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दुनिया को करना पड़ सकता है अभूतपूर्व मंदी का सामना, ये हैं वजह

अमेरिका में आयल रिफाइनरी खाड़ी तट पर स्थित है, जिसके कारण वहां जलस्तर में आ रही वृद्धि और बाढ़ का खतरा सबसे ज्यादा है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 18 February 2020
 
Photo credit: science.dodlive.mil
Photo credit: science.dodlive.mil Photo credit: science.dodlive.mil

जलवायु परिवर्तन का खतरा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जोकि बड़े पैमाने पर हमारी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा रहा है। पर हमारे वित्त बाजार और प्रणाली पर इसका कितना असर पड़ेगा। अब तक इसका सही सही अनुमान नहीं लग पाया है। ऊर्जा क्षेत्र और बाजार पर बढ़ते खतरे को देखते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया ने चरम मौसमी घटनाओं के ऊर्जा के वित्तीय क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया है। जोकि अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर एनर्जी में प्रकाशित हुआ है। जिसके अनुसार इन घटनाओं के खतरे के आंकलन के बिना एक आम ऊर्जा निवेशक सिर्फ यह आशा कर सकता है कि अगली घटना अचानक कोई बड़ा खतरा लेकर नहीं आएगी । इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता और यूसी डेविस ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर पॉल ग्रिफिन के अनुसार "यदि बाजार बेहतर तरीके से जलवायु के पड़ने वाले प्रभावों का आंकलन नहीं करेगी, तो दुनिया भर में मंदी का ऐसा दौर आएगा, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।“

ऊर्जा कंपनियों के कंधे पर बढ़ता जा रहा है आपदाओं का बोझ

ग्रिफिन के अनुसार इन घटनाओं के चलते ऊर्जा के बाजार क्षेत्र पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उनके अनुसार 2007-08 में आये मंदी के दौर के लिए इसी तरह के अप्रत्याशित जोखिम जिम्मेदार थे। हाल ही में ऊर्जा कंपनियों के कंधे पर इस तरह के खतरे का बोझ बढ़ता जा रहा है। उन्हें इस जोखिम का बेहतर मूल्यांकन करने की जरुरत है। साथ ही इन आपदाओं से निपटने के लिए उसका बेहतर प्रबंधन करने की भी जरुरत है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में पिछली गर्मियों के दौरान तापमान हद से ज्यादा ऊंचा था। जिसके चलते न केवल कृषि को नुकसान पहुंचा था बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी उसका बुरा असर पड़ा था। इसके चलते आर्थिक विकास बाधित हो गया था। ऊर्जा वितरण के एक बड़े हिस्से को बंद करना पड़ा था। जैसा कि उन्होंने उत्तरी कैलिफोर्निया में किया था जब आग और मौसम की मार के चलते आग के डर से पीजी एंड ई ने एनर्जी सप्लाई बंद कर दी थी।

इसके साथ-साथ बाढ़ सूखा जैसी घटनाएं वाटर सप्लाई और ट्रांसपोर्ट को भी प्रभावित कर रही हैं। जिससे न केवल परिवार, व्यवसाय बल्कि पूरा शहर और पूरा क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। कभी-कभी यह प्रभाव स्थायी हो जाता है। जिससे अर्थव्यवस्था स्थानीय और बड़े स्तर पर प्रभावित हो सकती है। इन सबके बावजूद निवेशक और एसेट मैनेजर जलवायु परिवर्तन से जुड़े इन खतरों को कम करके आंक रहे हैं। संपत्ति को होने वाला नुकसान तो हर जगह सुर्खियों में छप जाता है। पर व्यवसाय इससे कैसे निपटेंगे इस बात का किसी को पता नहीं है। जो पूरी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। जिन स्थानों पर जलवायु सम्बन्धी जोखिम ज्यादा है। वहां बाजार जोखिम भी ज्यादा होता है।

उदाहरण के लिए अमेरिका में आयल रिफाइनरी खाड़ी तट पर स्थित है, जिसके कारण वहां जलस्तर में आ रही वृद्धि और बाढ़ का खतरा सबसे ज्यादा है। जबकि बिजली की सप्लाई शुष्क क्षेत्रों से की जाती है जिससे उनमें आग लगने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। और बीमा क्षेत्र इसके नुकसान की भरपाई करेगा या नहीं यह भी इसके खतरे को और बढ़ा देता है। इसके साथ ही नुकसान की भरपाई सम्बन्धी नियम कायदे इस खतरे को बढ़ा देते हैं। एक्सान मोबिल से जुड़े केस को ही ले लीजिये जब क्लाइमेट चेंज के चलते ऊर्जा कंपनी को भरी क्षति उठानी पड़ी थी। 

आज भी इन घटनाओं के जोखिम की भविष्यवाणी करना कठिन है। हालांकि क्लाइमेट रिस्क मॉडल की मदद से कुछ कंपनियां और संगठन क्लाइमेट रिस्क को बेहतर तरके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। और उन्होंने कुछ हद तक इसकी भविष्यवाणी करने में सफलता भी हासिल की है। लेकिन इसके बावजूद इसके खतरे के बारे में सही आंकलन करना काफी कठिन है। अतीत में आने वाली आपदाओं के पैटर्न के आधार पर भविष्य की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। चाहे वो भविष्यवाणी एक साल, पांच साल या बीस सालों के लिए भी हो। निवेशक समय के साथ बाढ़ सूखा जैसी घटनाओं के प्रभावों को कम करके आंकने लगते हैं, जिससे भविष्य में उनके आंकलन पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।