कॉप-26 का रिपोर्ट कार्ड: ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन की भूमिका को पहली बार मिला महत्व

105 देशों ने इसका उत्सर्जन कम करने के संकल्प-.पत्र पर हस्ताक्षर किए, हालांकि तीन बड़े उत्सर्जकों ने नहीं किए हस्ताक्षर

By Richard Mahapatra

On: Friday 12 November 2021
 
Photo: Agnimirh Basu
Photo: Agnimirh Basu Photo: Agnimirh Basu

कम समय तक जीवित रहने वाले प्रदूषक के तौर पर मीथेन, हाल के समय में ऐसी गैस के तौर पर उभरी है, जिसका उत्सर्जन कम करके धरती को पूर्व-औद्योगिक काल के स्तर से ज्यादा गर्म होने से रोका जा सके। गौरतलब है कि कुछ साल पहले तक वैश्विक जलवायु वार्ताओं में सारा जोर कॉर्बन का उत्सर्जन कम पर रहता था और मीथेन को महत्व नहीं दिया जाता था।

दो नवंबर 2021 को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत चल रहा 26वां संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप26) हाल के समय में मीथेन की भूमिका को रेखांकित करना वाला पहला कार्यक्रम बना।

इस दिन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्व में 105 देशों ने एक स्वैच्छिक और गैर-बाध्यकारी वैश्विक मीथेन संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसमें उन्होंने वादा किया कि वे 2030 तक मीथेन के उत्सर्जन में तीस फीसदी की कमी करेंगे।
 
अगर ये देश एक साथ मिलकर यह वादा पूरा कर लेते हैं तो मीथेन के वैश्विक उत्सर्जन में 40 फीसदी की कमी हो सकती है। इस लिहाज से कॉप-26 के अन्य समझौते के बीच दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने में इस संकल्प-पत्र की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
 
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन के मुताबिक, ‘अगले 25 सालों में जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए, मीथेन का उत्सर्जन कम करना सबसे सही रास्ता है।’

संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में ब्राजील, नाइजीरिया और कनाडा जैसे बड़े मीथेन उत्सर्जक देश शामिल हैं। हालांकि वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में 35 फीसदी योगदान देने वाले तीन अन्य बड़े उत्सर्जक देशों -चीन, रूस और भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।

अफ्रीका के कम से कम 22 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और यूरोपीय संघ ने इस संकल्प-प़त्र पर सितंबर 2021 में ही हस्ताक्षर कर दिए थे, जब केवल नौ देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

इसके अलावा बीस से ज्यादा कल्याणकारी संगठनों ने मीथेन का उत्सर्जन कम करने के लिए इसी साल अक्टूबर में 28 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,440 करोड़ रुपये का आर्थिक सहयोग देने का वादा किया है। इन संगठनों में गैर-लाभकारी संगठन ब्लूमबर्ग, चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन और ओक फाउंडेशन शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने भी अपनी ताजा जांच रिपोर्ट में पहली बार अल्प-कालिक प्रदूषक के तौर पर मीथेन का उल्लेख किया है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कम करने में लक्षित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि अगले बीस सालों में धरती को गरम होने से रोकने में मीथेन उत्सर्जन को कम करना सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

मानवजनित कुल मीथेन उत्सर्जन में खेती का योगदान चालीस फीसदी, जीवाश्म ईंधनों का योगदान 35 फीसदी और कचरे का योगदान बीस फीसदी है।

कॉर्बन डाइअॅाक्साइड की तुलना में वायुमंडल में मीथेन की मौजूदगी केवल 2 पार्ट्स प्र्रति मिलियन ;पीपीएमद्ध है, जबकि कॉर्बन की मौजूदगी 412 पीपीएम है। कॉर्बन डाइअॅाक्साइड जहां वातावरण में दो सौ साल से ज्यादा समय तक बनी रहती है, मीथेन वातावरण में मुिश्कल से 12 साल रहती है। हालांकि मीथेन, कॉर्बन डाइअॅाक्साइड की तुलना में 84 गुना ज्यादा गरमी पैदा करती है, जिस कारण यह वातावरण को गरम करने वाली सबसे महत्वूपर्ण गैस बन जाती है।

आईपीसीसी के मुताबिक, ग्रीनहाउस गैसों में कॉर्बन डाइअॅाक्साइड के बाद मीथेन, ग्लोबल वार्मिंग की दूसरी सबसे बड़ी योगदानकर्ता गैस है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मानें तो औद्योगिक क्रांति के बाद से ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान कम से कम तीस फीसदी है।

1980 के बाद से जब से इस गैस का रिकॉर्ड रखना शुरू हुआ है, किसी और समय की तुलना में फिलहाल यह सबसे ज्यादा मात्रा में पैदा हो रही है।

राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय संचालन के मुताबिक, कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए देश में लगाए गए लॉकडाउन की वजह से वातावरण में मीथेन बढ़ गई थी।

2020 में इसकी वार्षिक वृद्धि 14.7 पार्ट्स पर बिलियन ;पीपीबीद्ध  थी, जो साल 1983 में शुरू की गई इसकी वार्षिक गणना के बाद से किसी भी साल में सबसे ज्यादा थी।

दुनिया की बात करें तो दिसंबर 2020 में इसकी वैश्विक मात्रा 1892 पीपीबी थी। इसमें पिछले दो दशकों यानी 2000 के बाद से 119 पीपीबी या छह फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

यूरोपीय कमीशन की प्रेसीडेंट उर्सुला वॉन डेर लेन के मुताबिक, अगर संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले देश उसके अनुसार नतीजे देंगे तो 2050 तक धरती को कम से कम 0.2 डिग्री सेल्सियस गरम होने से रोका जा सकता है।

वह आगे  कहती हैं, ‘ 2050 तक जलवायु तटस्थता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें बड़े संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता है, लेकिन हम 2050 का इंतजार नहीं कर सकते। मीथेन के उत्सर्जन को कम करना, वह सबसे प्रभावी तरीका है जो हम ग्लोबल वार्मिंग से बचने और धरती को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर बनाए रखने के लिए कर सकते हैं। यह सबसे आसान रास्ता भी है।’

उपलब्ध तकनीक के साथ तेल और गैस सेक्टर की मीथेन में 75 फीसदी मीथेन कम की जा सकती है। इसमें से 50 फीसदी को कम करने में कोई खर्च भी नहीं होगा।

अल्पकालिक जलवायु प्रदूषण कम करने के लिए जलवायु और स्वच्छ वायु सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा किए गए वैश्विक मीथेन आकलन में एक महत्वूपर्ण अनुमान लगाया गया है।

इसके मुताबिक, इस दशक में इंसानों से होने वाले मीथेन के उत्सर्जन को 45 फीसदी कम करने से धरती को उस सीमा तक गरम होने से रोका जा सकता है, जिस पर दुनिया के नेताओं ने सहमति जताई है।

मीथेन का ऑक्सीकरण, जमीनी स्तर पर ओजोन (धुंध) के लिए जिम्मेदार है, जो एक हानिकारक वायु प्रदूषक है।

इस तरह, मीथेन का उत्सर्जन कम होने से दुनिया भर में हर साल वायु प्रदूषण से होने वाली 2,55,000 मौतों को रोका जा सकता है। अस्थमा से संबंधित बीमारियों के 7,75,000 मरीजों को अस्पताल जाने से बचाया जा सकता है। साथ ही इस गैस के कारण होने वाली अत्यधिक गर्मी से 73 अरब घंटे के श्रम के नुकसान और 26 मिलियन टन फसल के नुकसान को रोका जा सकेगा।

वैश्विक मीथेन आकलन के मुताबिक, मीथेन का रिसाव, इसके उत्सर्जन के बड़े कारकों में है, और इसे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के नियंत्रित किया जा सकता है। आकलन में पाया गया है कि अगर जरूरी कदम उठाए जाएं तो तेल और गैस संबंधी रिसावों को 80 फीसदी और कोयले से होने वाली 98 फीसदी रिसावों को रोका जा सकता है। इसमें कोई अतिरिक्त खर्च भी नहीं आएगा। इसके बजाय इन उपायों से आमदनी भी बढ़ेगी क्योंकि बचाई गई मीथेन को बेचा जा सकेगा।
 

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