कॉप-26: उत्सर्जन में गिरावट न आई तो 2040 तक सूखे की चपेट में होगी दुनिया की एक तिहाई कृषि भूमि

आज जिस तेजी से वैश्विक उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है यदि ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में दुनिया की प्रमुख फसलों की पैदावार इससे बड़े पैमाने पर प्रभावित हो सकती है

By Madhumita Paul, Lalit Maurya

On: Monday 01 November 2021
 

हाल ही में चैथम हाउस द्वारा जारी रिपोर्ट 'क्लाइमेट चेंज रिस्क एसेस्समेंट 2021' से पता चला है कि यदि वैश्विक उत्सर्जन में हो रही वृद्धि इसी तरह जारी रहती है तो 2040 तक दुनिया की करीब एक तिहाई कृषि भूमि सूखे की चपेट में होगी। यही नहीं रिपोर्ट के भविष्य में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है क्योंकि जिस तरह से वैश्विक आबादी में वृद्धि हो रही है उसके चलते 2050 तक भोजन की कमी को पूरा करने के लिए 50 फीसदी अधिक पैदावार करने की आवश्यकता होगी।

गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े जटिल खतरों को उजागर करने वाली यह रिपोर्ट ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप-26) के   कुछ दिन पहले ही जारी की गई है।  

इस बारे में शोधकर्ताओं ने जानकारी दी है कि यदि दुनिया के सबसे बड़े उत्सर्जक देश अपने उत्सर्जन को कम करने में विफल रहते हैं तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। अनुमान है कि 2040 तक स्थिति इतनी गंभीर हो जाएगी कि तब देश चाहकर भी जलवायु परिवर्तन के असर से बचने के लिए कुछ नहीं कर पाएंगे। 

उन्होंने दुनिया की तीन सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसलों में से मक्का का उदाहरण देते हुए जानकारी दी है कि अमेरिका, चीन, ब्राजील और अर्जेंटीना दुनिया का करीब 87 फीसदी मक्का पैदा करते हैं। उनका अनुमान है कि 2040 तक यह देश इसके उत्पादन में आने वाली भारी गिरावट का सामना कर सकते हैं।

वर्तमान में देखें तो इन देशों में इसकी पैदावार में आने वाली गिरावट की सम्भावना (10 फीसदी या उससे ज्यादा) बिलकुल न के बराबर है। लेकिन 2040 तक यह हर साल लगभग 6.1 फीसदी की दर से बढ़ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार 2040 तक एक साथ कई क्षेत्रों में फसलों के विफल होने की सम्भावना करीब 50 फीसदी तक बढ़ जाएगी। 

अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर 2040 तक गंभीर सूखे से प्रभावित कृषि भूमि के सालाना 32 फीसदी तक बढ़ने की सम्भावना है, जोकि ऐतिहासिक औसत से तीन गुना अधिक है।

यह भी अनुमान है कि दुनिया भर में कई प्रमुख कृषि उत्पादक क्षेत्र 2050 तक कृषि अवधि में कम से कम 10 दिनों की कमी का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे। यह कमी सर्दियों में उगाए जाने वाले गेहूं के लिए 60 फीसदी, बसंत में पैदा किए जाने वाले गेहूं के लिए 40 फीसदी और चावल के लिए 30 फीसदी तक बढ़ सकती है। 

हर साल गंभीर सूखे की चपेट में होंगे 70 करोड़ लोग

यही नहीं रिपोर्ट के अनुसार 2040 तक हर साल 70 करोड़ लोग गंभीर सूखे का सामना करने को मजबूर होंगे। वहीं सूखा की यह स्थिति साल के छह महीनों तक बनी रहेगी। 

यही नहीं रिपोर्ट के मुताबिक भविष्य में उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया, पश्चिमी और मध्य यूरोप और मध्य अमेरिका की 10 फीसदी से ज्यादा आबादी लम्बी अवधि तक चलने वाले गंभीर सूखे से प्रभावित रहेगी। वहीं पूर्वी और दक्षिण एशिया इससे विशेष रूप से बुरी तरह प्रभावित रहेंगें।

अनुमान है कि 2040 तक वहां रहने वाले करीब 23 करोड़ लोग इस गंभीर सूखे का सामना करने को मजबूर होंगें। एशिया के बाद अफ्रीका में सबसे ज्यादा लोग इस गंभीर सूखे का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे, 2050 तक जिनकी संख्या करीब 18 करोड़ होगी।     

ऐसे में रिपोर्ट में दुनिया के सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देशों से यह आग्रह किया गया है कि वो कॉप-26 सम्मलेन में राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के महत्वाकांक्षी संशोधनों के माध्यम से उत्सर्जन में कमी लाने का प्रयास करें। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे करने से निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों में बड़े पैमाने पर तेजी से निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। इससे साफ और सस्ती ऊर्जा मिलेगी साथ ही जलवायु के दुष्प्रभावों को भी टाला जा सकेगा।