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पेरिस समझौते के 5 साल: अब बड़े कदम उठाने की जरूरत

मौजूदा कार्बन उत्सर्जन के स्तर को देखते हुए 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पूरा करने में साल 2030 तक दुनियाभर का कार्बन बजट खत्म हो जाएगा

By Sunita Narain

On: Saturday 12 December 2020
 

पांच साल पहले जब भौतिक रूप से मुलाकात संभव थी, तब सर्दी से ठिठुरते पेरिस में जलवायु परिवर्तन के समझौते पर हस्ताक्षर के लिए दुनिया भर के लोग जुटे थे। आज, जब दुनिया एक उग्र वायरस महामारी के कारण बंद है, तो इस बात का जायजा लेने का समय है कि उस समय किन बातों पर सहमति बनी थी और अब क्या किया जाना चाहिए।

पिछले पांच वर्षों में एक बात तो स्पष्ट है कि दुनिया के हर हिस्से में प्रलयंकारी मौसम की घटनाएं बढ़ी हैं। इसलिए, भले ही कोविड-19 से हम उभर जाएं, लेकिन भविष्य की अनिश्चितता हमारे दिमाग पर हावी रहनी चाहिए। चाहे, वो युवा हो या बूढ़ा, या अमीर-गरीब। जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है और हमें अब इसका विनाशकारी प्रभाव दिखने लगा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। 1880 में जब से मौसम का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था हुई, तब से अब तक औसत वैश्विक तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि हो चुकी है। और अब पेरिस समझौता हो या ना हो, अनुमान है कि सदी के अंत तक औसत तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। 

आइए, समीक्षा करें कि हम कहां हैं? पेरिस 2015 समझौते ने बुनियादी तौर पर जलवायु कार्रवाई पर समझौते की शर्तों को बदल दिया। इससे पहले दुनिया ने वातावरण में उत्सर्जन के स्टॉक के लिए देशों की जिम्मेदारी के आधार पर ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की कटौती के लक्ष्य निर्धारित किए थे। इस समझौते में कार्रवाई के लिए एक रूपरेखा तैयार की गई और सहकारी समझौते की नींव रखी गई। लेकिन अमेरिका जैसे देश, जो उत्सर्जन में सबसे अधिक योगदान देते रहे हैं, वे इस समझौते को नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने इसे (समझौते को) कमतर करने की कोशिश की। वे अतीत की पुरानी बातों को नकारते हुए वही करना चाहते थे, जो वे कर सकते थे। पेरिस समझौते ने इस विचार के आगे घुटने टेक दिए।

इस तरह सभी देशों ने अपने लक्ष्य तय किये और प्रतिस्पर्धा में कूद गये, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) कहा जाता है। इसके बाद पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश हुई, लेकिन अगर इन एनडीसी के कुल योग को भी मान लिया जाए, तब भी इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होना लगभग तय है। 

हालांकि उम्मीदें अधिक थीं। एक बार के लिए इस समझौते से अमेरिका को हटा भी दिया जाए, तब भी पेरिस समझौते में कहा गया कि इस समझौते से 1880 के पूर्व-औद्योगिक युग से दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाएगा, बल्कि तापमान के 2 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। 

ऐसा करने के लिए तीन चीजें सामने रखी गई थीं। पहला था-एनडीसी का कड़ाई से पालन। ऐसा इसलिए किया गया कि देश कठोर कार्रवाई की जरूरत समझेंगे क्योंकि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव उन पर पड़ता है। दूसरा था साल 2023 में कार्बन के वैश्विक स्टाॅक की जांच और इसमें कमी लाने के लक्ष्य तक पहुंचने में उठाये गये कदमों के प्रभाव की जांच के वास्ते हर पांच साल के अंतराल पर इसका दोहराव। और तीसरा था बाजार आधारित उपकरणों को विकसित करना, ताकि भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए विभिन्न देश इनकी खरीद कर सकें।

अब, पांच साल बाद जलवायु परिवर्तन के नीति निर्धारक अंग (काॅन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) के बीच भौतिक मुलाकात नहीं होगी और ये अच्छी खबर नहीं है। इस मुद्दे को हमें भटकने नहीं देना चाहिए। कोविड-19 के चलते पिछले वर्ष वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कुछ हद तक गिरावट आई है, लेकिन ये तात्कालिक है। यूएनईपी की एमिशन गैप रिपोर्ट 2020 में बताया गया है कि पिछले तीन वर्षों में वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस ऊत्सर्जन में बढ़ोतरी हुई है। साल 2019 में इसमें रिकार्ड स्तर पर इजाफा हुआ था। ये भी जगजाहिर है कि अमेरिका जैसे देश पेरिस समझौते के तहत तय किये अपने स्वैच्छिक लक्ष्य के एक बहुत छोटे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पायेंगे। अमेरिका में साल 2019 में 2016 के मुकाबले ज्यादा कार्बन उत्सर्जन हुआ था और ऐसा तब हुआ जब इसने पिछले दशक में अमेरिका ने ऊर्जा संबंधित उत्सर्जन 30 प्रतिशत कम किया था।

ये भी साफ हो गया है कि मौजूदा कार्बन उत्सर्जन के स्तर को देखते हुए 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पूरा करने में साल 2030 तक दुनियाभर का कार्बन बजट खत्म हो जायेगा। ये तब होगा जब भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्सों को सबसे सस्ता ईंधन कोल और प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल के अधिकार की जरूरत होगी। इसका मतलब है कि इससे कार्बन उत्सर्जन और बढ़ेगा। ये स्पष्ट  है कि अक्षय ऊर्जा आधारित ऊर्जा की नई व्यवस्था में प्रवेश करने में अभी वक्त है।

यद्यपि यूरोपीय यूनियन जैसे कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले अधिकांश क्षेत्रों में ऊर्जा व्यवस्था में कोयले की बड़ी हिस्सेदारी है। ठीक वैसे ही जैसे नई अक्षय ऊर्जा तकनीक में हवा या सौर की हिस्सेदारी है। इसलिए ये बहुत जरूरी है कि उभरती दुनिया में हम इस बदलाव की तरफ आगे बढ़ें, लेकिन स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है कि ये हो जाये। बात करना आसान है, लेकिन तब्दीली आसान नहीं।

लेकिन, लक्ष्य को स्थानांतरित किया जा रहा है। नया चर्चित शब्द हैनेट-जीरो विश्व के कई देशों ने साल 2050 के लिए नेट-जीरो लक्ष्य की घोषणा कर दी है। चीन ने कहा है कि वह 2060 तक नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा। अब दबाव भारत समेत अन्य देशों की सरकारों पर है कि वे नेट-जीरो का लक्ष्य तय करें।

समस्या नेट-जीरो करने की महात्वाकांक्षा या इरादे को लेकर नहीं है। समस्या ये है कि ज्यादातर मामलों में इन बड़ी घोषणाओं का कोई भौतिक आधार नहीं है। तय लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कोई योजना नहीं है या ऐसा रास्ता नहीं है जिससे ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम हो जाए। बहुत कम देश इस दशक के लिए  2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती का कठिन लक्ष्य लेकर आए हैं। ज्यादातर मामलों में उत्सर्जन में तत्काल बड़ी गिरावट कैसे आएगी, इसको लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है, लेकिन एक लक्ष्य तय कर दिया गया है।

इसलिए हमें जलवायु परिवर्तन के नैरेटिव में वास्तविकता की ज्यादा जांच की जरूरत है। प्रभाव पड़ना निश्चित है, लेकिन अभी तक कार्रवाई को लेकर संकल्प की कमी है। हम बेहतर परिणाम के अधिकारी हैं। अतः पेरिस समझौते की पांचवीं वर्षगांठ पर, आइए, हम तय करते हैं कि केवल अच्छी-अच्छी बातें नहीं होने दें, बल्कि कार्रवाई की मांग करें। कठोरअसरदार असली कार्रवाई होनी चाहिए और अभी होनी चाहिए।