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जलवायु परिवर्तन नए म्यूटेशन्स को बना सकता है कहीं ज्यादा खतरनाक

वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि, जीवों में हो रहे नए म्यूटेशन्स को कहीं ज्यादा खतरनाक बना सकती है

By Lalit Maurya

On: Thursday 04 February 2021
 

वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि, जीवों में हो रहे नए म्यूटेशन्स को कहीं ज्यादा खतरनाक बना सकती है, जोकि जीवों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसा जीवों के प्रोटीन फंक्शन पर पड़ रहे हानिकारक प्रभावों के कारण होता है। यह जानकारी उप्पसला यूनिवर्सिटी द्वारा किए शोध में सामने आई है जोकि जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित हुआ है।

जीव अपने आप को बदलते वातावरण के अनुरूप ढालने की कोशिश करते हैं, जिससे वो भविष्य में बदलती परिस्थितियों में जीवित रह सकें। आज जिस तरह से जलवायु में बदलाव आ रहा है, उसके चलते प्राकृतिक वातावरण भी बड़ी तेजी से बदल रहा है। फलस्वरूप कई प्रजातियों के जीवन पर इसका गहरा असर पड़ रहा है, इससे उनमें काफी बदलाव सामने आ रहे हैं।

इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता डेविड बर्जर ने बताया कि आने वाले समय में जीवों को इन तेजी से आ रहे बदलावों के लिए आनुवंशिक रूप से तैयार रहना होगा और अपने आप को इनके अनुरूप ढालना होगा वरना वो उसका सामना नहीं कर पाएंगे। यह अनुकूलन म्यूटेशन के रूप में हो सकता है, जिसके कारण जीवों के जीनोम में बदलाव आ जाता है। यह नए परिवेश में इन जीवों के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन कई बार इस म्युटेशन का जीवों पर नकारात्मक असर भी पड़ता है।

यह म्युटेशन किस तरह जीवों पर असर डाल रहा है, उसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने सैद्धांतिक मॉडल का सहारा लिया है। विभिन्न आवासों में अलग-अलग जीवों पर म्युटेशन कैसे असर डाल रहा है, साथ ही उसमें प्रोटीन फ़ंक्शन की क्या भूमिका है उसे समझने का प्रयास किया गया है।

शोध में शोधकर्ताओं ने उन बीटल्स पर प्रयोग किए हैं जिनमें म्युटेशन देखा गया था। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने इससे पहले अन्य जीवों पर किए शोधों का भी विश्लेषण किया है। जिसमें उन्होंने एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों जैसे यीस्ट, बैक्टीरिया और वायरस के साथ-साथ बहुकोशिकीय जीवों जैसे थेल क्रैस, फ्रूट फ्लाई और राउंडवॉर्म की भी जांच की थी। 

तापमान बढ़ने के साथ म्युटेशन के हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं दोगुने 

इस सारी जानकारी का विश्लेषण करने के बाद शोधकर्ता यह स्पष्ट करने में सक्षम थे कि म्युटेशन से पहले और बाद में जीवों ने अलग-अलग वातावरण में किस तरह व्यवहार किया था। इससे भी महत्वपूर्ण उनका उद्देश्य यह जानना था कि पर्यावरणीय परिस्थितियों ने हर जीव पर किस तरह से तनाव डाला था जो म्युटेशन का कारण बना था। जिससे म्युटेशन का प्रभाव कितना कम या ज्यादा हानिकारक होगा उसका पता चल सके। उन्होंने बदलते तापमान के असर का पता लगाने के लिए उसमें बदलाव करके भी देखा था।

बर्जर ने जानकारी दी कि तनावपूर्ण वातावरण में म्युटेशन के साथ और उसके बिना जीवों पर लगभग एक जैसा असर पड़ा था। लेकिन जब हमने उन अध्ययनों पर गौर किया जिनमें तापमान में हेरफेर किया गया था, उसमें परिणाम कुछ और था। उच्च तापमान में जिन जीवों में नए म्युटेशन आए थे उनपर कहीं ज्यादा असर पड़ा था।

अध्ययन से संकेत मिले है कि जिस तरह आईपीसीसी ने इस सदी में तापमान के 2 से 4 डिग्री तक बढ़ने के अनुमान लगाए हैं जिसके चलते उष्णकटिबंधीय प्रजातियों में म्युटेशन के हानिकारक प्रभाव दोगुने हो सकते हैं। बर्जर के अनुसार यह म्युटेशन अनुवांशिक होते हैं और हर नई पीढ़ी में भी उत्पन्न होते हैं।

उनके हानिकारक प्रभावों में होने वाली वृद्धि जीवों की अनुकूलन क्षमता और वो भविष्य में वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि से किस तरह अनुकूलन करते हैं इस बात पर निर्भर करेगी। उनके अनुसार हमारे परिणाम यह समझने में मदद कर सकते हैं कि भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग जैव विविधता को कैसे प्रभावित कर सकती है।