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पिछले 20 वर्षों में खत्म हो गए आइसलैंड के 750 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्लेशियर

1890 से लेकर अब तक आइसलैंड पर 2,200 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्लेशियर गायब हो चुके हैं, जिसका करीब एक तिहाई हिस्सा पिछले 20 वर्षों में विलुप्त हुआ है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 01 June 2021
 

पिछले 20 वर्षों के दौरान आइसलैंड के 750 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्लेशियर खत्म हो चुके हैं, जोकि वहां मौजूद कुल ग्लेशियरों की सतह का करीब 7 फीसदी हिस्सा हैं। वैज्ञानिक इसके लिए तापमान में आ रही वृद्धि को जिम्मेवार मान रहे हैं।

आइसलैंड के करीब 10 फीसदी जमीन पर ग्लेशियर मौजूद हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 2019 में घटकर 10,400 वर्ग किलोमीटर रह गया है। वहीं यदि 1890 के बाद से देखें तो आइसलैंड में करीब 2,200 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्लेशियर अब तक पिघल चुके हैं जोकि वहां मौजूद कुल ग्लेशियरों का करीब 18 फीसदी हैं। यह जानकारी आइसलैंड के वैज्ञानिक जर्नल जोकुल में छपे एक शोध में सामने आई है।

हालांकि इसका करीब एक-तिहाई हिस्सा पिछले 20 वर्षों में ही गायब हुआ है, जो स्पष्ट तौर पर इस बात का सबूत है कि तापमान में हो रही वृद्धि का असर इन ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञ इस बारे चेतावनी भी दे चुके हैं कि यदि अभी ध्यान न दिया गया तो 2200 तक आइसलैंड पर मौजूद ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो सकते हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले 2014 में आइसलैंड के ग्लेशियर ‘ओकजोकुल’ से उसका ग्लेशियर होने का दर्जा ले लिया गया था। आइसलैंड विश्वविद्यालय की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार कभी 16 वर्ग किलोमीटर में फैले इस ग्लेशियर में, 2012 तक सिर्फ 0.7 वर्ग किलोमीटर में ही बर्फ शेष रह गई थी। यह आइसलैंड का पहला ऐसा ग्लेशियर है  जिसने जलवायु परिवर्तन के कारण अपनी पहचान खो दी थी।

इससे पहले भी विशेषज्ञ इस बारे चेतावनी दे चुके हैं कि यदि अभी ध्यान न दिया गया तो 2200 तक आइसलैंड पर मौजूद ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो सकते हैं।

औसतन 26,700 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से पिघल रही है ग्लेशियरों पर जमा बर्फ

ऐसा नहीं है कि सिर्फ आइसलैंड के ग्लेशियर ही पिघल रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के सबूत दुनिया के कई हिस्सों में सामने आए हैं। हाल ही में अंटार्कटिका में मौजूद ग्लेशियर से टूट कर दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड ‘ए-76’ अलग हो गया था। जिसका कुल क्षेत्रफल 4,320 वर्ग किलोमीटर का था।

इसी तरह जर्नल नेचर में छपे एक शोध से पता चला है कि 2000 से 2019 के बीच दुनिया भर में ग्लेशियरों पर जमा बर्फ औसतन 26,700 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से पिघल रही है, जोकि समुद्र के जलस्तर में होने वाली वृद्धि के 21 फीसदी के बराबर है। यह अध्ययन करीब 217,175 ग्लेशियरों पर किया गया था, जोकि दुनिया के 99.9 फीसदी ग्लेशियर हैं। जो करीब 7 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैले हुए  हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार 2000 से 2004 के बीच जहां ग्लेशियरों में जमा बर्फ 22,700 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से पिघल रही थी। वो 2015 से 2019 के बीच रिकॉर्ड 29,800 करोड़ टन प्रतिवर्ष पर पहुंच गई थी। जिसका मतलब है कि पिछले 20 वर्षों में बर्फ के खोने की दर में 31.3 फीसदी का इजाफा हुआ है। वैज्ञानिकों की मानें तो यह ग्लेशियर तापमान में हो रही तीव्र वृद्धि के कारण पिघल रहे हैं, जिसके लिए हम इंसान ही जिम्मेवार हैं।

यही नहीं इन ग्लेशियरों के पिघलने के कारण हर वर्ष समुद्र का जलस्तर 0.74 मिमी की गति से बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं की मानें तो पिछले 20 वर्षों के दौरान समुद्र के जलस्तर में जो वृद्धि हुई है उसके पांचवे हिस्से के लिए इन ग्लेशियरों का पिघलना ही जिम्मेवार है।

अनुमान है कि सदी के अंत तक करीब 20 करोड़ लोग समुद्र के बढ़ते जलस्तर की जद में होंगें। इससे बचने के लिए जरुरी है कि जलवायु परिवर्तन को गंभीर से लिया जाए और इसे रोकने के लिए बढ़ते उत्सर्जन में जितना जल्द हो सके कमी की जाए।