधों को उच्चतम स्तर पर भर लिया गया। राज्य जब पहले से पानी में डूबा हुआ था, तभी 35 बांधों का पानी छोड़ा गया। अंतिम क्षणों में फाटक खोल दिए गए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान नई दिल्ली से जुड़े अशोक केसरी कहते हैं, “अगर बारिश रुकने के दो सप्ताह के अंदर धीरे-धीरे पानी छोड़ा जाता तो 20-40 प्रतिशत नुकसान कम होता। राज्य के पास अग्रिम चेतावनी तंत्र नहीं है। बांध का पानी खतरे के निशान से ऊपर (जिस स्तर पर बांध की संरचना को नुकसान हो सकता है) जाने के बाद छोड़ दिया गया।”

बांध सुरक्षा पर बनी राष्ट्रीय समिति द्वारा तैयार आपदा प्रबंधन योजना के अनुसार, राज्यों को हर बड़े बांध के लिए आपातकालीन कार्य योजना तैयार करनी है। चौंकाने वाली बात यह है कि सीडब्ल्यूसी ने आपातकालीन कार्य योजना के लिए विकास एवं क्रियान्वयन दिशानिर्देश मई 2006 में तैयार किए और राज्य सरकारों के पास कार्रवाई के लिए भेजा। भारत के महालेखा एवं नियंत्रक परीक्षक (सीएजी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केरल के 61 बांधों में से किसी में भी आपातकालीन कार्य योजना व ऑपरेशन एवं मेंटिनेंस मैनुअल नहीं है।

राज्य के जलमग्न होने से पहले पर्यावरण को पहुंचाई गई क्षति ने विनाश को बढ़ाया। राज्य के आपदा प्रबंधन कंट्रोल रूम के दस्तावेजों के अनुसार, एक स्वरूप स्पष्ट तौर पर उभरा कि जानमाल का ज्यादा नुकसान ऐसे क्षेत्रों में ही हुआ। ये ऐसे क्षेत्र हैं जो पर्यावरण के लिहाज से संवदेनशील हैं और यहां बारिश में हमेशा भूस्खलन का खतरा रहता है। केरल में दो सप्ताह के भीतर कीचड़ और भूस्खलन 211 जगहों पर हुआ। खनन और पेड़ों की कटाई ने इसमें बड़ा योगदान दिया। इडुकी और वायनाड जंगलों के मामले में राज्य में सबसे समृद्ध माने जाते हैं। दोनों जिलों में 2011 से 2017 के बीच वन क्षेत्र काफी कम हुए हैं। इडुकी जिले में वन क्षेत्र 3,930 वर्ग किलोमीटर से घटकर 3,139 वर्ग किलोमीटर हो गया है यानी 20.13 प्रतिशत वन क्षेत्र कम हुए हैं। वहीं वायनाड में वन क्षेत्र 1,775 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1,580 वर्ग किलोमीटर हो गया है यानी 11 प्रतिशत की गिरावट। दोनों जिलों में बाढ़ और भूस्खलन से हुई भारी तबाही के पीछे यह वजह भी हो सकती है।

अभी राज्य सरकार बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन कर रही है। लेकिन मौसम विज्ञान इस “न्यू नॉर्मल” के पीछे जलवायु परिवर्तन का हाथ मान रहा है। दुनिया को इस साल भी अतिशय मौसम की घटनाओं से राहत नहीं मिली है। ऐसे तमाम अध्यायों में केरल की घटना भी एक जोड़ भर है।