अंटार्कटिका में बदलती जलवायु के चलते सूक्ष्मजीवों पर पड़ा गहरा असर

शोधकर्ताओं ने 1.4 से 1.5 करोड़ वर्ष पुरानी अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों का विश्लेषण कर पता लगाया है कि जलवायु का सूक्ष्मजीवों पर गहरा असर पड़ता है।

By Dayanidhi

On: Wednesday 27 October 2021
 
अंटार्कटिका में बदलती जलवायु के चलते सूक्ष्मजीवों पर गहरा असर पड़ रहा है
फोटो : साइंस एडवांसेज फोटो : साइंस एडवांसेज

सूक्ष्मजीव पारिस्थितिक तंत्र के स्वस्थ कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनकी जैव विविधता पर बदलती जलवायु और पर्यावरण के प्रभाव को बेहतर ढंग से समझना महत्वपूर्ण है।

लंबे समय तक वैज्ञानिक यह मानते रहे कि सूक्ष्मजीवों के काफी लंबे इलाके में फैले होने के कारण, पौधों और जानवरों की तुलना में ये जलवायु परिवर्तन से बहुत कम प्रभावित होते हैं। अक्सर बहुत सीमित इलाकों में मौजूद सूक्ष्मजीवों पर इसका असर पड़ता हैं। अब शोधकर्ताओं की एक टीम ने अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों की जांच करके इस धारणा को गलत साबित किया है। यह शोध गेन्ट विश्वविद्यालय और मीज बॉटैनिकल गार्डन के शोधकर्ताओं की अगुवाई में एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया है। 

लगभग 2 करोड़ वर्ष पूर्व शुरुआती मिओसीन युग के दौरान, अंटार्कटिका महाद्वीप में समशीतोष्ण से उपध्रुवीय जलवायु थी। महाद्वीप बड़े पैमाने पर टुंड्रा वनस्पति और जंगलों से आच्छादित था। यह स्थिति अचानक बदल गई जब 1.4 करोड़ वर्ष पहले, अंटार्कटिका पर फैली बर्फ की चादरों के साथ महाद्वीप तेजी से ठंडा होने लगा और पौधे और जानवर बड़े पैमाने पर विलुप्त हो गए

शोधकर्ताओं ने 1.4 से 1.5 करोड़ वर्ष पुरानी अंटार्कटिका झील के तलछट या गाद के डायटम का विश्लेषण किया, जो सबसे बड़े मिओसीन शीतलन शुरू होने से ठीक पहले जमा हुआ था। यहां बताते चले कि डायटम - एक एकल-कोशिका वाला शैवाल जिसमें सिलिका की कोशिका भित्ति होती है। जिसमें कई प्रकार के प्लवक होते हैं और व्यापक जमा जीवाश्म पाए जाते हैं।

डायटम दुनिया में सबसे अलग और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण शैवाल के समूहों में से एक हैं। यह आकारहीन कांच की तरह बनी, अपनी कोशिका भित्ति की बदौलत आसानी से जीवाश्म बना सकते हैं।

शोधकर्ताओं की टीम ने तलछट या गाद में से डायटम की 200 से अधिक प्रजातियों की खोज की। लगभग हर प्रजाति विज्ञान के लिए नई थी। इस वजह से, शोधकर्ताओं ने प्रजातियों के वर्गीकरण और वंश के आधार पर झील की तलछट या गाद का विश्लेषण किया। यह शोध साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

इस विश्लेषण से पता चला कि मिओसीन युग में अंटार्कटिका में प्रजातियों की संरचना आज के अंटार्कटिका की डायटम वनस्पतियों की विशेषता से काफी अलग थी। जिसमें आज बहुत कम प्रजातियां हैं। इसके बजाय, मिओसीन  युग के डायटम में फ्लोरा प्रजाति और वनस्पतियों के साथ समानताएं देखी जा सकती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां वर्तमान में दक्षिणी गोलार्ध के गर्म हिस्सों जैसे दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पाई जाती हैं।

इन परिणामों के आधार पर, शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि 1.4 करोड़ वर्ष पहले के प्रमुख जलवायु परिवर्तनों के कारण, अंटार्कटिका में मिओसीन युग के डायटम वनस्पतियां काफी हद तक समाप्त हो गई हैं। शोधकर्ता का मानना हैं कि अत्यंत संवेदनशील प्रजातियों का डायटम महत्वपूर्ण है, इस तरह की वनस्पति जो अंटार्कटिका की विशेषता है। आज मिओसीन युग के बची कुछ वनस्पतियां ठंड की स्थिति के अनुकूल नए इलाकों में विकसित हो रही हैं। 

जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्त हो सकते है कई सूक्ष्म जीव

शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि जलवायु परिवर्तन जैसे कि मिओसीन युग में अंटार्कटिका में, सूक्ष्मजीवों के लिए इसके बहुत गंभीर परिणाम हुए थे। आज भी बड़े पैमाने पर इनकी विलुप्ती हो सकती है। चूंकि सूक्ष्म जीव पारिस्थितिक तंत्र के स्वस्थ कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनकी विविधता पर बदलती जलवायु और पर्यावरण के प्रभाव को बेहतर ढंग से समझना महत्वपूर्ण है।