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जलवायु आपातकाल, कॉप-25: एक डिग्री तापमान बढ़ने से पिघल गई खरबों टन बर्फ

वैश्विक जलवायु सम्मेलन (कॉप-25) में जलवायु परिवर्तन के असर का अलग-अलग आधार पर आकलन किया जा रहा है। आइए, जानते हैं कि कॉप-1 से लेकर अब तक जलवायु परिवर्तन का बर्फ और सीओ2 पर क्या असर पड़ा

By Dayanidhi

On: Wednesday 04 December 2019
 
जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रहे तापमान की वजह से तेजी से बर्फ पिघल रही है। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स
जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रहे तापमान की वजह से तेजी से बर्फ पिघल रही है। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रहे तापमान की वजह से तेजी से बर्फ पिघल रही है। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स

जब लोगों ने पहली बार जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के बारे में बात करना शुरू की थी तो उससे पहले से ही दुनिया में गर्मी बढ़ाने वाली गैसें वातावरण में छोड़ी जा रहीं थी। जिससे तापमान बढ़ता गया और सारी दुनिया को चरम मौसम सम्बंधित आपदाओं का सामना लगातार करना पड़ रहा है। 

इसी बढ़ते हुए तापमान को रोकने के लिए कॉन्फ्रेंस ऑन द पार्टीज (कॉप) की 25वीं बैठक स्पेन की राजधानी में हो रही है। इस बैठक में दुनिया भर के 196 देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। बैठक 2 से 13 दिसंबर 2019 तक चलेगी। कॉप का गठन सन 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के तहत किया गया था।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पहला संयुक्त राष्ट्र का राजनयिक सम्मेलन 1992 में रियो डी जनेरियो में हुआ था। अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन के अनुसार, हवा में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 35.8 करोड़ (358 प्रति मिलियन) टन से बढ़कर लगभग 41.2 करोड़ (प्रति मिलियन) टन हो गया था। 27 वर्षों में कार्बन डाइऑक्साइड में यह 15 फीसदी की वृद्धि है। 

ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के अनुसार, 1992 में जीवाश्म ईंधन और उद्योग से हीट-ट्रैपिंग कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 600 करोड़ (6.06 बिलियन) मीट्रिक टन कार्बन से बढ़कर 987 करोड़ (9.87 बिलियन) मीट्रिक टन हो गया। 25 वर्षों में औद्योगिक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में बहुत वृद्धि हुई है।

नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फेयरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के अनुसार, 27 साल में वैश्विक औसत तापमान 1 डिग्री फारेनहाइट (0.57 डिग्री सेल्सियस) से अधिक बढ़ गया।

नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर के अनुसार आर्कटिक समुद्री बर्फ की वार्षिक औसत सीमा 1992 में 47 लाख (4.7 मिलियन) वर्ग मील (121 लाख वर्ग किलोमीटर) से 2019 में 39 लाख (3.9 मिलियन) वर्ग मील (101 लाख वर्ग किलोमीटर) तक कम हो गई है। जोकि 17 फीसदी की कमी है।

प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के एक अध्ययन के अनुसार, 1993 से 2018 तक ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर 5.2 ट्रिलियन टन (52 खरब टन) पिघल गई है।

जर्नल नेचर के एक अध्ययन के अनुसार, 1992 से 2017 तक अंटार्कटिक बर्फ की चादर 300000 करोड़ (3 ट्रिलियन) टन (270000 करोड़ टन) बर्फ पीघल गई है।

नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फेयरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए)  के अनुसार, वैश्विक समुद्री स्तर 1992 के बाद से औसतन 2.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष बढ़ गया है। यह कुल 78.3 मिलीमीटर या 3.1 इंच है। 

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