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जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है जंगल में आग का खतरा, स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है असर

यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तेजी से जारी रहता है, तो सदी के अंत तक जंगल में लगने वाली आग का खतरा दुनिया के 74 फीसदी भूभागों पर पड़ सकता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 14 October 2020
 

मोनाश यूनिवर्सिटी द्वारा किए एक नए शोध से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जंगल में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन न केवल आग लगने के मौसम पर असर डाल रहा है। साथ ही इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।

दुनिया भर में आग लगने की घटनाएं आम बात होती जा रही है। हाल ही में 2019-20 के दौरान ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में भीषण आग लगी थी, जिससे करीब 1,86,000 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल जल गए थे। इसी तरह 2019-20 में ब्राजील के अमेजन में भी बड़े इलाके को आग ने अपनी चपेट में ले लिया था। 2018 और 2020 में पश्चिमी अमेरिका और ब्रिटिश कोलंबिया, साथ ही 2017-18 में कनाडा में लगी आग इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अभी हाल ही में तंज़ानिया के जंगलों में भीषण आग लगी है जिस पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका है।

रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते आग लगने के तीन प्रमुख कारकों ईंधन, ऑक्सीजन और आग लगने के स्रोतों को मदद मिल रही है जिससे इनकी घटनाओं में इजाफा हो रहा है। 

जंगल की आग से स्वास्थ्य भी हो रहा है प्रभावित

एक तरफ जहां जलवायु में आ रहे बदलावों के कारण बारिश के पैटर्न में लगातार बदलाव आ रहा है। वहीं सूखे की घटनाओं में भी वृद्धि हो रही है। साथ ही वैश्विक तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। जिसके परिणामस्वरूप पेड़, पौधे और वनस्पतियां तेजी से आग पकड़ रही है। जिसका असर ने केवल जैव विविधता पर पड़ रहा है साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी इसका असर हो रहा है। एक तरफ जहां जलने से मरने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है वहीं इससे निकला धुआं शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी असर डाल रहा है। 

यह शोध न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपा है। इस शोध में पिछले 20 वर्षों के दौरान इस विषय पर छपे अध्ययनों का विश्लेषण किया गया है। जिसके अनुसार इससे फैलने वाले धुंए के चलते आंखों में जलन, कॉर्निया को नुकसान, सांस की बीमारी के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक प्रभाव जैसे अवसाद और अनिद्रा हो सकते हैं। साथ ही बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। 

एक ओर जहां जलवायु परिवर्तन, जंगल की आग को और बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके चलते ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी वृद्धि हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार 1997 से 2016 के बीच जंगल की आग से जितना उत्सर्जन हुआ है वो जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन के करीब 22 फीसदी के बराबर है। वहीं आग से जिस तरह उष्णकटिबंधीय वनों को नुकसान पहुंचा है उसका असर पृथ्वी की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता पर पड़ रहा है। जिस वजह से जलवायु को ठंडा रखने की दक्षता पर भी असर हो रहा है। 

उत्सर्जन के बढ़ने से 74 फीसदी भूभागों पर मंडरा रहा है खतरा 

रिपोर्ट के अनुसार यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तेजी से जारी रहता है तो सदी के अंत तक जंगल की आग का खतरा दुनिया के 74 फीसदी भूभागों पर पड़ सकता है। हालांकि रिपोर्ट का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को यदि 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित कर लिया जाता है तो उससे इस जोखिम को 80 फीसदी तक कम किया जा सकता है। जबकि यदि तापमान में हो रही वृद्धि को यदि 2 डिग्री सेल्सियस पर रोक लिया जाता है तो उससे इसके असर को 60 फीसदी तक कम किया जा सकता है। 

1.5 डिग्री सेल्सियस के इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2030 तक वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 2010 के स्तर से लगभग 45 फीसदी कम करने की जरुरत होगी, जबकि 2050 तक उसे नेट जीरो करना होगा। यह लक्ष्य मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं है गणना के अनुसार यदि 2020 से 2030 तक हर साल कार्बन उत्सर्जन में 7.6 फीसदी की कमी कर दी जाए तो 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। 

यह सही है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती करना मुश्किल और महंगा है, लेकिन आने वाले समय में इसके जो फायदे सामने आएंगे वो इसकी लागत की तुलना में कहीं ज्यादा होंगे। अकेले जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कटौती करने से पीएम 2.5 और ओजोन के स्तर में कमी आ जाएगी। इससे स्वास्थ्य को जो लाभ पहुंचेगा उसका मूल्य कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने की लागत से करीब 1.40 से 2.45 गुना अधिक होगा।