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बंजर होता भारत -6: 10 साल में 31 फीसदी घटे घास के मैदान

2005 से 2015 के बीच सामुदायिक भूमि और चारागाह कम हुए, वहीं दूसरी ओर कृषि भूमि बढ़ रही है, जिससे असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है

By Kiran Pandey, Lalit Maurya

On: Wednesday 11 September 2019
 
Photo: GettyImages
Photo: GettyImages Photo: GettyImages

भारत ने पिछले एक दशक में अपने घास के मैदान का 31 फीसदी हिस्से को खो दिया है| दूसरे शब्दों में 2005 से 2015 के दौरान घास के इन मैदानों का 56.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र घट गया है। गौरतलब है कि यह आंकड़े संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज यानी कॉप के 14वें अधिवेशन (कॉप-14) में संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के समक्ष प्रस्तुत किये गए हैं । 2005 से 2015 के बीच घास के मैदानों का कुल क्षेत्रफल 180 लाख हेक्टेयर से घटकर 123 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो कि चिंता का विषय है ।

रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के अरावली रेंज में घास के मैदान गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वहीं अन्य राज्यों जिनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश प्रमुख हैं, में भूमि को गंभीर नुकसान पहुंचा है। देश में चराई भूमि को नुकसान पहुंचाने वाले कारको को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दो भागों में बांटा जा सकता है। अत्यधिक चराई, खराब प्रबंधन और जंगलों की कटाई प्रत्यक्ष कारक हैं । जबकि चरागाहों पर बढ़ता अतिक्रमण और तेजी से बढ़ती आबादी के कारण चरागाहों को कृषि भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है, जो कि अप्रत्यक्ष कारक हैं।

घट गयी 174.8 लाख हेक्टेयर सामुदायिक भूमि

रिपोर्ट के अनुसार, देश ने अपनी सामुदायिक भूमि का लगभग 19 फीसदी हिस्सा इसी अवधि में खो दिया है । जो कि 2005 से 2015 के बीच लगभग 905 लाख हेक्टेयर से घटकर 730.2 लाख हेक्टेयर रह गयी है । सामुदायिक भूमि या पंचायती जमीन में चरागाह, कुछ वन भूमि, तालाब, नदियां और अन्य क्षेत्र शामिल होते हैं, जिन्हें ग्रामीण समुदाय के सभी लोग उपयोग कर सकते हैं।

यह भूमि ग्रामीण समुदायों को भोजन, पानी, चारा, जलावन लकड़ी और आजीविका प्रदान करती है। इसके साथ ही यह ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करने में भी मदद करती है और साथ ही भूमि के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भी सहायता करती है । बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कृषि भूमि में बदली जा रही है

सामुदायिक भूमि और चरागाह

रिपोर्ट के अनुसार देश भर में 47.4 लाख हेक्टेयर चरागाह भूमि को बदलकर कृषि भूमि में तब्दील कर दिया गया है। वहीं इस एक दशक में 291.1 लाख हेक्टेयर सामुदायिक भूमि को कृषि भूमि में बदल दिया गया है । औद्योगीकरण और गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए सामुदायिक भूमि में किया जा रहा बदलाव इसके घटते आकार के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

इसी अवधि के दौरान कृषि क्षेत्र में 18 फीसदी की वृद्धि देखी गयी है, जो कि 11.36 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 13.45 करोड़ हेक्टेयर तक पहुंच गया है, लेकिन तेजी से बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए यह भूमि भी कम पड़ती जा रही है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पता चले कि इस भूमि की उत्पादकता में भी गिरावट आ रही है।

आंकड़ों की मानें तो पिछले एक दशक में कम से कम 2.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि की उत्पादकता में कमी आई है। जिसमें से 8 लाख हेक्टेयर चरागाह भूमि और 59 लाख हेक्टेयर सामुदायिक भूमि है। घास के मैदानों की उत्पादकता में गिरावट का सीधा असर पशुधन के लिए उपलब्ध चारे की गुणवत्ता पर पड़ेगा। जिससे मनुष्य के लिए उपलब्ध दूध, भोजन और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था में मंदी आ सकती है।