क्या 2500 तक हम अपनी ही पृथ्वी के लिए बन जाएंगे एलियन?

अनुमान है कि तापमान में हो रही बेतहाशा वृद्धि एक तरफ जहां अमेजन को बंजर बना देगी। वहीं भारत और अमेरिका के कुछ हिस्से बहुत ज्यादा गर्म हो जाएंगें, जो इसे इंसानों के लायक नहीं रहने देंगे

By Lalit Maurya

On: Wednesday 20 October 2021
 

क्या जलवायु परिवर्तन के चलते 2500 तक हम अपनी ही पृथ्वी के लिए एलियन बन जाएंगे। बात भले ही किसी साइंस फिक्शन मूवी जैसी लगे पर जिस तरह से हमारे ग्रह का तापमान बढ़ रहा है और अगर वो भविष्य में भी ऐसे ही बढ़ता रहा तो बहुत मुमकिन है कि आने वाले समय में यह धरती हमारे रहने लायक नहीं रहेगी।

हाल ही में इस बारे में शोधकर्ताओं द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि यदि तेजी से बढ़ते उत्सर्जन में भारी गिरावट नहीं आती, तो तापमान में हो रही वृद्धि 2500 तक धरती को इंसानों के लायक नहीं रहने देगी।

अनुमान है कि तापमान में हो रही यह बेतहाशा वृद्धि एक तरफ जहां अमेजन को बंजर बना देगी। वहीं भारत और अमेरिका के मध्य एवं पश्चिमी हिस्से बहुत ज्यादा गर्म हो जाएंगें, जो इसे इंसानों के लायक नहीं रहने देंगे। मैकगिल यूनिवर्सिटी द्वारा किया यह शोध जर्नल ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

 

इस शोध से जुड़े शोधकर्ता क्रिस्टोफर लियोन के अनुसार “हमें उस पृथ्वी के बारे में कल्पना करने की जरुरत हैं जिसका सामना हमारे बच्चे, पोते-पोतियां करने वाले हैं। हमें देखना होगा कि हम इसे बेहतर और उनके रहने लायक बनाने के लिए क्या कर सकते हैं। “उनके अनुसार यदि हम पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रहते हैं तो यह उत्सर्जन बढ़ता रहेगा, जिसके चलते दुनिया में कई जगहें आने वाले वक्त में नाटकीय रूप से बदल जाएंगी।

यह समझने के लिए कि 2500 तक धरती के तापमान और जलवायु में कितना बदलाव आएगा और उसका क्या प्रभाव होगा, शोधकर्ताओं ने क्लाइमेट मॉडल की मदद ली है। इस मॉडल में उन्होंने निम्न, मध्यम और उच्च जलवायु शमन परिदृश्यों के तहत आने वाले बदलावों की गणना की है। उनका यह मॉडल वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसों पर आधारित था। इसके जो निष्कर्ष सामने आए थे वो हैरान कर देने वाले हैं, जिसके अनुसार भविष्य में हमारी पृथ्वी इंसानों के लिए ही परग्रह बन जाएगी। 

ध्रुवों के पास सिमट जाएंगी फसलें और वनस्पतियां

शोधकर्ताओं के अनुसार कम और मध्यम शमन परिदृश्यों के तहत, जिसमें पैरिस समझौते के 2 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा, पृथ्वी पर उगने वाली वनस्पति और सर्वोत्तम फसलों वाले क्षेत्र ध्रुवों की ओर सरक सकते हैं। वहीं वह स्थान जो कुछ फसलों के लिए उपयुक्त है वो बहुत सीमित क्षेत्र में सिमट जाएगा। अमेज़न जिसे उसकी सांस्कृतिक विरासत और पारिस्थितिक तंत्र की समृद्धि के लिए लम्बे समय से जाना जाता है वो बंजर हो सकता है। 

यही नहीं शोधकर्ताओं को पता चला है कि भारत सहित उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जहां आज आबादी का घनत्व कहीं ज्यादा है वहां गर्मी का तनाव घातक स्तर पर पहुंच जाएगा। शोध से यह भी पता चला है कि जलवायु शमन के उच्च परिदृश्यों में भी समुद्र का स्तर बढ़ता जाएगा। जिसके लिए काफी हद तक तापमान में हो रही वृद्धि जिम्मेवार है।    

शोधकर्ताओं के अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित कई रिपोर्टें जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में चेताती रही हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश 2100 के आगे नहीं देखती हैं। ऐसे में टीम का कहना है कि किसी भी परिदृश्य में जलवायु प्रभावों को पूरी तरह से समझने और भविष्य के लिए योजना बनाने के लिए शोधकर्ताओं और नीतिनिर्माताओं को 2100 से आगे देखने की जरुरत है। 

शोधकर्ता क्रिस्टोफर लियोन के अनुसार पेरिस एग्रीमेंट, संयुक्त राष्ट्र और आईपीसीसी द्वारा जारी ज्यादातर साइंटिफिक रिपोर्ट यह दिखाती हैं कि इस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सदी के अंत से पहले हमें क्या करने की आवश्यकता है और यदि हम उन लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रहते हैं, तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं। 

लेकिन यह बेंचमार्क जो पिछले 30 से अधिक वर्षों से उपयोग किया जा रहा है, वो भविष्य के लिए काफी नहीं है, क्योंकि जो बच्चे आज पैदा हुए हैं वो सदी के अंत तक केवल 70 के दशक में होंगे। ऐसे में जो जलवायु अनुमान और नीतियां उन पर निर्भर करती हैं, उन्हें 2100 पर नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि भविष्य में लम्बे समय में जलवायु परिवर्तन के क्या प्रभाव होंगे उसे वो पूरी तरह नहीं समझ सकते हैं।