जलवायु परिवर्तन के चलते 10 वर्षों में 24 फीसदी तक घट जाएगी मक्के की पैदावार

नासा का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के चलते 2030 तक जहां एक तरफ मक्के की पैदावार 24 फीसदी तक गिर जाएगी वहीं गेहूं का उत्पादन 17 फीसदी बढ़ सकता है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 02 November 2021
 

जलवायु परिवर्तन के चलते 2030 की शुरुआत तक मक्के और गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि वैश्विक उत्सर्जन में इसी तीव्र गति से वृद्धि जारी रहती है तो उसके चलते मक्के की पैदावार में 24 फीसदी की गिरावट आ सकती है। वहीं दूसरी तरफ गेहूं की पैदावार में करीब 17 फीसदी की वृद्धि होने की सम्भावना है।  यह जानकारी हाल ही में नासा द्वारा किए एक अध्ययन में सामने आई है, जोकि जर्नल नेचर फूड में प्रकाशित हुआ है। 

इस शोध में शोधकर्ताओं ने कृषि और जलवायु से जुड़े उन्नत मॉडल का उपयोग किया है, जिससे पता चला है कि पैदावार में आने वाले इस बदलाव के लिए तापमान में हो रही वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में आता बदलाव और मनुष्य द्वारा किया जा रहा ग्रीनहाउस गैसों को उत्सर्जन जिम्मेवार है, जिससे सतह पर मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो रही है।

इस बारे में नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज (जीआईएसएस) और पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिक और इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता जोनास जैगरमेयर ने बताया कि जलवायु में आता बदलाव और नई परिस्थितियां अधिक से अधिक क्षेत्रों में फसलों की पैदावार को उनकी सामान्य सीमा से बाहर धकेल रही हैं। 

उनके अनुसार इन बदलावों का असर फसलों की वृद्धि पर पड़ेगा। यही नहीं जलवायु की यह विषम परिस्थितियां समय के साथ सामान्य बनती जाएंगी, जिसका  असर अगले एक दशक में विश्व के प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्रों पर पड़ने लगेगा। 

इसका मतलब किसानों को बहुत तेजी से इस बदलती जलवायु के अनुकूल बनना होगा। उदाहरण के लिए उन्हें फसलों को रोपने के बदलाव करना होगा या फिर फसलों की किस्मों में बदलाव करना होगा। वहीं दूसरी तरफ उच्च-अक्षांश वाले क्षेत्रों में इससे फायदा पहुंचेगा। 

अनुमान है कि इन परिवर्तनों के चलते उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में मक्के की खेती अधिक कठिन हो जाएगी जबकि गेहूं को इससे फायदा पहुंचेगा और उसके उपज क्षेत्र में विस्तार हो सकता है। 

शोधकर्ताओं के अनुसार मक्का एक ऐसी फसल है जो उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय देशों सहित अक्षांशों की एक विस्तृत श्रृंखला में उगाया जाता है, जहां बढ़ता तापमान ठंडे उच्च अक्षांश क्षेत्रों की तुलना में अधिक हानिकारक होगा। इसके परिणामस्वरूप भविष्य में उत्तरी और मध्य अमेरिका, पश्चिमी अफ्रीका, मध्य और पूर्वी एशिया में मक्के की पैदावार में 20 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आने की संभावना है।

वहीं गेहूं, जो समशीतोष्ण जलवायु में सबसे अच्छा बढ़ता है, यही वजह है कि जलवायु में आते बदलावों के चलते उत्तरी अमेरिका, कनाडा, चीन, मध्य एशिया, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीका सहित दुनिया के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में इसकी पैदावार बढ़ सकती है। हालांकि यह लाभ 2050 तक बराबर हो सकते हैं।    

गरीब किसानों के लिए और बढ़ जाएगा संकट

इस बारे में इस शोध से जुड़े अन्य शोधकर्ता और पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट से जुड़े क्रिस्टोफ मुलर ने बताया कि आंकड़े एक प्रभाव तो स्पष्ट रूप से दिखाते हैं जलवायु में जिस तेजी से बदलाव आ रहा है उसका असर पिछड़े देशों की मुख्य खाद्यान्न फसलों में तेजी से गिरावट के रूप में सामने आने की सम्भावना है।

इसके चलते खाद्य सुरक्षा और आय में जो असमानता व्याप्त है उसके और बढ़ने की आशंका है। गौरतलब है कि उत्तरी गोलार्ध में गेहूं की पैदावार में होने वाली वृद्धि दक्षिण में मक्के की उपज में आने वाली गिरावट की भरपाई नहीं कर सकती है।  

गरीब देशों और निश्चित रूप से प्रभावित होने वाले छोटे किसानों के पास अक्सर वैश्विक बाजार में भोजन की खरीद के साधनों की कमी होती है। ऐसे में खाद्य उत्पादन के पैटर्न में आने वाला परिवर्तन कुछ क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बन सकता है, जबकि कुछ क्षेत्रों को इससे फायदा होने की सम्भावना है। 

ऐसा नहीं है कि केवल तापमान ही भविष्य में फसलों की पैदावार को प्रभावित करेगा। वर्तमान में बढ़ता कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर फसलों की वृद्धि पर खासकर गेहूं पर सकारात्मक प्रभाव डालेगा। हालांकि यह फसलों में मौजूद पोषक तत्वों को कम कर सकता है। वैश्विक स्तर पर बढ़ता तापमान वर्षा के पैटर्न, लू और सूखे की आवृत्ति और अवधि को भी प्रभावित करता है, जो फसलों के स्वास्थ्य और पैदावार के लिए खतरनाक है। जैगरमेयर के अनुसार निष्कर्ष से पता चला है कि यदि वैश्विक स्तर पर तापमान में हो रही वृद्धि को सीमित करने के लिए महत्वाकांक्षी प्रयास किए जाएं तो भी बदलती जलवायु का असर कृषि पर पड़ने की पूरी सम्भावना है। 

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