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मानव निर्मित सीमाओं और जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया वन्यजीवों को खतरा

शोधकर्ताओं ने 32,000 किमी की सीमाओं की पहचान की, जिनमें बाड़ और दीवारें लगाई गई हैं, जो जानवरों की बड़ी संख्या को अधिक उपयुक्त वातावरण में जाने से रोकते हैं।

By Dayanidhi

On: Tuesday 09 February 2021
 
Man-made borders and climate change threatens wildlife

नए शोध के अनुसार, राष्ट्रीय सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए बनाई गई दीवारें और बाड़ लगभग 700 स्तनपायी प्रजातियों को जलवायु परिवर्तन के अनुसार ढलने, उपयुक्त वातावरण में जाने में मुश्किल पैदा कर सकती है।

यूके के डरहम विश्वविद्यालय की अगुवाई में किए गए इस अध्ययन का उद्देश्य यह देखने के लिए किया गया है कि मानव निर्मित बाधाएं जानवरों की आवाजाही को कैसे रोक सकती हैं। जानवर रहने तथा भोजन की खोज में सीमाओं से अलग-अलग देशों में जाते रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने 32,000 किमी की सीमाओं की पहचान की, जिनमें बाड़ और दीवारें लगाई गई हैं, जो जानवरों की बड़ी संख्या को अधिक उपयुक्त वातावरण में जाने से रोकते हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि इन बाधाओं में से, अमेरिका-मेक्सिको सीमा की दीवार, चीन और रूस के बीच की सीमा के साथ बाड़ और भारत-म्यांमार सीमा के साथ बनाई जा रही बाड़ सबसे अधिक हानिकारक हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने हिसाब लगाया कि केवल अमेरिका-मेक्सिको सीमा की दीवार जलवायु परिवर्तन से विस्थापित 122 स्तनपायी प्रजातियों की आवाजाही को बाधित करती है।

दुनिया भर में मानव निर्मित सीमाओं से रोके जाने वाले स्तनधारियों में तेंदुए, बाघ और गंभीर रूप से लुप्तप्राय में सायगा मृग, चीता और जगुआर आदि शामिल हैं। राजनीतिक सीमाओं के बारे में समझने के साथ-साथ शोधकर्ताओं ने देशों के भीतर प्रजातियों पर पड़ रहे जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों की भी तुलना की।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जो देश उत्सर्जन कम करते है उन देशों में जैव विविधता को सबसे अधिक हानि हुई है। अधिक उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि एक तिहाई स्तनधारियों और पक्षियों को जलवायु परिवर्तन के कारण 2070 तक अन्य देशों में उपयुक्त निवास स्थान खोजने की जरुरत पड़ेगी। इसका सबसे अधिक असर अमेज़ॅन वर्षावन और उष्णकटिबंधीय एंडीज़ के बीच, हिमालय के आसपास और मध्य और पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में होने की आशंका है। शोधकर्ता इस समस्या को कम करने के लिए सीमा-पार से संरक्षण की पहल और जानवरों के आवासों को बचाने का सुझाव दे रहे हैं।

उन्होंने दुनिया भर के नेताओं से यह भी आग्रह किया है कि नवंबर 2021 में ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में ग्रीनहाउस गैसों में महत्वाकांक्षी कटौती कर जैव विविधता के खतरे को कम करने के लिए कहा।

डरहम विश्वविद्यालय के बायोसाइंसेज विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख अध्ययनकर्ता स्टीफन विलिस ने कहा कि धरती पर रहने वाली सभी प्रजातियों पर बदलती जलवायु का प्रभाव पड़ता है तथा वे इसपर प्रतिक्रिया करते हैं। हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि प्रजातियों के राष्ट्रीय सीमाओं के माध्यम से दूसरे देशों में जाना महत्वपूर्ण है, ताकि वे जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकें। सीमाएं जो दीवारों और बाड़ से बनी होती हैं, किसी भी प्रजाति के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करती हैं, वे इन बाधओं को पार कर दूसरी जगह नहीं पहुंच सकते हैं।

अगर हम प्रकृति की रक्षा के बारे में गंभीर हैं, तो सीमा संरक्षण की पहल का विस्तार करना और प्रजातियों पर सीमा अवरोधों के प्रभावों को कम करना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि इस मुद्दे में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निपटने के लिए कोई विकल्प नहीं है। यह अध्ययन नेशनल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

कुल मिलाकर शोधकर्ताओं ने 12,700 स्तनपायी और पक्षी प्रजातियों के अवाजाही पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखा गया, जिनके निवास स्थान बढ़ते वैश्विक तापमान से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे उन्हें नए घर खोजने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

उन्होंने पाया कि कम सीओ2 उत्सर्जन करने वाले गरीब देशों में पक्षी और स्तनपायी प्रजातियों की अधिक हानि होने का अनुमान है, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित होंगे।

डरहम विश्वविद्यालय के बायोसाइंसेज विभाग के शोधकर्ता मार्क टिटले ने कहा जलवायु परिवर्तन में सबसे अधिक योगदान देने वालों और जो सबसे अधिक प्रभावित होंगे, उनके बीच की असमानताएं अंतर्राष्ट्रीय न्याय के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि हमारे मॉडल यह भी दिखाते हैं कि पेरिस समझौते के अनुरूप मजबूत और तत्काल उत्सर्जन में कमी, जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को बहुत कम कर सकती है और गरीब देशों पर इस तरह के नुकसान के बोझ से राहत दिला सकती है।