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जलवायु परिवर्तन के कारण एशियाई पारिस्थितिकी तंत्र में हुआ भारी बदलाव

अध्ययन में जलवायु और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड में तेजी से बदलाव के कारण 3.4 करोड़ साल पहले हुई तबाही का पता चला

By Dayanidhi

On: Tuesday 20 October 2020
 
Steppe-desert biome in Central Asia

3.4 करोड़ साल पहले अचानक जलवायु परिवर्तन के कारण मध्य एशिया में पारिस्थितिक को बहुत बड़ा नुकसान हुआ। रेगिस्तान तराई में फैल गए, और जैव विविधता स्थायी रूप से प्रभावित हुई। यह अध्ययन एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय, स्टॉकहोम विश्वविद्यालय और सीएनआरएस (फ्रांस) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया है।

इस अध्ययन में एशिया से वनस्पतियों और जलवायु के आंकड़ों के साथ-साथ जीवाश्म पराग (पौधों की प्रजनन सामग्री) को जोड़ा गया है। इससे जलवायु और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड में तेजी से बदलाव के कारण 3.4 करोड़ साल पहले एक पारिस्थितिक तबाही का पता चला। मंगोलिया, तिब्बत और उत्तर-पश्चिमी चीन के बड़े क्षेत्र बहुत कम वनस्पति के चलते रेगिस्तान बन गए। बड़े जानवरों की जगह छोटे जैसे चूहा गिलहरी आदि कतरने वाले स्तनधारी आ गए। अब रेगिस्तान एक बार फिर पूरे क्षेत्र में तेजी से विस्तार कर रहे हैं, आशंका है कि ये नए पारिस्थितिक तबाही का संकेत दे रहे हैं। यह अध्ययन साइंस एडवांस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

अनूठी जैव विविधता

डॉ. नताशा बारबोलिनी ने कहा परिणाम भविष्य की जैव विविधता, कृषि, और मानव भलाई के लिए हैं। डॉ. नताशा एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय में पैलेओकोलॉजी में प्रमुख शोधकर्ता हैं। अतीत के साक्ष्य हमें दिखाते हैं कि यदि भूमि का रेतीला होना (मरुस्थलीकरण) जारी रहा तो मध्य एशियाई क्षेत्र अपनी अनूठी जैविक विविधता को फिर कभी वापस नहीं पा सकेगा।

अध्ययन इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के मॉडल अनुमानों का अनुसरण करता है। हाल के जलवायु रिकॉर्ड  दिखाते हैं कि एशिया तेजी से ग्रह पर सबसे गर्म और शुष्क स्थानों में से एक बन रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसे कि 3.4 करोड़ साल पहले देखा गया था, एक बार फिर से जैव विविधता के नुकसान का कारण बन सकता है।

प्राचीन जलवायु परिवर्तन और पर्वत निर्माण

एम्स्टर्डम इंस्टीट्यूट ऑफ बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम डायनेमिक्स के सह-प्रमुख और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कैरिना होओर्न ने कहा कि 4.3 करोड़ वर्षों के विकास ने हमें इन पारिस्थितिक तंत्रों को पूरी तरह से नए तरीके से समझने का अवसर दिया है। भले ही कुछ पौधे जो विपरीत परिस्थितियों का सामना कर सकते थे, आज भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं, वे पहले की अपेक्षा कम दिखाई देते हैं। इससे पता चलता है कि आबादी को तेजी से जलवायु परिवर्तन द्वारा स्थायी रूप से बदला जा सकता है।

अध्ययन में पाया गया कि आधुनिक एशियाई जैव विविधता को इन प्राचीन जलवायु परिवर्तनों द्वारा आकार दिया गया है, लेकिन पहाड़ों के निर्माण और तिब्बती पठार का गठन भी इसमें शामिल है।

आज मध्य एशिया कुछ सबसे पुराने रेगिस्तानों का घर है, साथ ही साथ यहां हिमालय के बाहर सबसे ऊंचे पहाड़ हैं। इस भूवैज्ञानिक और जलवायु विविधता ने प्रजातियों की एक आश्चर्यजनक संख्या उत्पन्न की है जो इस क्षेत्र को घर कहते हैं। लेकिन अब लगभग आधे अरब लोगों के साथ-साथ वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन से ये प्रजातियां खतरे में हैं, जिनका जीवित रहना मुश्किल हो रहा है। सूखे से फसलें तबाह हो रही हैं, और रेत के बढ़ते समुद्र देशी पशुओं को चराने के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कर रही हैं।

मरुस्थल में खो गई जड़ी-बूटियां

एम्बर वुटरसन ने बताया कि जड़ी-बूटी तब ही सामने आए थे, जब लगभग 1.5 कोरोड़ साल पहले जलवायु अस्थायी रूप से गीली थी। इससे पहले यह बहुत सूखी थी। वुटरसन, एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय कै इंस्टीट्यूट ऑफ बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम डायनेमिक्स के सह-प्रमुख शोधकर्ता हैं। उन्होंने आगे कहा हमारे परिणाम बताते हैं कि एक बार जब भूमि के रेतीला होने (मरुस्थलीकरण) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो यह तेजी से फैल सकती है और लाखों वर्षों तक रह सकती है। वनस्पति कटाव को रोकती है और पानी और पोषक तत्वों को केंद्रित करती है। मरुस्थलीकरण का कारण वनस्पति का नुकसान होना है।