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हम बच्चे जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं तो बड़ों को गुस्सा आता है

जलवायु संकट के खिलाफ मुहिम चला रही ग्रेटा थनबर्ग की टीम में शामिल भारत की रिद्धिमा पांडे से जानिए कि भारत में जलवायु परिवर्तन को कितना गंभीरता से लिया जा रहा है

On: Wednesday 16 October 2019
 

रिद्धिमा पांडे, हरिद्वार, उत्तराखंड

मैं गंगा तट पर बसे हरिद्वार में रहती हूं। गंगा को अपने सामने बहता हुआ देखती हूं। ये भी देखती हूं कि गंगा में कितना सारा कचरा डाला जा रहा है। लोग वहां आते हैं, पिकनिक मनाते हैं फिर प्लास्टिक की खाली बोतलें, चिप्स के पैकेट और न जाने क्या-क्या फेंक देते हैं। लोग जिस गंगा नदी के किनारे पिकनिक के लिए आए थे, सुंदर दृश्य देखने आए थे, उसी को गंदला करके वापस लौट गए। मुझे ये बिलकुल अच्छा नहीं लगता।

मैं छह साल पहले अपने परिवार के साथ नैनीताल से हरिद्वार आकर रहने लगी। मैंने देखा कि किस तरह कांवड़ यात्रा के दौरान लोग शहर को गंदा करते हैं। जगह-जगह कूड़े के ढेर लग जाते हैं। मैंने कई बार सब्जी ले रहे लोगों से पूछा कि आप प्लास्टिक के थैले में क्यों सब्जी लेते हैं, तो उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता। वे कहते हैं कि सब्जी वाले प्लास्टिक में ही देते हैं तो हम ले लेते हैं। ये क्या जवाब हुआ। क्या वे अपने साथ कपड़े के थैले नहीं ले जा सकते। क्या वे अपनी आदत नहीं बदल सकते।

मैंने वर्ष 2013 की आपदा भी देखी। हमारे घर के बाहर तक पानी भर गया था। हर तरफ पानी ही पानी था। मैं तब बहुत छोटी थी लेकिन फिर भी इस आपदा को महसूस कर सकती थी। तब मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय में पत्र भी लिखा था।

हमारे बड़े, हमारे अभिवावक, हमारे डिसीज़न मेकर हमारी बात सुनने को तैयार नहीं। वे सच सुनने को तैयार नहीं। ये बिलकुल अच्छा नहीं है। इसीलिए आज बच्चों को विरोध करना पड़ रहा है। जब मैंने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बात करने की कोशिश की, तो बड़े लोगों को इस पर गुस्सा आता है। वे हमारी बात को महत्व नहीं देते, इसे टाल देते हैं। वे मुझसे कहते हैं कि तुम इतना गुस्सा क्यों हो रही हो, क्या तुम मुस्कुरा नहीं सकती हो, लेकिन इस तरह के हालात देखकर मुस्कुराना मुश्किल है। सच को सुनना कम्फर्टेबल नहीं है।

क्या बड़े लोगों ने ग्रेटा थनबर्ग की बात सुनी। जब वह आवेश में अपना भाषण कर रही थीं तो क्या दुनिया के महानतम देशों के महान नेताओं ने उन्हें गंभीरता से लिया? उस समय संयुक्त राष्ट्र संघ में हम सभी दुनिया के कोने कोने से आए सोलह बच्चे भी बहुत आवेशित थे। दुनिया भर के नेता बस जलवायु परिवर्तन के जरूरी मुद्दे को इग्नोर कर रहे हैं। जब मैंने इस बारे में अपने आसपास के बड़े लोगों से बात की तो उनका रवैया ऐसा था कि मुझे इसके बारे में चिंता करने की जरूरत नही है। हमें बस मजे करने चाहिए। क्योंकि इस सबके लिए दूसरे लोग हैं, वे विरोध करेंगे। फिर उन दूसरे लोगों को कहा जाएगा कि कोई और विरोध करेगा, आप रहने दीजिए, अपनी ज़िंदगी जियो। इस तरह पर्यावरण के लिए कोई बात नहीं करेगा, सब सोचेंगे कि ये काम किसी और का है।

बड़े लोग हमारी बातें ध्यान से सुन नहीं रहे, इसलिए हम बहुत तेजी से चीख रहे हैं, और ज़ोर से बोल रहे हैं। बड़े लोग कभी कहते हैं कि ये बहुत अच्छा है, आप बहुत अच्छा काम कर रहे हो। लेकिन इसके बाद वो फिर हमारी बात एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देंगे। क्या वे पर्यावरण के प्रति अपने व्यवहार में कोई बदलाव लाएंगे?

हमारा देश एक विकासशील देश है। हमारी आबादी बहुत अधिक है। इसके लिए हमें अधिक घर चाहिए। अधिक सड़कें चाहिए। इसलिए हम पेड़ काट रहे हैं। पर्वत काट रहे हैं। लेकिन हम अपने इको सिस्टम को इग्नोर नहीं कर सकते। हम जलवायु परिवर्तन के असर देख सकते हैं। बिहार में लोग बाढ़ का सामना कर रहे हैं। उसके बाद वो डेंगू जैसी बीमारियों से घिरे हुए हैं। हज़ारों लोग बुरी स्थिति में फंसे हैं। ये अच्छा नहीं है। मैं नहीं चाहती कि भविष्य में ऐसी हवा में सांस लूं जो बीमारियां फैलाए। मैं भविष्य में किसी बाढ़ में नहीं फंसना चाहती हूं। मैं स्वस्थ्य भविष्य चाहती हूं। ऐसा भविष्य चाहती हूं जिसमें आने वाली पीढ़ी अच्छी आबोहवा में सांस ले सकें।

आज ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए ज़िम्मेदार कौन है। वे बड़े लोग जो फैक्ट्रियां चल रहे हैं। जो डिसीजन मेकर हैं। वे हमारे वातावरण का तापमान बढ़ा रहे हैं। हम प्रदूषण नहीं फैला रहे, लेकिन आगे चलकर इसके नतीजे हमें भुगतने पड़ेंगे।

मुझे लगता है कि नई पीढ़ी पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर ज्यादा गंभीर है। क्योंकि हम ये समझ रहे हैं कि यदि आज हमने कुछ नहीं किया तो भविष्य में हम बहुत परेशानियां झेलने वाले हैं। जिस तेजी से धरती का तापमान बढ़ रहा है और कार्बन का उत्सर्जन हो रहा है, अगर आप आज एक पौधा लगाओगे तो उसे पेड़ बनने में दस साल लगेंगे, वो भी उस स्थिति से निपटने के लिए काफी नहीं होगा। हमें इस मुद्दे को अधिक गंभीरता से लेना होगा।

मुझे लगता है कि सबसे बड़ी बाधा ये है कि हम क्लाइमेट क्राइसेस को देख नहीं पा रहे हैं। मुंबई के आरे में हजारों पेड़ काटने की अनुमति दी गई ताकि वे मेट्रो के लिए रास्ता बना सके। जबकि मुंबई सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। जो लोग इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आप पेड़ मत काटो लेकिन तब तक बहुत सारे पेड़ काटे जा चुके थे।

हम बच्चों के पास इतनी समझ है कि बड़े लोगों को कैसे काम करना चाहिए और वो किस तरह काम कर रहे हैं। हम देख रहे हैं कि हमारे आसपास क्या हो रहा है। वे सोच रहे हैं कि हमें शांत रहना चाहिए लेकिन हम चुप नहीं रहेंगे।

 (रिद्धिमा पांडे पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में दुनियाभर से शामिल 16 बच्चों में से वे एक हैं। यह आलेख रिद्धिमा पांडे से बातचीत के आधार पर है) प्रस्तुति-वर्षा सिंह