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दुनिया भर में 1961 से कृषि उपज में हुई 21 फीसदी की कमी, जलवायु परिवर्तन है जिम्मेवार

अध्ययन में पहली बार दुनिया भर में कृषि उपज पर जलवायु परिवर्तन के मानवजनित प्रभावों का आकलन किया गया है।

By Dayanidhi

On: Friday 02 April 2021
 
21 percent reduction in agricultural yield worldwide since 1960, climate change is responsible

कृषि पर किए जा रहे शोधों,अनुसंधानों ने उपज में वृद्धि की है, लेकिन इस विकास पर मानवजनित जलवायु परिवर्तन के ऐतिहासिक प्रभाव का आकलन नहीं किया गया है। अब इस नए अध्ययन में पहली बार दुनिया भर में कृषि उपज पर जलवायु परिवर्तन के मानवजनित प्रभावों का आकलन किया गया है।

अध्ययनकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में कृषि उपज को देखते हुए इस पर मौसम के प्रभावों का एक मॉडल विकसित किया है। प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए मॉडल को जलवायु परिदृश्यों के साथ जोड़ा गया है।

परिणाम बताते हैं कि दुनिया भर में 1961 से कृषि उपज में 21 फीसदी की कमी आई हैं, शोधकर्ताओं ने कहा यह पिछले 7 वर्षों में हुई अधिक उपज के पूरी तरह नष्ट होने के बराबर है।

कृषि उपज पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव का यह अध्ययन, मैरीलैंड विश्वविद्यालय (यूएमडी) ने कॉर्नेल विश्वविद्यालय और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से किया है। नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि दुनिया भर में खेती, बदलती जलवायु के असर से अधिक से अधिक असुरक्षित होती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी मार अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन जैसे गर्म क्षेत्रों में पड़ी है।

यूएमडी में कृषि और संसाधन अर्थशास्त्र (एआरईसी) में प्रोफेसर रॉबर्ट चेंबर्स ने कहा कि हमारे अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु और मौसम संबंधी कारकों का पहले से ही कृषि उपज पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। यह भी अनुमान लगाया गया कि यदि खेती पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नहीं पड़ता या जलवायु परिवर्तन होता ही नहीं तो उपज के पैटर्न किस तरह के दिखते।

कुल कारक उपज/उत्पादकता एक गणना है जिसका उपयोग उद्योग के विकास को मापने के लिए किया जाता है, इस मामले में इसे कृषि पर अजमाया जा रहा है। हालांकि, कृषि एक अनूठा उद्योग है क्योंकि उपज को निर्धारित करने वाली सभी चीजें किसान के सीधे नियंत्रण में नहीं हैं, उदाहरण के लिए मौसम को ही ले लें। अध्ययनकर्ताओं ने मौसम के आंकड़ों को शामिल करके कृषि में नई उपज की गणना करने वाला जलवायु मॉडल बनाया हैं, जिससे कृषि उपज पर बदलते मौसम के असर संबंधी गणना को सटीकता से किया जा सकता है।

चैंबर्स बताते हैं जब एक किसान आर्थिक निर्णय लेता है, जैसे कि जून में किस चीज की बुवाई करनी है, तो हमें 6 महीने बाद उस निर्णय के परिणाम का पता चलेगा। मौसम जैसी अनियमित घटनाएं उपज को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। उपज में इस बारे में अधिक ध्यान दिया जाता है कि आपने जो मेहनत, लागत लगाई थी उससे अधिक आपको हासिल हुआ या नहीं। अधिकांश उद्योगों में नए निवेश करके ही विकास किया जा सकता है।

कृषि उपज को मापने में ऐतिहासिक रूप से मौसम के आंकड़ों को शामिल नहीं किया गया है, लेकिन हम निवेश के रुझानों को देखना चाहते हैं जो किसान के नियंत्रण से बाहर हैं।

इस मामले में मौसम के आंकड़े, मॉडल का एक अभिन्न हिस्सा था, जो जलवायु परिवर्तन की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में उपज/उत्पादकता को देखता है। अध्ययन में पाया गया है कि दुनिया भर में 1961 से कृषि उपज में लगभग 21 फीसदी की कमी आई है, जबकि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन जैसे क्षेत्र जो कि गर्म जलवायु क्षेत्रों में हैं, पहले से ही उपज में 26-34 फीसदी की कमी का अनुभव कर चुके हैं।

अध्ययनकर्ता ऑर्टिज़-बोबेया कहते है कि कुछ लोग जलवायु परिवर्तन को एक दूर की समस्या के रूप में देखते हैं, कुछ जिन्हें मुख्य रूप से भविष्य की पीढ़ियों की चिंता है। लेकिन यह इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि लोगों ने जलवायु को पहले ही बदल दिया है। कुल मिलाकर, हमारे अध्ययन से पता चलता है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन पहले से ही गरीब देशों पर एक प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है जो मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है।

चेम्बर्स कहते हैं  यह अध्ययन हमें रुझानों पर विचार करने की सालाह देता है, भविष्य में जलवायु में किस तरह के नए बदलाव होंगे हम इनसे कैसे निपटेंगे इस बारे में सोचना होगा। हमें 2050 तक लगभग 1000 करोड़ लोगों को खिलाने के लिए भोजन चाहिए, इसलिए यह सुनिश्चित करना कि हमारी उत्पादकता न केवल स्थिर रहे, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा तेज होनी चाहिए।