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बंजर होता भारत –दो: जद में आ रही है झारखंड की 50 प्रतिशत जमीन

बंजर होती धरती पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है, इसका हल ढूंढ़ने के लिए 196 देशों के प्रतिनिधि भारत में जुटे हैं। डाउन टू अर्थ ने झारखंड से ग्राउंड रिपोर्ट की है।  

By Ishan Kukreti

On: Friday 30 August 2019
 
झारखंड में गिरिडीह ब्लॉक में स्थित बरकीटांड़ गांव का कुआं, जो पूरी तरह सूख चुका है। फोटो: ईशान कुकरेती
झारखंड में गिरिडीह ब्लॉक में स्थित बरकीटांड़ गांव का कुआं, जो पूरी तरह सूख चुका है। फोटो: ईशान कुकरेती झारखंड में गिरिडीह ब्लॉक में स्थित बरकीटांड़ गांव का कुआं, जो पूरी तरह सूख चुका है। फोटो: ईशान कुकरेती

दुनिया भर में धरती की बंजरता बढ़ती जा रही है। अकेले भारत की बात की जाए तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) द्वारा प्रकाशित मरुस्थलीकरण एवं भू-क्षरण एटलस के मुताबिक, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 30 फीसदी हिस्से (लगभग 96.40 मिलियन हेक्टेयर जमीन ) की उर्वरता खत्म हो रही है। इस पर विचार विमर्श करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का कन्वेंशन टु कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) का सीओपी-14 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) 2 से 13 सितंबर के बीच भारत में होगा। इसमें 196 देशों के करीब 3,000 प्रतिनिधि पहुंचेंगे जिनमें वैज्ञानिक, नौकरशाह, गैर सरकारी संस्थाएं, राजनेता और औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधि मुख्य रूप से होंगे। इससे पहले डाउन टू अर्थ ने भारत के विभिन्न राज्यों में ग्राउंड रिपोर्ट कर मरुस्थलीकरण की पड़ताल की। आज प्रस्तुत है, झारखंड की स्थिति-

झारखंड के अधिकांश हिस्सों में मिट्टी के कटाव के लिए लहरदार भौगोलिक स्थिति एक प्रमुख कारक है। 2015 में झारखंड पर नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “राज्य की लहरदार भौगोलिक स्थिति और बारिश आधारित कृषि ने मिट्टी के भारी निम्नीकरण, विविध कृषि पद्धतियों और कम उत्पादकता को बढ़ावा दिया है। झारखंड राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा के अलावाउन पांच राज्यों में एक है, जहां एसएसी के एटलस के अनुसार, कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा बंजर और भू-निम्नीकरण के अंतर्गत आता है।

झारखंड के गिरिडीह जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का सर्वाधिक 73.79 प्रतिशत हिस्सा भूमि के निम्नीकरण की चपेट में है। यह धनबाद के खनन वाले इलाके का हिस्सा है, जहां देश में सबसे अधिक कोयला खदान के पट्टे (131) हैं और 500 से अधिक छोटी खनिज खदानें हैं। परिचालित या चालू लघु खनिज पट्टों के मामले में गिरिडीह राज्य में तीसरे स्थान पर है, जबकि धनबाद जिले से सटे क्षेत्र में कोयला खदान के पट्टों की संख्या सबसे अधिक (56) है। 2005 और 2017 के बीच की“वन राज्य” रिपोर्ट से पता चलता है कि गिरिडीह के कुल भौगोलिक क्षेत्र की तुलना में जंगल के क्षेत्रफल का प्रतिशत थोड़ा बढ़ा है। यह 2005 में 820 वर्ग किमी था, जो 2017 में 890 वर्ग किमी हो गया। जबकि, “ओपन फॉरेस्ट” (10-40 प्रतिशत के बीच आच्छादित घनत्व) की कीमत पर बहुत घने वन क्षेत्र में (आच्छादित घनत्व 70 प्रतिशत से अधिक) गिरावट आई है।बेहद घना वन क्षेत्र 98 वर्ग किमी से घटकर 77 वर्ग किमी रह गया है। 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में शहरों की संख्या 152 थी, जो 2011 की जनगणना के अनुसार 228 हो गई। इसका प्रभाव पूरे जिले भर में देखा जा सकता है।

गिरिडीह ब्लॉक में स्थित बरकीटांड़ गांव के सूरजमुनि हस्दा कहते हैं, “मॉनसून आने के साथ ही हर साल हमारे गांव में 70 से अधिक परिवारों के बीच पानी के लिए टकराव शुरू हो जाता है।” 10 वर्षों के भीतर गांव के सभी कुएं और नलकूप सूख चुके हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे ब्लॉक में भूजल स्तर 2013 में 8 मीटर से गिरकर 2017 में लगभग 10 मीटर तक नीचे चला गया है।

पीने के पानी के लिए ऐसे निकाला जाता है पानी। फोटो: ईशान कुकरेती

गांव के उप-प्रधान जमील किस्के का कहना है कि 2009 में जब गांव का आखिरी हैंडपंप सूख गया, तो स्कूल परिसर में लगभग 100 मीटर की गहराई के साथ एक नया हैंडपंप लगाया गया। “अब यह भी सूखता जा रहा है।” स्कूल के एक शिक्षक साइरिल मरांडी कहते हैं कि स्कूल में बच्चों की संख्या कम है, क्योंकि पानी की कमी के कारण स्कूल मिड-डे मील नहीं दे पा रहे हैं। वह कहते हैं, “यहां तक कि पानी की कमी के कारण इलाके में निर्माण कार्य रुका हुआ है और इससे निर्माण की लागत बढ़ती जा रही है।”

गिरिडीह के जिला कृषि अधिकारी धीरेंद्र कुमार पांडे का कहना है, “2015-16 से परती भूमि योजना के अंतर्गत, हम किसानों को खेती के लिए 2,400 रुपए प्रति हेक्टेयर का प्रोत्साहन दे रहे हैं।” लेकिन मौजूदा समय में जब कृषि गैर-लाभकारी हो चुकी है, तो कुछ लोग ही इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आते हैं।

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